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भगवान विष्णु संग सात फेरे लेकर दुर्गा बन गईं मीरा
बरेली।
Updated Thu, 02 Nov 2017 01:54 AM IST
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दुगाऱ्र्गा जाोश्ाी
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मध्यकालीन युग में करीब पांच सौ वर्ष पहले कृष्ण के प्रेम में दीवानी हुईं मीरा की कहानी हर कोई जानता है, लेकिन यह किसी के लिए भी हैरत की बात हो सकती है कि कृष्ण दीवानी मीरा जैसी आस्था की एक मिसाल इस युग में भी हमारे समाज में मौजूद है। आधुनिक युग की यह मीरा हैं सिविल लाइंस में रहने वाली 53 वर्षीय दुर्गा जोशी, जो किशोरावस्था में ही भगवान विष्णु की भक्ति में ऐसी रमी कि फैसला कर लिया था कि वह जीवन भर शादी नहीं करेंगी। आखिरकार 1992 में 25 की उम्र में दुर्गा जोशी का विवाह उनके मां-बाप ने भगवान विष्णु से करा दिया।
तीस वर्षों से एक कूरियर कंपनी में एरिया मैनेजर के रूप में काम कर रहींदुर्गा जोशी की भक्ति इतनी प्रगाढ़ है कि जिस कलश-नारियल को विष्णु जी के प्रतीक के रूप में उनके हाथों में देकर उनका विवाह कराया गया था, उस कलश की वह आज भी दिन-रात सेवा करती हैं। प्रभु भक्ति के लिए वह रोजाना सुबह चार घंटे का समय निकालती हैं। इसके अलावा हर महीने परिक्रमा करने वृंदावन भी जाती हैं।
दुर्गा जोशी बताती हैं कि तीन भाई और दो बहनों में वह सबसे बड़ी हैं। किशोरावस्था गुजरने के बाद भी वह मानसिक रूप से शादी के लिए तैयार नहीं हो पाईं। छोटी बहन की शादी से पहले मां-पिता उनकी जिम्मेदारी पूरी करना चाहते थे। उनकी जिद के आगे परिवार और रिश्तेदारों को झुकना पड़ा और फिर उनका विष्णु भगवान के साथ विवाह कराया गया। दुर्गा जोशी कहती हैं कि उम्र के साथ उनकी श्रद्धा और बढ़ती गई। उनके दो भाई मर्चेंट नेवी में इंजीनियर हैं, जबकि एक भाई व्यापार करते हैं। तीनों भाइयों का परिवार संयुक्त रूप से रहता है। वह बताती हैं कि आज भी मां जानकी उनके अविवाहित जीवन के कारण चिंता करती हैं। पर वह वह अपने पैरों पर खड़ी हैं और उन्हें भगवान की भक्ति के अलावा कोई चिंता नहीं सताती।
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तुलसी को बेटी मानकर विष्णु रूप सालिग्राम से कराया विवाह
बरेली। दुर्गा जोशी की पति स्वरूप भगवान विष्णु में आस्था का ही कारण है कि सुंदरकांड मंडली ने तुलसी जी के अभिभावक की जिम्मेेदारी उन्हें सौंपी। वह बताती हैं कि देव शयनी एकादशी के दिन उन्होंने तुलसी जी का पौधा लगाया था, जिन्हें वृंदावनी नाम दिया। उनका चार महीने तक रोज सुबह और शाम पौधे की पुत्री रूप मेें सेवा की। बुधवार को तुलसी जी की बारात बदायूं रोड स्थित सर्वोदय कालोनी के साईं मंदिर से गाजे बाजे के साथ चलकर सर्किट हाउस चौराहा स्थित हैडिल कालोनी के मंदिर में सुबह नौ बजे पहुंची। सालिग्राम को श्यामा जू श्याम नाम दिया गया जिसका स्वागत शमा गुप्ता, रूबी सक्सेना ने किया। पंडित सतेंद्र मोहन शास्त्री ने मंत्रोच्चारण के साथ विवाह संपन्न कराया। दोपहर दो बजे तुलसी जी को सालिग्राम के साथ विदा कर दिया गया। तुलसी जी को स्त्री धन के रूप में नथ, कंगन, मंगलसूत्र के अलावा वर्तन और रजाई गद्दा भी दिया गया है। इस भव्य कार्यक्रम के लिए अंशु, माया, शशि मेहरा, सुमन अग्रवाल आदि महिलाओं ने सहयोग किया।
तीस वर्षों से एक कूरियर कंपनी में एरिया मैनेजर के रूप में काम कर रहींदुर्गा जोशी की भक्ति इतनी प्रगाढ़ है कि जिस कलश-नारियल को विष्णु जी के प्रतीक के रूप में उनके हाथों में देकर उनका विवाह कराया गया था, उस कलश की वह आज भी दिन-रात सेवा करती हैं। प्रभु भक्ति के लिए वह रोजाना सुबह चार घंटे का समय निकालती हैं। इसके अलावा हर महीने परिक्रमा करने वृंदावन भी जाती हैं।
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दुर्गा जोशी बताती हैं कि तीन भाई और दो बहनों में वह सबसे बड़ी हैं। किशोरावस्था गुजरने के बाद भी वह मानसिक रूप से शादी के लिए तैयार नहीं हो पाईं। छोटी बहन की शादी से पहले मां-पिता उनकी जिम्मेदारी पूरी करना चाहते थे। उनकी जिद के आगे परिवार और रिश्तेदारों को झुकना पड़ा और फिर उनका विष्णु भगवान के साथ विवाह कराया गया। दुर्गा जोशी कहती हैं कि उम्र के साथ उनकी श्रद्धा और बढ़ती गई। उनके दो भाई मर्चेंट नेवी में इंजीनियर हैं, जबकि एक भाई व्यापार करते हैं। तीनों भाइयों का परिवार संयुक्त रूप से रहता है। वह बताती हैं कि आज भी मां जानकी उनके अविवाहित जीवन के कारण चिंता करती हैं। पर वह वह अपने पैरों पर खड़ी हैं और उन्हें भगवान की भक्ति के अलावा कोई चिंता नहीं सताती।
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तुलसी को बेटी मानकर विष्णु रूप सालिग्राम से कराया विवाह
बरेली। दुर्गा जोशी की पति स्वरूप भगवान विष्णु में आस्था का ही कारण है कि सुंदरकांड मंडली ने तुलसी जी के अभिभावक की जिम्मेेदारी उन्हें सौंपी। वह बताती हैं कि देव शयनी एकादशी के दिन उन्होंने तुलसी जी का पौधा लगाया था, जिन्हें वृंदावनी नाम दिया। उनका चार महीने तक रोज सुबह और शाम पौधे की पुत्री रूप मेें सेवा की। बुधवार को तुलसी जी की बारात बदायूं रोड स्थित सर्वोदय कालोनी के साईं मंदिर से गाजे बाजे के साथ चलकर सर्किट हाउस चौराहा स्थित हैडिल कालोनी के मंदिर में सुबह नौ बजे पहुंची। सालिग्राम को श्यामा जू श्याम नाम दिया गया जिसका स्वागत शमा गुप्ता, रूबी सक्सेना ने किया। पंडित सतेंद्र मोहन शास्त्री ने मंत्रोच्चारण के साथ विवाह संपन्न कराया। दोपहर दो बजे तुलसी जी को सालिग्राम के साथ विदा कर दिया गया। तुलसी जी को स्त्री धन के रूप में नथ, कंगन, मंगलसूत्र के अलावा वर्तन और रजाई गद्दा भी दिया गया है। इस भव्य कार्यक्रम के लिए अंशु, माया, शशि मेहरा, सुमन अग्रवाल आदि महिलाओं ने सहयोग किया।