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अधूरे मन से कैसे जीतेंगे कुपोषण के खिलाफ जंग

Thu, 24 Dec 2020 12:22 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 24 Dec 2020 12:22 AM IST
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How to win the battle against malnutrition with half heart
demo photo - फोटो : demo photo

हाई रिस्क श्रेणी के पीलीभीत जिले में पांच साल आयु के करीब आधे बच्चों का वजन तक नहीं हो पाया
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फिर भी 16 हजार से ज्यादा बच्चे कुपोषित और 2295 अतिकुपोषित

बरेली। पीलीभीत जनपद को इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज यानी आईसीडीएस स्कीम की रिपोर्ट के मुताबिक कई सालों से हाई रिस्क श्रेणी में रखा गया है, इसके साथ यह जिला रेड जोन में भी चिन्हित है। इसका मतलब यह है कि इस जिले में बच्चों में कुपोषण का स्तर सीमा पार कर चुका है और अति कुपोषित बच्चों की संख्या सामान्य से काफी ज्यादा है। इसके सापेक्ष कुपोषण पर काबू पाने के सरकारी प्रयासों की स्थिति यह है कि इस साल जिले में पांच साल तक के 3,56,720 बच्चों में से 180517 का ही वजन हो पाया जिसमें 16 हजार से ज्यादा बच्चे कुपोषित और 2295 बच्चे अतिकुपोषित मिले हैं। अल्प वजन के बच्चों की तादाद 14134 है।
अमर उजाला फाउंडेशन और द इंडिया न्यूट्रिशन इनिशिएटिव के संयुक्त तत्वाधान में कुपोषण के खिलाफ साझा मुहिम के तहत पीलीभीत जिले में कुपोषण की जमीनी हकीकत की पड़ताल के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। शासन के निर्देश पर सितंबर में आयोजित वजन दिवस के दौरान पांच साल तक के करीब आधे बच्चों का वजन ही नहीं हो पाया। इसके बावजूद कुपोषित, अतिकुपोषित और अल्प वजन वाले बच्चों की तादाद ने इस जिले को हाई रिस्क श्रेणी में बरकरार रखा। सरकारी नियमों के मुताबिक अति कुपोषित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र यानी एनआरसी पर लाकर इलाज किया जाना चाहिए लेकिन जिले का तंत्र इसमें भी शत-प्रतिशत कामयाबी पाने में नाकाम रहा। कुपोषित बच्चों को पुष्टाहार मुहैया कराने को लेकर भी अफसरों के दावे भी अभिभावकों की शिकायतों से मेल नहीं खाते।
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अफसरों की सफाई.. बच्चों को कुपोषित मानने को तैयार नहीं होते अभिभावक

अफसरों का कहना है कि ज्यादातर मां-बाप अपने बच्चों को कुपोषित मानने को ही तैयार नहीं होते। इसी वजह से सभी अतिकुपोषित बच्चों को एनआरसी पर लाकर इलाज करना मुमकिन नहीं हो पाता। ऐसे अभिभावकों को जागरूक करने के लिए जिलाधिकारी पुलकित खरे ने टेली न्यूट्रिशन योजना भी शुरू कर्राई है जिसके तहत आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां अतिकुपोषित बच्चों के घर जाकर उनके अभिभावकों की एनआरसी के काउंसलर से बातचीत और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कराती हैं। कोशिश की जाती है कि उन्हें उनके बच्चों में कुपोषण के दुष्प्रभाव से जागरूक कर उनके इलाज के लिए तैयार किया जाए। काउंसलर के मुताबिक कई अभिभावक इस दौरान नोकझोंक करने के साथ आंगनबाड़ी कार्यकत्री को दोबारा न आने की हिदायत देकर लौटा देते हैं।
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अभिभावकों की शिकायत.. पोषाहार के बदले गेहूं-चावल, वह भी मिला नहीं

पीलीभीत जिले के कस्बे बीसलपुर के मोहल्ला बख्तावरलाल में पांच बच्चे अतिकुपोषित हैं जिनके माता-पिता का कहना है कि उन्हें पहले पोषाहार मिलता था लेकिन पिछले महीने से पोषाहार के बजाय गेहूं और चावल दिया जाने लगा है। हालांकि उन्हें गेहूं और चावल भी नहीं मिला। इसके जवाब में जिला कार्यक्रम अधिकारी अरविंद कुमार का कहना है कि पहली बार यह योजना शुरू हुई है। शासन ने हर आंगनबाड़ी केंद्र के लिए एक समान कोटा निर्धारित किया है लेकिन कुछ केंद्रों पर बच्चे ज्यादा हैं तो कुछ पर बेहद कम। इसी कारण जहां बच्चों की तादाद ज्यादा है वहां कुछ कोे राशन नहीं दिया जा सका।

अवयस्क उम्र में बन गईं मां.. बच्चे कुपोषित

पीलीभीत के जिला अस्पताल में बनाए गए एनआरसी में दस बेड हैं। इनमें सिर्फ एक पर पूरनपुर के दंपती की साल भर की अतिकुपोषित बच्ची भर्ती है। बाकी नौ बेड खाली पड़े हैं। बच्ची की मां के मुताबिक उसकी शादी 16 वर्ष की उम्र में ही हो गई थी। साल भर बाद ही वह मां बनी। पहली बच्ची तो स्वस्थ है पर दूसरी अतिकुपोषित निकली। आंगनबाड़ी कार्यकत्री ने पहले टेली न्यूट्रिशन से काउंसलिंग कराई फिर एनआरसी में भर्ती कराया। एनआरसी इंजार्च डॉ. नीता सक्सेना के मुताबिक ज्यादातर अति कुपोषित बच्चों की मांओं का अवयस्क उम्र में विवाह होने के मामले सामने आए हैं। उनका खानपान भी सही नहीं मिला है।

स्वास्थ्य सेवाओं से दूरी.. 20 फीसदी प्रसव घर पर

जिला महिला अस्पताल के आंकड़ों के मुताबिक सरकारी और निजी अस्पतालों में प्रसव की तादाद बढ़ने के बाद भी पीलीभीत में अभी भी 20 फीसदी से ज्यादा प्रसव घरों पर ही होते हैं। ऐसे मामलों में जब जच्चा और बच्चे की हालत बिगड़ती है तभी परिवार उन्हें अस्पताल लाते हैं। इनमें ज्यादातर महिलाओं में खून की कमी होती है। बच्चों का वजन भी कम होता है।

कोरोना का दौर और भारी पड़ा कुपोषित बच्चों पर

कोरोना के दौर में करीब छह महीनों तक कुपोषित बच्चों की न जांच हो पाई न देखभाल। कोरोना से डरे मां-बाप बच्चों की हालत खराब होने तक उन्हें लेकर अस्पताल नहीं गए। इस वजह से कई बच्चों को बचाया तक नहीं जा सका। सितंबर में पोषण माह में वजन दिवस का आयोजन तो हुआ लेकिन अब भी आंगनबाड़ी केंद्र पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाए हैं। कई केंद्र घर से ही चलाए जा रहे हैं।

बच्चों का वजन करने के लिए भेजी गई मशीन भरोसेमंद नहीं

पांच साल तक आयु के बच्चों का वजन करने के लिए शासन से जो मशीन पीलीभीत भेजी गई थी, उसकी गुणवत्ता पर भी सवाल उठे थे। बताया गया कि यह मशीन बच्चों का वजन ज्यादा बता रही थी। लिहाजा यह कहना मुश्किल है कि अल्प वजन वाले कुपोषित बच्चों की संख्या सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ही है या उससे ज्यादा। मशीन खराब होने के साथ करीब आधे बच्चों का वजन न हो पाने की वजह से अफसर भी असमंजस में हैं कि पिछले साल के मुकाबले जिले में कुपोषण कम हुआ या नहीं।

डीएम की पहल- सुपोषण मिशन- 36

पीलीभीत के सात में से पांच ब्लॉकों में पांच साल के 643 बच्चे अति कुपोषित हैं। जिलाधिकारी की ओर से इनकी देखभाल के लिए दो दिसंबर से सुपोषण मिशन-36 शुरू की गई है। इसके तहत 36 अफसरों को अति कुपोषित बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी गई है। जनपद में कोरोना के दौर में दो महीने तक पोषाहार नहीं बंट सका था। अब नवंबर से पोषाहार के स्थान पर गेहूं, दाल और चावल बांटा जा रहा है। कुपोषित बच्चों के परिवार को दी जाने वाली सामग्री बांटने के बजाय बेच दिए जाने की शिकायतों के बाद अब उसके वितरण की निगरानी स्वयं सहायता समूह कर रहे हैं।

पीलीभीत में जन्म, कुपोषण और मृत्युदर

  • 3,56,720 बच्चे हैं जिले में पांच साल तक की आयु के
  • 1,80,517 बच्चों का ही वजन करा पाया प्रशासन
  • 2295 बच्चे सर्वे में मिले अति कुपोषित
  • 14,134 कुपोषित बच्चों का वजन कम
  • 3.5 फीसदी है जिले में प्रजनन दर
  • 193 माताओं की मौत होती है प्रति एक लाख पर
  • 70 बच्चों की मौत होती है प्रति एक हजार पर
  • 10 बेड की एनआरसी है जिला महिला अस्पताल में

यह स्थिति थी 2019 में

  • 3,68,213 बच्चे थे पांच साल तक की आयु के
  • 3,15,450 बच्चों का लिया गया था वजन
  • 9000 से ज्यादा बच्चे मिले थे अतिकुपोषित
  • 27000 हजार से ज्यादा कुपोषित बच्चों का कम था वजन

यह है निगरानी तंत्र

  • - 1960 आंगनबाड़ी केंद्र, 17 सौ आंगनबाड़ी कार्यकत्री, 260 आंगनबाड़ी केंद्र बंद पड़े हैं।
  • - सीडीपीओ के छह पद रिक्त, दो सीडीपीओ पर ही पूरे जिले की जिम्मेदारी।
  • - मुख्य सेविकाओं के 69 पद रिक्त, 11 ही संभाल रही हैं पूरा जिला
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