{"_id":"5ae8ccb34f1c1b23338b61da","slug":"bribe-want-against-declaring-handicape","type":"story","status":"publish","title_hn":"घूस दे तभी महेश को माना जाएगा दिव्यांग ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
घूस दे तभी महेश को माना जाएगा दिव्यांग
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बरेली
Updated Wed, 02 May 2018 01:53 AM IST
विज्ञापन
handicape
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
महेश के दोनों पैर नहीं हैं। जमीन-जायदाद जैसी चीजों के नाम उसके लिए छलावा हैं। सिर छिपाने के लिए नाम पर महज पन्नी की छत है। जाहिर ही है कि उसकी कमाई का कोई जरिया नहीं है। जीवन इतनी मुश्किलों से भरा है कि न कोई उससे अपनी बेटी ब्याहने को तैयार हुआ न उसकी खुद की हिम्मत कभी शादी करने की हुई। महेश को मदद की दरकार है लेकिन सरकारी सिस्टम अपने हाथ इसलिए नहीं बढ़ा रहा है क्योंकि दूसरों के रहमोकरम पर जिंदा ये दिव्यांग कदम-कदम पर मौजूद घूसखोर बाबुओं की जेबें नहीं गर्म कर सकता। यही वजह है कि दुनिया के सामने महेश भले ही लाचार हो, लेकिन सरकारी व्यवस्था उसे दिव्यांग नहीं मान रही है। इसी कारण सीएमओ दफ्तर से उसका सर्टिफिकेट भी नहीं बन पा रहा है।
किसी को भी झकझोर देने वाली ये दास्तां भोजीपुरा के परसोली गांव के रहने वाले महेश पाल की है। खुद को दिव्यांग साबित करने वाला सर्टिफिकेट न मिल पाने से उसे गांव से शहर तक आने के लिए उसे किराए में कोई राहत नहीं मिल रही। उसके पास न रहने को घर है और न ही पेट पालने के लिए कोई जरिया। इसलिए सरकार के आगे हाथ फैलाने के अलावा उसके पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है, लेकिन दिक्कत यह है कि जिला मुख्यालय तक आने के लिए उसे हर बार 50 रुपये किराए के देने पड़ते हैं। शहर में टेंपो वाले को रहम आ गया तो बैठा लिया नहीं तो एक से दूसरी जगह जाने के लिए घिसट कर चलने के अलावा वह कुछ नहीं कर सकता।
पेंशन की आस में वह जाने कितनी बार विकास भवन के चक्कर काट चुका है, लेकिन वहां उसकी सुनने वाला नहीं है। वह कहता है कि उस गरीब और लाचार को तो सरकारी मदद से आवास मिल जाए तो सिर छिपाने की जगह मिल जाए, लेकिन जहां जाओ, वहां पैसे की बात पहले होती है। यहां खाने को लाले हैं तो कर्मचारियों को खुश करने के पैसे कहां से लाएं। महेश पाल की ये बातें गले तक भ्रष्टाचार में डूब चुके सरकारी सिस्टम की हकीकत बयां करने वाला है। न जाने कब इस दिव्यांग की आह ऊंची कुर्सी पर बैठे अफसरों के कान तक पहुंचेंगी।
विज्ञापन
विज्ञापन
किसी को भी झकझोर देने वाली ये दास्तां भोजीपुरा के परसोली गांव के रहने वाले महेश पाल की है। खुद को दिव्यांग साबित करने वाला सर्टिफिकेट न मिल पाने से उसे गांव से शहर तक आने के लिए उसे किराए में कोई राहत नहीं मिल रही। उसके पास न रहने को घर है और न ही पेट पालने के लिए कोई जरिया। इसलिए सरकार के आगे हाथ फैलाने के अलावा उसके पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है, लेकिन दिक्कत यह है कि जिला मुख्यालय तक आने के लिए उसे हर बार 50 रुपये किराए के देने पड़ते हैं। शहर में टेंपो वाले को रहम आ गया तो बैठा लिया नहीं तो एक से दूसरी जगह जाने के लिए घिसट कर चलने के अलावा वह कुछ नहीं कर सकता।
विज्ञापन
पेंशन की आस में वह जाने कितनी बार विकास भवन के चक्कर काट चुका है, लेकिन वहां उसकी सुनने वाला नहीं है। वह कहता है कि उस गरीब और लाचार को तो सरकारी मदद से आवास मिल जाए तो सिर छिपाने की जगह मिल जाए, लेकिन जहां जाओ, वहां पैसे की बात पहले होती है। यहां खाने को लाले हैं तो कर्मचारियों को खुश करने के पैसे कहां से लाएं। महेश पाल की ये बातें गले तक भ्रष्टाचार में डूब चुके सरकारी सिस्टम की हकीकत बयां करने वाला है। न जाने कब इस दिव्यांग की आह ऊंची कुर्सी पर बैठे अफसरों के कान तक पहुंचेंगी।
विज्ञापन