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मैंने पढ़ा ज्यादा, लिखा कम, पढ़ना अदब की समझ देता है : प्रो. खालिद जावेद

Fri, 14 Jul 2023 01:25 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 14 Jul 2023 01:25 AM IST
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I read more, wrote less, reading gives understanding of manners: Prof. Khalid Javed
बरेली। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में उर्दू के एसोसिएट प्रोफेसर जेसीबी पुरस्कार विजेता लेखक खालिद जावेद की चर्चित पुस्तक नेमतखाना व साहित्यिक विषयों पर विंडरमेयर में शाम छह बजे चर्चा हुई। उनकी रचनायात्रा, युवा पीढ़ी का साहित्य की ओर रुझान व उनके लेखन में बरेली की नदियों की झलक पर वरिष्ठ पत्रकार प्रभात सिंह ने बातचीत की।
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एक सवाल के जवाब में प्रो. खालिद जावेद ने कहा कि हमारे दम से ही गंदगी जिंदा है। हम जिंदा है तो शर्ट गंदी हो रही है। हम मृत्यु शैया पर होंगे तो हमारा कालर तक गंदा नहीं होगा। अंधेरों को लिखना और उन्हें स्वीकारना जरूरी है। जब अंधेर ही नहीं होंगे तो उजाले की कहानियां कौन लिखेगा और कौन सुनेगा।
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कार्यक्रम में मौजूद पाठकों ने सवाल किया कि उर्दू के कई मशहूर लेखक हुए। आप खुद को कहां पाते हैं। इस पर उन्होंने कहा कि मेरी किसी से तुलना नहीं है। वह सब बड़े लेखक थे और मैंने तो लिखा कम, पढ़ा अधिक है। पढ़ा इसलिए भी अधिक है क्योंकि पढ़ना अदब की समझ पैदा करता है। बता दें कि पिछले दिनों ''नेमतखाना'' के अंग्रेजी अनुवाद ''पैराडाइज ऑफ फूड'' को जेसीबी साहित्य पुरस्कार मिला था। कार्यक्रम में लेखक डॉ. बृजेश्वर सिंह, थिएटर आर्टिस्ट दानिश, डॉ. पूर्णिमा अनिल, डॉ. अखिलेश्वर सिंह समेत अन्य मौजूद रहे।
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ईश्वर, संसार और मनुष्य के ताल्लुक को समझना ही दर्शनशास्त्र
साहित्य को लिखने, समझने के लिए एक खास तरह के दिमाग की जरूरत है। प्रो. खालिद ने कहा कि ईश्वर और संसार का क्या ताल्लुक है और फिर मनुष्य का ईश्वर से और संसार से क्या ताल्लुक है, इसे समझना ही दर्शनशास्त्र है। लिखने में रंगों का महत्वपूर्ण स्थान है। हर शब्द का अपना रंग है। जैसे रात काली है और आंधी पीली है। यह कोई प्रयोग नहीं, स्वभाविक है।
आगे कहा कि मुझे बरेली की हर छोटी-बड़ी नदी से प्यार है। वे मेरे रिश्तेदार की तरह हैं। इसीलिए मेरी कहानियों में बरेली की नदियों का जिक्र होता है, हां समंदर से हमारा कोई ताल्लुकात नहीं है।

युवाओं की साहित्य में बढ़ती दिलचस्पी अच्छी
प्रो. खालिद जावेद ने कहा कि मैं केरल साहित्यिक फेस्टिवल में गया था। वहां मुझे हर वर्ग के कद्रदान मिले। वह लेखक को जानते थे, बात करना चाहते थे। विद्यार्थी, डॉक्टर, इंजीनियर, उद्यमी सभी वर्ग के युवा मुझे वहां मिले और वह सिर्फ पढ़ नहीं रहे हैं, समझ भी रहे। यही अनुभव जयपुर साहित्यिक फेस्टिवल में रहा। यह अच्छा है।
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