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न लाउड स्पीकर का शोर और न वो टोलियां
बरेली।
Updated Fri, 10 Feb 2017 01:01 AM IST
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Neither he nor the noise of loudspeakers Crews
- फोटो : बरेली, अमर उजाला
इसे नोटबंदी का असर कहें या चुनाव आयोग का डंडा। पिछले चुनाव तक गली मोहल्लों में प्रत्याशियों के छोटे छोटे कार्यालय और युवाओं की टोली प्रचार का माहौल बनाती रहीं हैं। ऐसा कुछ इस बार देखने को नहीं मिल रही है। राजनीतिक दलों की ओर से तैयार कराए गए संगीत मय गाने हर चौराहे पर लाउडस्पीकर से सुनने को मिल जाते थे। इस बार तो पूरी तरह सन्नाटा है। लाउडस्पीकर और प्रचार सामग्री का कारोबार करने वाले हाथ पर हाथ रखे बैठे हैं। बच्चे चुनाव में बिल्ले और स्टीकर पाने को तरस रहे हैं।
सिकलापुर के जयप्रकाश बताते हैं कि शोर कम हो गया। यह अच्छी बात है लेकिन पता ही नहीं चल रहा है कि चुनाव कहां हो गया। स्कूली परीक्षा के दौरान शोर शराबा बच्चों को परेशान करता था। सुभाष नगर निवासी ललित कहते हैं कि पहले चुनाव वैमनस्यता पर नहीं होता था, न ही एक दूसरे पर आरोप लगाते थे। प्रत्याशी अपनी छवि और काम के आधार पर वोट मांगता था। परतापुर चौधरी के आरिफ बताते हैं कि जो भी नेता वोट मांगने आते थे, हमलोग उसी नेता के काफिला में शामिल होते थे। क्योंकि हर पार्टी से बिल्ला और स्टीकर मिलता था जिससे हम सभी मोहल्ले के लोग खेलते थे।
‘ पिछले चुनावों तक सैट की सप्लाई देना मुश्किल होता था। एडवांस बुकिंग पर ही काम करते थे। गली मोहल्लों में खुले दफ्तरों में किसी तरह स्पीकर और डेक से काम चलवाया जाता था। इस बार न तो कोई डेक लेने आया और न ही संपर्क किया है। नेताओं की बड़ी मीटिंगों में पेशेवर ठेकेदार साउंड सिस्टम लगा रहे हैं।
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- गोवर्धन दास, डीजे साउंड सप्लायर टायर मंडी
‘ हमने दो प्रत्याशियों के घरों पर संपर्क किया, मिले नहीं लेकिन उनके प्रतिनिधि ने बताया कि मास्टर साहब जमाना बदल गया है, अब चुनाव आयोग के डंडे की वजह से लाउड स्पीकर वाली गाड़ी से प्रचार कराना मुश्किल हैं। चाहते हैं कि चुनावी माहौल बने लेकिन क्या करें, हम मजबूर हैं।’
- बबलू साउंड, जाटवपुरा
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सिकलापुर के जयप्रकाश बताते हैं कि शोर कम हो गया। यह अच्छी बात है लेकिन पता ही नहीं चल रहा है कि चुनाव कहां हो गया। स्कूली परीक्षा के दौरान शोर शराबा बच्चों को परेशान करता था। सुभाष नगर निवासी ललित कहते हैं कि पहले चुनाव वैमनस्यता पर नहीं होता था, न ही एक दूसरे पर आरोप लगाते थे। प्रत्याशी अपनी छवि और काम के आधार पर वोट मांगता था। परतापुर चौधरी के आरिफ बताते हैं कि जो भी नेता वोट मांगने आते थे, हमलोग उसी नेता के काफिला में शामिल होते थे। क्योंकि हर पार्टी से बिल्ला और स्टीकर मिलता था जिससे हम सभी मोहल्ले के लोग खेलते थे।
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‘ पिछले चुनावों तक सैट की सप्लाई देना मुश्किल होता था। एडवांस बुकिंग पर ही काम करते थे। गली मोहल्लों में खुले दफ्तरों में किसी तरह स्पीकर और डेक से काम चलवाया जाता था। इस बार न तो कोई डेक लेने आया और न ही संपर्क किया है। नेताओं की बड़ी मीटिंगों में पेशेवर ठेकेदार साउंड सिस्टम लगा रहे हैं।
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‘ हमने दो प्रत्याशियों के घरों पर संपर्क किया, मिले नहीं लेकिन उनके प्रतिनिधि ने बताया कि मास्टर साहब जमाना बदल गया है, अब चुनाव आयोग के डंडे की वजह से लाउड स्पीकर वाली गाड़ी से प्रचार कराना मुश्किल हैं। चाहते हैं कि चुनावी माहौल बने लेकिन क्या करें, हम मजबूर हैं।’
- बबलू साउंड, जाटवपुरा