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बाकरगंज में ‘खूनी’ मांझे का कारोबार- हवा में उड़ रहे ‘आरडीएक्स’ और ‘एके-47’

Wed, 03 Jul 2019 02:19 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Wed, 03 Jul 2019 02:19 AM IST
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chinese manjha
बरेली। बाकरगंज में ‘खूनी’ मांझे का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। यह मांझा जितना खतरनाक है, उनके नाम भी उतने ही डरावने रखे गए हैं। बाजार में यह मांझा आरडीएक्स, एके-47, आसमानी धमाका, काला सोना, ब्लैड जैसी धार वाला, खूनी सहित कई नामों से बिक रहा है। गंधक, पोटाश, शीशा और यहां तक की बारूद मिलाकर बनने वाले इन मांझे की कीमत सामान्य से कई गुना ज्यादा है। इन मांझों में इतनी ज्यादा धार है कि यह मांझा टूटे बिना पूरे धड़ को अलग कर सकता है। इसकी डिमांड बरेली सहित यूपी के दूसरे शहरों में ही नहीं, बल्कि दिल्ली, लुधियाना, बंगाल तक है। बावजूद इसके प्रशासन ने इसकी बिक्री पर रोक लगाने के लिए कोई शिकंजा नहीं कसा है।
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इस मांझे को बनाने के लिए बाकरगंज में 25 से ज्यादा कारखाने लगे हैं। बांस मंडी, सुनहरी मस्जिद सहित कई जगहों पर दुकानदार इसकी रोजाना लाखों रुपये में बिक्री करते हैं। सामान्य मांझा धागे और उस पर कांच के पाउडर को लपेटकर बनाया जाता है। आमतौर पर एक कोन पर करीब 2000 मीटर मांझा होता है और इसकी कीमत 400 से लेकर 450 रुपये तक होती है, जबकि बाकरगंज के कारखाने में बनने वाले इतने मीटर मांझे की कीमत 2200 से लेकर 2800 रुपये तक होती है। पांच से सात गुना महंगे इन मांझों को नौ, 12 और 16 तार को गुथकर बनाया जाता है। इस मांझे को अटूट और पैना बनाने के लिए गंधक, पोटाश के साथ कुछ बारूद का भी इस्तेमाल होता है। यह मांझा इतना ज्यादा खतरनाक है कि इसे छूने से शरीर का कोई भी हिस्सा पलक झपकते ही कट सकता है। बताते हैं कि यह मांझा बाकरगंज में बनता है, लेकिन इसकी बिक्री बास मंडी, सुनहरी मस्जिद, सराय खाम आदि जगहों पर होती है। एक व्यापारी ने बताया कि एक कारखाने से हर दिन तीन से पांच लाख रुपये तक के मांझे की सप्लाई यूपी के साथ देशभर के तमाम हिस्सों में होती है।
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...तो इसलिए पकड़ में नहीं आता है दिल्ली से आने वाला चाइनीज मांझा
एक मांझा कारोबारी ने बताया कि प्लास्टिक से बना प्रतिबंधित चाइनीज मांझा लालकुआं (दिल्ली) से मंगाया जाता है। यहां के कई कारोबारी हर माह सैकड़ों क्विंटल यह मांझा मंगवाते हैं। इसकी बिक्री इसलिए ज्यादा है क्योंकि इसकी छह हजार मीटर की मांझे की चरखी मात्र सौ से डेढ़ सौ रुपये तक में मिल जाती है। यह मांझा पकड़ में न आए इसलिए इस पर भारत में उत्पादित होने का अलग से रेपर लगा दिया जाता है। करीब सात साल पहले बनना शुरू हुआ चाइनीज मांझा धीरे-धीरे स्वदेशी मांझे के गढ़ बरेली में भी अपनी मजबूत पकड़ बना चुका है। शुरू में ही इससे हुए हादसे पर कारोबारियों और लोगों ने इसका विरोध शुरू किया। हालात ये हुए कि यहां के असल मांझे का निर्यात लगातार कम होता गया। गौरतलब है कि बरेली का मांझा प्रधानमंत्री तक की चुनावी सभाओं का हिस्सा रहा है।
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दो साल पहले 200 क्विंटल पकड़ा गया था चाइनीज मांझा
करीब दो साल पहले किला स्थित लीची बाग ट्रांसपोर्ट पर दो सौ क्विंटल मांझा पकड़ा गया था। यह मांझा सुनहरी मस्जिद के एक व्यापारी का था। कानूनी प्रक्रिया चली नहीं, बाद में मामला ठंडा पड़ गया। साल की शुरूआत में भी प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की थी, लेकिन बाद में अधिकारियों ने इस मुहिम को ठंडा कर दिया।


प्रतिबंधित मांझे की बिक्री करने वालों की धरपकड़ को चलेगा अभियान
सोमवार को सिटी मजिस्ट्रेट संजय कुमार ने बासमंडी और सराय खाम में प्रतिबंधित मांझे की बिक्री करने वाले दुकानदारों की धरपकड़ के लिए छापेमार कार्रवाई की थी, लेकिन सूचना लीक हो जाने से दुकानदार पकड़ में नहीं आए। प्रशासन फिर से इस कारोबार से जुड़े लोगों को गुपचुप चिह्नित कर रहा है। जल्द ही एक बार फिर छापामार कार्रवाई की प्लानिंग बनाई जा रही है।
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