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ब्राजील भूख से मुक्त हो सकता है भारत क्यों नहीं
ब्यूरो/अमर उजाला, बरेली
Updated Fri, 16 Dec 2016 02:29 AM IST
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Brazil to be free from hunger, why not India
- फोटो : बरेली, अमर उजाला
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राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी के पूर्व अध्यक्ष एवं केंद्रीय कृषि विश्व विद्यालय इंफाल के कुलपति डा. आरबी सिंह ने कहा कि भारत में दुनिया के 40 फीसदी बच्चे भूख और कुपोषण से ग्रस्त है। ऐसे में इन बच्चों के लिए विकास की योजनाएं बनाने और उनका क्रियान्वयन कराने की जिम्मेदारी हम सभी वैज्ञानिकों की है। उन्होंने कहा कि जब ब्राजील जैसा देश दस साल के अभियान में कुपोषण से मुक्त हो गया, हम और हमारा देश भारत कुपोषण और भूख से मुक्त क्यों नहीं हो सकता। इसके लिए हम सबी वैज्ञानिकों को चाहिए कि जनता की जरूरत वाले कामों पर रिसर्च करें और उसका लाभ जनता को दिलाएं।
भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान परिषद इज्जतनगर में कृषि अर्थशास्त्र शोध संघ की ओर से ‘पोषण सुरक्षा के लिए कृषि’ पर तीन दिवसीय संगोष्ठी में मुख्य अतथि आरबी सिंह ने कहा कि आज ब्राजील की गाय होलस्टीन और फ्रीयिजयन गांवों से अधिक दूध दे रहीं हैं। जबकि भारत की साहीवाल और कंकरेज गायें कम दूध दे रहीं हैं। इस पर पशु विज्ञानियों को ध्यान देने की जरूरत है। खेतों को विकसित करने के लिए अर्थशास्त्र और तकनीक की आवश्यक्ता है, तभी हम लैब और लेंड तकनीक का किसानों को दिला सकेंगे। क्योंकि दिनों दिन जमीन की कमी आ रही है।
संस्थान के निदेशक आर के सिंह ने कहा कि पशु धन और खाद्य सुरक्षा आवश्यक अंग है। इसके लिए पशु रोग पर नियंत्रण जरू री है। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र और जानपदिक में गहरा रिश्ता है। जिससे पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकता है। कृषि अर्थशास्त्र शोध संघ के अध्यक्ष पद्युमन कुमार ने कहा कि देश में कुषोषण के लिए साक्षरता की कमी है। जब तक हम साक्षर नहीं होंगे, तब तक हम गरीबी और भूख को कम नहीं किया जा सकता। उन्होंने गरीबों को दान के स्थान पर विकास के अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया।
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कृषि अर्थशास्त्र शोध संघ (ऐरा)के अध्यक्ष पीजी चेंगप्पा ने कहा कि कई पोषणपूर्ण खाद्य विलुप्त हो रहे हैं, जो कि चिंता का विषय है। संगोष्ठी में डा. संजय कुमार, एसवीएस मलिक, डा. डी वर्धन आदि मौजूद थे।
विलेज ही ग्लोबल है, ग्लोबल ही विजेल
केंद्रीय कृषि विश्व विद्यालय इंफाल के कुलपति पद्मभूषण आर बी सिंह ने कहा कि विलेज ही ग्लोबल है, ग्लोबल ही विलेज। इसलिए गांवों की संपन्नता और विकास की जरूरत है। किसानों की जोत कम होने के साथ-साथ आमदनी घट रही है। ऐसे में किसानों का रुझान पशुधन की ओर बढ़ाया जाए, दुग्ध उत्पादन हो। देशी नस्ल की साहीवाल आदि गायों के दूध का उत्पादन बढ़ाएं। ये गाय 10 से 12 लीटर तक दूध दे सकती है लेकिन पांच से छह लीटर ही दूध दे रहीं हैं। इन गायों का दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए अच्छा चारा तथा स्वस्थ्य रखें।
गेस्ट हाउस में पत्रकारों से वार्ता करते हुए प्रोेफेसर सिंह ने कहा कि देशभर में अमूल की तर्ज पर डेयरी का विकास हो। इस समय अमूल ने ‘के टू’ नाम से भारतीय गाय के दूध में अधिक प्रोटीन ईजाद किया है। इस तरह की व्यवस्था उत्तर भारत के राज्यों में हो सकती है। इसके लिए कि सानों को सहकारिता से जोड़ना होगा, अन्यथा गंभीर स्थिति पैदा होगी। सरकार की योजनाएं गलत नहीं होती हैं, उनका क्रियान्वयन ईंमानदारी से नहीं होता है। हमको योजनाओं का क्रियान्वय ईमानदारी से करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सब्सिडी का लाभ सभी को नहीं बल्कि गरीब और जरूरतमंद किसान को मिले।
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भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान परिषद इज्जतनगर में कृषि अर्थशास्त्र शोध संघ की ओर से ‘पोषण सुरक्षा के लिए कृषि’ पर तीन दिवसीय संगोष्ठी में मुख्य अतथि आरबी सिंह ने कहा कि आज ब्राजील की गाय होलस्टीन और फ्रीयिजयन गांवों से अधिक दूध दे रहीं हैं। जबकि भारत की साहीवाल और कंकरेज गायें कम दूध दे रहीं हैं। इस पर पशु विज्ञानियों को ध्यान देने की जरूरत है। खेतों को विकसित करने के लिए अर्थशास्त्र और तकनीक की आवश्यक्ता है, तभी हम लैब और लेंड तकनीक का किसानों को दिला सकेंगे। क्योंकि दिनों दिन जमीन की कमी आ रही है।
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संस्थान के निदेशक आर के सिंह ने कहा कि पशु धन और खाद्य सुरक्षा आवश्यक अंग है। इसके लिए पशु रोग पर नियंत्रण जरू री है। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र और जानपदिक में गहरा रिश्ता है। जिससे पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकता है। कृषि अर्थशास्त्र शोध संघ के अध्यक्ष पद्युमन कुमार ने कहा कि देश में कुषोषण के लिए साक्षरता की कमी है। जब तक हम साक्षर नहीं होंगे, तब तक हम गरीबी और भूख को कम नहीं किया जा सकता। उन्होंने गरीबों को दान के स्थान पर विकास के अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया।
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कृषि अर्थशास्त्र शोध संघ (ऐरा)के अध्यक्ष पीजी चेंगप्पा ने कहा कि कई पोषणपूर्ण खाद्य विलुप्त हो रहे हैं, जो कि चिंता का विषय है। संगोष्ठी में डा. संजय कुमार, एसवीएस मलिक, डा. डी वर्धन आदि मौजूद थे।
विलेज ही ग्लोबल है, ग्लोबल ही विजेल
केंद्रीय कृषि विश्व विद्यालय इंफाल के कुलपति पद्मभूषण आर बी सिंह ने कहा कि विलेज ही ग्लोबल है, ग्लोबल ही विलेज। इसलिए गांवों की संपन्नता और विकास की जरूरत है। किसानों की जोत कम होने के साथ-साथ आमदनी घट रही है। ऐसे में किसानों का रुझान पशुधन की ओर बढ़ाया जाए, दुग्ध उत्पादन हो। देशी नस्ल की साहीवाल आदि गायों के दूध का उत्पादन बढ़ाएं। ये गाय 10 से 12 लीटर तक दूध दे सकती है लेकिन पांच से छह लीटर ही दूध दे रहीं हैं। इन गायों का दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए अच्छा चारा तथा स्वस्थ्य रखें।
गेस्ट हाउस में पत्रकारों से वार्ता करते हुए प्रोेफेसर सिंह ने कहा कि देशभर में अमूल की तर्ज पर डेयरी का विकास हो। इस समय अमूल ने ‘के टू’ नाम से भारतीय गाय के दूध में अधिक प्रोटीन ईजाद किया है। इस तरह की व्यवस्था उत्तर भारत के राज्यों में हो सकती है। इसके लिए कि सानों को सहकारिता से जोड़ना होगा, अन्यथा गंभीर स्थिति पैदा होगी। सरकार की योजनाएं गलत नहीं होती हैं, उनका क्रियान्वयन ईंमानदारी से नहीं होता है। हमको योजनाओं का क्रियान्वय ईमानदारी से करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सब्सिडी का लाभ सभी को नहीं बल्कि गरीब और जरूरतमंद किसान को मिले।