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पटाखों से कर लें तौबा.. कहीं दिवाली की खुशियां झुलसा न दे बारूद

Mon, 02 Nov 2020 01:05 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 02 Nov 2020 01:05 AM IST
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Do it with firecrackers .. May not give happiness to Diwali
crackers - फोटो : अमर उजाला

घाव में सड़न फैलाते है केमिकल, अंगभंग की भी आती है नौबत
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बीते सालों में अवैध पटाखा फैक्टरी में विस्फोट से हो चुकी हैं कई मौतें

बरेली। वातावरण को प्रदूषित करने के साथ ही घातक बीमारियों का शिकार बनाने वाले पटाखे अक्सर त्योहार की खुशियों पर भी भारी पड़ते हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, आमतौर पर दूसरे त्योहारों पर ओपीडी सामान्य ही रहती है, मगर दिवाली की शाम से अगले करीब दस दिनों में पटाखों से झुलसने और हार्टअटैक के मामले बढ़ जाते हैं। बीते सालों में कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब पटाखों की चपेट में आए लोगों के लिए खुशियों की रात त्रासदी बन गई। डॉक्टरों ने शहरवासियों से पटाखों से दूर रहने की अपील की है।
जिला और निजी अस्पताल की इमरजेंसी में दिवाली पर 30 फीसदी पीड़ित पटाखों की चपेट में आने वाले पहुंचते हैं। इनमें हाथ, चेहरा जलने के सर्वाधिक और पांव या शरीर के अन्य किसी भाग पर जलने के मामले कम होते हैं। जिला अस्पताल के वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. वागीश वैश्य के मुताबिक पटाखों से झुलसने और साधारण जलने का अलग-अलग असर होता है। पटाखों की जलन सड़न में तब्दील हो सकती है। अगर, सही समय पर इलाज न हो तो जहां बारूद से घाव होता है, वहां सड़न पैदा होने लगती है। तब उस भाग को हटाना पड़ता है। वहीं, आमतौर पर जलने में इलाज या प्लास्टिक सर्जरी से जख्म सही होने की उम्मीद रहती है। कई ऐसे मामले भी सामने आते हैं जब डॉक्टरों को बेहद कड़े फैसले लेने पड़ते हैं। उन्होंने पटाखों से दूरी बनाने की अपील शहरवासियों से की है। कहा, दीप जलाकर, घर सजाकर भी दिवाली की खुशियां मना सकते हैं। पटाखे जरूरी नहीं हैं।
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बच्चे और बुजुर्ग सर्वाधिक होते हैं शिकार

आईएमए के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. विनोद पागरानी के मुताबिक, अस्पताल में दिवाली पर पटाखों से जलने के कई मरीज पहुंचते हैं। इनमें बच्चों और बुजुर्गों की तादाद ज्यादा रहती है। बुजुर्ग पटाखे नहीं चलाते, मगर उसके धुएं से उन्हें बेचैनी, सांस फूलने या हार्टअटैक जैसी समस्याएं होती है। वहीं, बच्चों में ज्यादातर झुलसने के मामले होते हैं। दो साल पहले एक बच्चे का हाथ इस कदर जख्मी हो गया था कि उसे काटना पड़ा था।
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मामले जब पटाखे साबित हुए मौत का कारोबार

केस-1
अवैध पटाखा फैक्टरी के लिए बहेड़ी का शेखूपुर टांडा गांव वर्षों से चर्चा में रहा है। सितंबर, 2015 में मोहल्ले के छोटे खां उर्फ बाबू पड़ोसी विजय समेत आधा दर्जन लोगों के साथ पटाखा बना रहे थे। अचानक विस्फोट हुआ, इसमें बाबू और विजय की मौके पर ही मौत हो गई थी। अन्य लोग गंभीर रूप से झुलस गए थे।

केस-2
गांव सकरस में 21 अक्तूबर, 2016 को अवैध ढंग से पटाखा बनाते समय विस्फोट हुआ था। इसमें कासिम नाम के युवक की मौत हो गई थी। बताते हैं कि उसके परिजन आज भी उसकी मौत के लिए जिम्मेदार पटाखा कारोबारी को सजा दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

केस-3
सिरौली के हरदासपुर में 31 अक्तूबर, 2016 को साप्ताहिक बाजार लगी थी। दीपावली के कारण बाजार में अवैध पटाखे की दुकानें भी सजी थीं। दोपहर में अचानक आग लगने से अहमद हसन, अकील अहमद की मौत हो गई थी। घटना में घायल हुए लोगों ने इसके बाद से पटाखा से तौबा ही कर ली।

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