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कोरोना से रार.. मलेरिया पीठ पर न कर दे घातक वार
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पिछले साल तमाम लोगों की जान लेने वाले फैल्सीपेरम मलेरिया के इस बार भी बढ़ने लगे केस
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जिले में विवैक्स मलेरिया के 17 सौ और फैल्सीपेरम के 69 केस
बरेली। कोरोना से जूझते जिले के लोगों पर मलेरिया पीछे से वार करने की तैयारी में है। हालात इसलिए भी गंभीर होते माने जा रहे हैं क्योंकि मलेरिया से बचाव की स्वास्थ्य विभाग की तैयारियां फिलहाल कागजों में ही है। इस बीच जनवरी से अब तक जिले में रिकॉर्ड में दर्ज विवैक्स मलेरिया के 17 सौ और घातक फैल्सीपेरम के 69 केस आने वाले महीनों में परिस्थितियां भयावह होने का इशारा करने लगे हैं। पिछले साल मलेरिया के 34 हजार से ज्यादा केस जिले में रिकॉर्ड हुए थे जिनमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि मलेरिया की रोकथाम के लिए अभी से कारगर इंतजाम न किए गए तो दो महीने बाद हालात काबू से बाहर हो सकते हैं।
वैश्विक महामारी के तौर पर पहचान बनाने की वजह से कोरोना दहशत जरूर ज्यादा है लेकिन मलेरिया की तुलना में जिले में कोरोना के केस काफी कम हैं। पिछले सालों के आंकड़े भी साफ बताते हैं कि जिले में मलेरिया का कहर कोरोना के मुकाबले कई गुना ज्यादा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना के जिले में अब तक करीब छह सौ केस ही सामने आए हैं जबकि विवैक्स मलेरिया के करीब 17 सौ केस मिल चुके हैं। पिछले साल भी 34 हजार से ज्यादा लोग मलेरिया की चपेट में आए थे जिनमें से 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक मलेरिया का प्रकोप इस साल और भी भयंकर रुख लेता दिख रहा है। जनवरी से ही अब तक विवैक्स मलेरिया के 17 सौ रोगी मिल चुके हैं, फैल्सीपेरम के भी 69 मामले सामने आए हैं। फैल्सीपेरम के केस कम होने की वजह से अफसरों में लापरवाही साफ दिखाई दे रही है। जिले में संक्रामक रोग नियंत्रण पखवाड़ा की शुरुआत के बावजूद विवैक्स मलेरिया के बढ़ते प्रकोप को अनदेखा किया जा रहा है। कोरोना की वजह से स्वास्थ्य कर्मियों की कमी भी मलेरिया से बचाव की मुहिम में बाधक बन रही है।
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साल दर साल बढ़ रहा मलेरिया का प्रकोप
आंकड़े साफ इशारा कर रहे हैं कि साल दर साल जिले में मलेरिया का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। 2017 में जिले में मलेरिया के 2.12 लाख सैंपल की जांच हुई थी जिनमें 17 हजार लोग संक्रमित पाए गए थे। 2018 में 2.2 लाख जांच में 36 हजार रोगी मिले। 2019 में 2.94 लाख जांच में 17 हजार केस मिले। इस बार पांच लाख जांच का लक्ष्य तय किया गया है। आशंका जताई जा रही है कि इस बार मलेरिया के केस काफी ज्यादा हो सकते हैं, हालांकि कोरोना की वजह से जांच का लक्ष्य ही पूरा होना मुश्किल माना जा रहा है। विशेषज्ञ यह भी कह रहे हैं कि मलेरिया के मामले में स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड पर यकीन नहीं किया जा सकता। असलियत में मलेरिया का प्रकोप ज्यादा घातक हो सकता है।
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कागजी अभियान के चक्कर में चली गईं सैकड़ों जान
पिछले साल फैल्सीपेरम मलेरिया के जिले में हजारों मामले सामने आने के बावजूद अफसरों के लीपापोती में लगे रहने की वजह से हालात बेकाबू हो गए थे। शासन तक हड़कंप मचा तब कहीं अफसरों ने मलेरिया पर काबू पाने के लिए हाथ-पांव मारने शुरू किए। इस बीच स्वास्थ्य मंत्री, प्रभारी मंत्री और राज्य मंत्रियों के जिले में ताबड़तोड़ दौरे शुरू हो गए। स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी पर गाज भी गिरी जिसके बाद गंभीरता से मलेरिया पर काबू पाने के प्रयास शुरू हुए लेकिन तब तक तीन सौ से ज्यादा लोगों की जान चली गई।
क्वारंटीन होने के खौफ से छिपा रहे बुखार
स्वास्थ्य विभाग के अफसरों का कहना है कि कोरोना संक्रमण से लोगों को बचाने के लिए भले ही व्यापक स्तर पर कदम न उठाए जा रहे हों मगर संवेदनशील क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मी मलेरिया पीड़ितों को ट्रेस नहीं कर पा रहे हैं। बताया, जनवरी से मार्च तक तो लोगों ने बुखार होने पर मलेरिया की जांच कराई, लेकिन उसके बाद कोरोना संक्रमण शुरू होने पर उन्होंने कवारंटीन होने के डर से जांच ही करानी बंद कर दी। इससे स्थिति और गंभीर हो गई है। मलेरिया के बारे में पूछताछ करने पर भी लोग खुद को स्वस्थ बता देते हैं।
कोरोना से कई गुना खतरनाक है विवैक्स
संक्रामक रोग चैप्टर के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे डॉ. अतुल अग्रवाल का कहना है कि कोरोना वायरस से कई गुना ज्यादा खतरनाक विवैक्स मलेरिया है। कोरोना में ठीक होने के लिए तो सिर्फ इम्युनिटी की जरूरत होती है। इम्युनिटी बेहतर होने पर वायरस खुद ही खत्म हो जाता है, लेकिन विवैक्स या फैल्सीपेरम मलेरिया होने पर इम्युनिटी के साथ ही पूरे इलाज की जरूरत होती है। पिछले वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो अब तक सामने आए कोरोना के मामले मलेरिया से कई हजार गुना पीछे हैं। ऐसे में मलेरिया को नजरंदाज करना भारी पड़ सकता है।
कोर्स अधूरा छोड़ने से भी बढ़े विवैक्स मलेरिया के मरीज
विशेषज्ञों के मुताबिक, अबकी बार विवैक्स मलेरिया के केस 17 सौ तक जा पहुंचे हैं, वहीं फैल्सीपेरम मलेरिया से 67 मामले ही सामने आए हैं, जो पिछले साल की अपेक्षा आधे से भी कम हैं। डॉ. अतुल का कहना है कि विवैक्स का इलाज 14 दिन का होता है, लेकिन पांच-छह दिन तक दवा खाने के बाद ही मरीज स्वस्थ हो जाता है और दवा खाना बंद कर देता है, जबकि मलेरिया का असर खत्म करने के लिए 14 दिन तक दवा खाने की जरूरत होती है। इसीलिए विवैक्स के मामले बढ़ रहे हैं। फैल्सीपेरम का इलाज तीन दिन का होता है। रोगी को स्वास्थ्य टीम की निगरानी में ही दवा दी जाती है। कोर्स पूरा होने के बाद मरीज के दोबारा संक्रमित होने की आशंका कम होती है।
सभी गांवों में युद्धस्तर पर अभियान चल रहा है। ऐसे ब्लॉक जहां पिछले साल मलेरिया ज्यादा फैला था, वहां विशेष तौर पर स्क्रीनिंग और जांच कराई जा रही है। संवेदनशील ब्लॉकों में एक्टिव केस सर्च करने के लिए जांच शुरू करा दी गई है। - डॉ. विनीत शुक्ल, सीएमओ
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जिले में विवैक्स मलेरिया के 17 सौ और फैल्सीपेरम के 69 केस बरेली। कोरोना से जूझते जिले के लोगों पर मलेरिया पीछे से वार करने की तैयारी में है। हालात इसलिए भी गंभीर होते माने जा रहे हैं क्योंकि मलेरिया से बचाव की स्वास्थ्य विभाग की तैयारियां फिलहाल कागजों में ही है। इस बीच जनवरी से अब तक जिले में रिकॉर्ड में दर्ज विवैक्स मलेरिया के 17 सौ और घातक फैल्सीपेरम के 69 केस आने वाले महीनों में परिस्थितियां भयावह होने का इशारा करने लगे हैं। पिछले साल मलेरिया के 34 हजार से ज्यादा केस जिले में रिकॉर्ड हुए थे जिनमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि मलेरिया की रोकथाम के लिए अभी से कारगर इंतजाम न किए गए तो दो महीने बाद हालात काबू से बाहर हो सकते हैं।
वैश्विक महामारी के तौर पर पहचान बनाने की वजह से कोरोना दहशत जरूर ज्यादा है लेकिन मलेरिया की तुलना में जिले में कोरोना के केस काफी कम हैं। पिछले सालों के आंकड़े भी साफ बताते हैं कि जिले में मलेरिया का कहर कोरोना के मुकाबले कई गुना ज्यादा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना के जिले में अब तक करीब छह सौ केस ही सामने आए हैं जबकि विवैक्स मलेरिया के करीब 17 सौ केस मिल चुके हैं। पिछले साल भी 34 हजार से ज्यादा लोग मलेरिया की चपेट में आए थे जिनमें से 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक मलेरिया का प्रकोप इस साल और भी भयंकर रुख लेता दिख रहा है। जनवरी से ही अब तक विवैक्स मलेरिया के 17 सौ रोगी मिल चुके हैं, फैल्सीपेरम के भी 69 मामले सामने आए हैं। फैल्सीपेरम के केस कम होने की वजह से अफसरों में लापरवाही साफ दिखाई दे रही है। जिले में संक्रामक रोग नियंत्रण पखवाड़ा की शुरुआत के बावजूद विवैक्स मलेरिया के बढ़ते प्रकोप को अनदेखा किया जा रहा है। कोरोना की वजह से स्वास्थ्य कर्मियों की कमी भी मलेरिया से बचाव की मुहिम में बाधक बन रही है।
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साल दर साल बढ़ रहा मलेरिया का प्रकोप
आंकड़े साफ इशारा कर रहे हैं कि साल दर साल जिले में मलेरिया का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। 2017 में जिले में मलेरिया के 2.12 लाख सैंपल की जांच हुई थी जिनमें 17 हजार लोग संक्रमित पाए गए थे। 2018 में 2.2 लाख जांच में 36 हजार रोगी मिले। 2019 में 2.94 लाख जांच में 17 हजार केस मिले। इस बार पांच लाख जांच का लक्ष्य तय किया गया है। आशंका जताई जा रही है कि इस बार मलेरिया के केस काफी ज्यादा हो सकते हैं, हालांकि कोरोना की वजह से जांच का लक्ष्य ही पूरा होना मुश्किल माना जा रहा है। विशेषज्ञ यह भी कह रहे हैं कि मलेरिया के मामले में स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड पर यकीन नहीं किया जा सकता। असलियत में मलेरिया का प्रकोप ज्यादा घातक हो सकता है।
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पिछले साल फैल्सीपेरम मलेरिया के जिले में हजारों मामले सामने आने के बावजूद अफसरों के लीपापोती में लगे रहने की वजह से हालात बेकाबू हो गए थे। शासन तक हड़कंप मचा तब कहीं अफसरों ने मलेरिया पर काबू पाने के लिए हाथ-पांव मारने शुरू किए। इस बीच स्वास्थ्य मंत्री, प्रभारी मंत्री और राज्य मंत्रियों के जिले में ताबड़तोड़ दौरे शुरू हो गए। स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी पर गाज भी गिरी जिसके बाद गंभीरता से मलेरिया पर काबू पाने के प्रयास शुरू हुए लेकिन तब तक तीन सौ से ज्यादा लोगों की जान चली गई।क्वारंटीन होने के खौफ से छिपा रहे बुखार
स्वास्थ्य विभाग के अफसरों का कहना है कि कोरोना संक्रमण से लोगों को बचाने के लिए भले ही व्यापक स्तर पर कदम न उठाए जा रहे हों मगर संवेदनशील क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मी मलेरिया पीड़ितों को ट्रेस नहीं कर पा रहे हैं। बताया, जनवरी से मार्च तक तो लोगों ने बुखार होने पर मलेरिया की जांच कराई, लेकिन उसके बाद कोरोना संक्रमण शुरू होने पर उन्होंने कवारंटीन होने के डर से जांच ही करानी बंद कर दी। इससे स्थिति और गंभीर हो गई है। मलेरिया के बारे में पूछताछ करने पर भी लोग खुद को स्वस्थ बता देते हैं।कोरोना से कई गुना खतरनाक है विवैक्स
संक्रामक रोग चैप्टर के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे डॉ. अतुल अग्रवाल का कहना है कि कोरोना वायरस से कई गुना ज्यादा खतरनाक विवैक्स मलेरिया है। कोरोना में ठीक होने के लिए तो सिर्फ इम्युनिटी की जरूरत होती है। इम्युनिटी बेहतर होने पर वायरस खुद ही खत्म हो जाता है, लेकिन विवैक्स या फैल्सीपेरम मलेरिया होने पर इम्युनिटी के साथ ही पूरे इलाज की जरूरत होती है। पिछले वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो अब तक सामने आए कोरोना के मामले मलेरिया से कई हजार गुना पीछे हैं। ऐसे में मलेरिया को नजरंदाज करना भारी पड़ सकता है।कोर्स अधूरा छोड़ने से भी बढ़े विवैक्स मलेरिया के मरीज
विशेषज्ञों के मुताबिक, अबकी बार विवैक्स मलेरिया के केस 17 सौ तक जा पहुंचे हैं, वहीं फैल्सीपेरम मलेरिया से 67 मामले ही सामने आए हैं, जो पिछले साल की अपेक्षा आधे से भी कम हैं। डॉ. अतुल का कहना है कि विवैक्स का इलाज 14 दिन का होता है, लेकिन पांच-छह दिन तक दवा खाने के बाद ही मरीज स्वस्थ हो जाता है और दवा खाना बंद कर देता है, जबकि मलेरिया का असर खत्म करने के लिए 14 दिन तक दवा खाने की जरूरत होती है। इसीलिए विवैक्स के मामले बढ़ रहे हैं। फैल्सीपेरम का इलाज तीन दिन का होता है। रोगी को स्वास्थ्य टीम की निगरानी में ही दवा दी जाती है। कोर्स पूरा होने के बाद मरीज के दोबारा संक्रमित होने की आशंका कम होती है।सभी गांवों में युद्धस्तर पर अभियान चल रहा है। ऐसे ब्लॉक जहां पिछले साल मलेरिया ज्यादा फैला था, वहां विशेष तौर पर स्क्रीनिंग और जांच कराई जा रही है। संवेदनशील ब्लॉकों में एक्टिव केस सर्च करने के लिए जांच शुरू करा दी गई है। - डॉ. विनीत शुक्ल, सीएमओ