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आज सुबह 10:54 तक होगी अष्टमी, फिर नवमी
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बरेली। शारदीय नवरात्र आठ अक्टूबर विजयदशमी देवी पारायण के साथ संपन्न होंगे। नवरात्र में अष्टमी नवमी को हवन पूजन और कन्या जमाई जाती हैं। अष्टमी तिथि छह अक्तूबर रविवार सुबह 10:54 तक रहेगी। इसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी जो सोमवार सात अक्टूबर दोपहर 12:37 तक रहेगी। सूर्य उदय के समय पर उस तिथि की प्रधानता महत्त्व ज्यादा माना जाता है। पंडित मुकेश मिश्रा बताते हैं कि हवन कन्या पूजन करने वाले रविवार को नवमी मनाने वाले सोमवार को हवन कन्या पूजन करेंगे। दुर्गा सप्तशती के अनुसार अष्टमी और नवमी दुर्गा हवन के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है। इसमें अग्निवास मुहूर्त की आवश्यकता नहीं होती। मार्कंडेय पुराण के अनुसार जो व्यक्ति अष्टमी नवमी में देवी जी का हवन करता है नौ कन्याओं में नौ देवी का प्रतिबिंब देखता है। भगवती के समान उनकी पूजा करता है भोग लगाता है और दक्षिणा देता है, ऐसे भक्तों पर मां भगवती अपनी वात्सल्य रूपी कृपा की बारिश करती हैं और वर्ष भर संपन्नता बनी रहती है। शनिवार को नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा हुई। मां कालरात्रि को यंत्र और मंत्र और तंत्र की देवी कहा जाता है।
दस साल तक की कन्याओं को ही बुलाएं
कन्याओं की आयु दो साल से ऊपर और दस साल तक होनी चाहिए। इनकी संख्या कम से कम नौ होनी चाहिए। कन्याओं को भोज पर खान के लिए एक दिन पहले न्यौता देना चाहिए। उनके घर में आने पर पूरा परिवार फूल वर्षा कर स्वागत करे। बालक को घी का दीपक दिखाकर आरती करनी चाहिए।
मां कालरात्रि का घर-घर हुआ पूजन
कहा जाता है कि देवी दुर्गा ने असुर रक्तबीज का वध करने के लिए कालरात्रि को अपने तेज से उत्पन्न किया था। इनके नाम के उच्चारण मात्र से ही भूत, प्रेत, राक्षस, दानव और सभी पैशाचिक शक्तियां भाग जाती हैं। पडिंत राजेंद्र तिवारी ने बताया कि इस दिन इनकी पूजा करने वाले साधक का मन सहस्रार चक्त्रस् में स्थित होता है। देवी का यह रूप ऋद्धि सिद्धि प्रदान करने वाला है। देवी भगवती के प्रताप से सब मंगल ही मंगल होता है।
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दस साल तक की कन्याओं को ही बुलाएं
कन्याओं की आयु दो साल से ऊपर और दस साल तक होनी चाहिए। इनकी संख्या कम से कम नौ होनी चाहिए। कन्याओं को भोज पर खान के लिए एक दिन पहले न्यौता देना चाहिए। उनके घर में आने पर पूरा परिवार फूल वर्षा कर स्वागत करे। बालक को घी का दीपक दिखाकर आरती करनी चाहिए।
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मां कालरात्रि का घर-घर हुआ पूजन
कहा जाता है कि देवी दुर्गा ने असुर रक्तबीज का वध करने के लिए कालरात्रि को अपने तेज से उत्पन्न किया था। इनके नाम के उच्चारण मात्र से ही भूत, प्रेत, राक्षस, दानव और सभी पैशाचिक शक्तियां भाग जाती हैं। पडिंत राजेंद्र तिवारी ने बताया कि इस दिन इनकी पूजा करने वाले साधक का मन सहस्रार चक्त्रस् में स्थित होता है। देवी का यह रूप ऋद्धि सिद्धि प्रदान करने वाला है। देवी भगवती के प्रताप से सब मंगल ही मंगल होता है।
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