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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bareilly News ›   Even from my samadhi, the days of revolution will come... Tribute to the martyr Raj Narayan who said this.

मेरी समाधि से भी इंकलाब जिंदाबाद की सदाएं आएंगी...ऐसा कहने वाले शहीद राज नारायण को नमन

Thu, 09 Dec 2021 07:30 PM IST
pawan chandra पवन चंद्रा
Updated Thu, 09 Dec 2021 07:30 PM IST
सार

मैं ऐसी घड़ी में पैदा नहीं हुआ हूं कि किसी प्रकार की चिंता करूं। मेरा तो यह सौभाग्य है, मैं देश की खातिर बलिवेदी पर चढ़ रहा हूं। हमेशा हंसते रहे। आप सभी साथियों की त्याग की वजह से अंत में भी हंसते ही जाऊंगा। मेरे न रहने के बाद आप जहां भी मेरी समाधि स्थापित करेंगे, हृदय से वहां पर सुनने में इंकलाब जिंदाबाद की सदाएं आएंगी। यह उस पत्र का अंश है जो शहीद राजनारायण ने अपनी फांसी से पहले क्रांतिकारी झारखंडे राय को लिखा था। लखीमपुरखीरी के भीखमपुर गांव के रहने वाले शहीद राजनारायण को 1942 के आंदोलन में आज के दिन नौ दिसंबर 1944 को फांसी दे दी गई थी। अंग्रेजी हुकूमत की यह अंतिम फांसी थी।

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Even from my samadhi, the days of revolution will come... Tribute to the martyr Raj Narayan who said this.
शहीद राजनारायण मिश्र (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

विस्तार

बरेली। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 1942 के आंदोलन में राजनारायण मिश्र एक बड़े क्रांतिकारी के रूप में उभरे। उन्हें भगत सिंह की क्रांतिधारा का वाहक कहा गया। क्रांतिकारी योगेश चंद्र चटर्जी ने अपने पत्र में इसका उल्लेख किया है।
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भीखमपुर की मिट्टी में जन्मे राजनारायण को बहादुरी विरासत में मिली थी। उनकी मां ने एक बार डाकुओं से लोहा लिया था। उनके भाई भी क्रांतिकारी रहे। जंग-ए-आजादी के लिए जब वह घर से निकले तो उनकी पत्नी विद्यादेवी ने उनका तिलक किया और कहा - यदि आप देश के लिए मरे तो मेरा सौभाग्य होगा...।
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शरीद राजनारायण के जीवन में इंकलाब के सिवा कुछ न था। उन्होंने अपने एक पत्र में इस बात का उल्लेख किया है कि जब तक वह पकड़े नहीं गए। एक दिन भी खाली रहते तो उन्हें चैन नहीं पड़ता था। देश के काम के सामने वह खाना-पीना सब भूल जाते थे। 42 के आंदोलन के दौरान वह लखीमपुरखीरी, मेरठ, दिल्ली, बंगाल कई स्थानों पर क्रांतिकारी गतिविधियों से संबद्ध रहे। क्रांतिकारी टोली की अगुवाई करते हुए उन्होंने लखीमपुरखीरी में जमीदारों से हथियार छीनना शुरू किया। उनका मानना था कि अंग्रेज और जमींदार दोनो शोषक ही है। इन पर रहम कैसा। इस घटना से हुकूमत घबड़ा गई थी। इसके बाद उनकी धरपकड़ तेज हो गई। भीखमपुर के लोगों पर जुल्म ढाए गए।
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राजनारायण कई बार पकड़े गए और कुछ समय बाद छूट जाते थे। क्योंकि वह अपना नाम पता सही नहीं बताते हैं। अंतिम बार वह मेरठ के एक गांधी आश्रम के कार्यकर्ता के घर से निकलने के बाद गिरफ्तार कर लिए गए। उनका कहना था कि वह विश्वास में छले गए। 27 जून को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। फैसला सुनते ही उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाया। नौ दिसंबर 1944 को सुबह पांच बजे उन्हें लखनऊ जेल में फांसी दे गई।

ऐसा सपना देखते थे राजनारायण

भाई साहब, आजकल आपकी तरह ही मैं अपने आप को आपके ही पास पाता हूं। सोता हूं तो यही देखता हूं कि आप सभी साथी प्रेम के फूल चुन-चुन कर मुझे हार पहना रहे हैं। खाना भी आपके साथ खा रहा हूं। सफेद कपड़े आपने भेंट किए हैं, आप लोग गले मिल रहे हैं। सभी साथी मुझे अपने हृदय से लगा रहे हैं, मेरे माथे पर रोचना लगा रहे हैं। सामने एक शहरी और अत्यंत विस्तृत नदी आ जाती है। नाव पर चढ़ाकर आप सभी विदा हो रहे हैं। देखते देखते मैं आपके सामने से ओझल हो गया। अकस्मात मेरी नाव दरिया में डूब गई...। मुझे 18 तारीख के अंदर किसी न किसी फांसी लग जावेगी। हम आपका संदेशा लेकर जा रहे हैं। अमर शहीदों के पास...
आपका- राजू

फांसी के पहले यह पत्र उन्होंने क्रांतिकारी झारखंडे राय को लिखा था, जिसमें उन्होंने अपनी मन:स्थिति बताई थी।

आज आप जैसे ही नवयुवकों को देखकर भगत सिंह की याद आती है। अपने साथियों के साथ बलिवेदी पर पर चढ़कर उन्होंने भारत में जीवन में फूंक दिया था। आप भी थोड़े ही दिनों में फांसी पर चढ़ जाएंगे। हम आपको नहीं बचा सकेंगे। न ही देख सकेंगे। किंतु मैं एक बात जानता हूं कि आपके शहीद हो जाने पर हजारों राजनारायण पैदा हो जाएंगे। जिस कार्य को आप छोड़ जा रहे हैं, उसको पूरा करेंगे। शहीदों के खून से ही शहीद पैदा होते हैं।

राजनारायण की फांसी के पहले यह पत्र क्रांतिकारी योगेश चंद्र चटर्जी ने उन्हें लिखा था। राजनारायण के जीवन में योगेश दा खासा प्रभाव रहा।

फांसी की सजा सुनने के बाद बढ़ गया था वजन

शहीद राजनारायण की फांसी के बाद शाम को जेल में एक शोकसभा हुई, जिसकी अध्यक्षता योगेश दा ने की। उन्होंने कहा कि मेरे अनेक प्राण प्रिय मित्रों ने बलिदान दिया। फांसी के तख्ते पर झूले। लेकिन इतनी खुशी से मृत्यु को आदमी आलिंगन कर सकता है। यह केवल मेरे लिए ही नहीं। बल्कि पुराने जेल कर्मचारियों के लिए आश्चर्यजनक घटना थी। फांसी की कोठरी में बंगाल में कन्हाईलाल दत्त  का नौ पौंड का वजन बढ़ गया था। ऐसे ही राजनारायण का वजन छह पौंड बढ़ गया था। यह सिद्ध करता है कि मौत को इस वीर भक्त ने कैसे ग्रहण किया।
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