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डेलापीर तालाब कब्जा प्रकरणः जिस जमीन के अब इतने दीवाने.. 69 साल पहले उसकी कीमत 3906 रुपये पांच आने

Sun, 14 Feb 2021 01:11 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 14 Feb 2021 01:11 AM IST
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Delapir Talab Possession Case: The land that is so crazy now .. 69 years ago its price was 3906 rupees five.
demo photo - फोटो : अमर उजाला

म्यूनिसिपल बोर्ड ने 1952 में शहरी विकास योजना के तहत नीलाम किए थे आवासीय प्लॉट

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बरेली। डेलापीर तालाब की जिस जमीन को लेकर अब खींचतान मची है और तमाम लोग इसे कब्जाने में लगे हैं, 69 साल पहले उसकी कीमत सिर्फ 3906 रुपये पांच आने थी। तत्कालीन म्यूनिसिपल बोर्ड ने सन् 1952 में शहरी विकास योजना के तहत इतनी रकम में उसे नीलाम किया था।
करीब 69 साल पहले म्यूनिसिपल बोर्ड ने शहरी विकास के लिए सिटी इंप्रूवमेंट स्कीम बनाई थी। इसके तहत उदयपुर खास, बिहारमान नगला समेत तीन गांव म्यूनिसिपल बोर्ड ने अपने दायरे में शामिल किए थे। आवासीय समस्या को हल करने के लिए इन स्थानों पर प्लॉटिंग की थी। इनकी नीलामी प्रक्रिया 1951 में शुरू हुई। एक साल बाद उनकी रजिस्ट्री होने लगी। डेलापीर तालाब की जमीन की कीमत इस समय भले ही करोड़ों रुपये में आंकी जा रही है, मगर तब उदयपुर खास में तालाब के पास नीलाम हुए दो आवासीय प्लॉट मात्र 3906 रुपये पांच आने में अवध बिहारी लाल ने खरीदे थे। तत्कालीन अभिलेखों के मुताबिक म्यूनिसिपल बोर्ड ने इसकी रजिस्ट्री 11 फरवरी 1955 को की थी। नीलामी शर्तों के मुताबिक आवंटित प्लॉट पर आवासीय गतिविधियों के लिए अनुमति दी गई। साथ ही यह भी शर्त थी कि तीन साल में निर्माण होना आवश्यक है, अन्यथा बिना किसी खर्च के जमीन वापस ले ली जाएगी। मगर आवंटित प्लॉटों पर अब तक निर्माण नहीं हो पाया है। जब प्लॉटों की नीलामी हुई थी तब चिह्नित क्षेत्रों में स्थिति अच्छी नहीं थी। ऊबड़-खाबड़ और जंगल जैसा माहौल था इसलिए प्लॉट आवंटन के बाद 25 साल तक वहां आवासीय गतिविधियां ही शुरू नहीं हो सकीं।
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वहीं 80 के दशक में आवास विकास परिषद खास ने उदयपुर खास आवासीय योजना घोषित कर दी। बड़े क्षेत्र में परिषद की इस योजना के आने के बाद जमीनों के दाम में उछाल आना शुरू हो गया। मौजूदा हालात ये हैं कि राजेंद्रनगर, डीडीपुरम आदि इलाकों में डेढ़ लाख रुपये प्रति वर्गमीटर तक जमीन बिक रही है। धीरे-धीरे पैसे बढ़ते गए और आवंटित प्लॉट भी खो गए। तमाम संबंधित लोगों ने नापजोख कराई, जैसे जिसकी जुगाड़ हुई, वैसे ही चिह्नांकन करा लिया। बताया जाता है कि म्यूनिसिपल बोर्ड ने जो प्लॉट नीलाम किए थे, उन पर अन्य लोगों ने कब्जा कर लिया। अब जहां तालाब दिख है, वहां पर इसकी यही जगह बताई जा रही है। यही कारण इस मामले को अदालत तक ले जाया गया और प्रशासन ने नए सिरे से इसकी नापजोख व तालाब संरक्षण की कवायद शुरू कर दी है।
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