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बार चुनाव : अंतिम दिन 36 लोगों ने कराया नामांकन
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बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के लिए नामांकन कराने जाते अनिल द्विवेदी।
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14 दिसंबर को नाम वापसी, 20 को मतदान और 21 को घोषित होगा परिणाम
बरेली। बार एसोसिएशन चुनाव के लिए नामांकन की प्रक्रिया शुक्रवार को पूरी हो गई। अंतिम दिन विभिन्न पदों के लिए 36 अधिवक्ताओं ने नामांकन दाखिल किए। अब तक कुल 66 लोगों ने नामांकन कराया है। 13 दिसंबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी। 14 दिसंबर को नाम वापसी के बाद 20 दिसंबर को मतदान होगा। 21 दिसंबर को मतगणना के बाद परिणाम घोषित किया जाएगा।
मुख्य चुनाव अधिकारी सत्येंद्र शंकर सक्सेना के मुताबिक, शुक्रवार को अध्यक्ष पद पर चार लोगों ने नामांकन दाखिल किया। वरिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर दो, उपाध्यक्ष और कनिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर एक-एक, सचिव पद पर चार लोगों ने अपने नामांकन दाखिल किए। संयुक्त सचिव प्रशासन के लिए प्रदीप कुमार गंगवार, मुकेश गोस्वामी, मोहम्मद नसीम सैफी, संयुक्त सचिव प्रकाशन के लिए अंकित सक्सेना, संयुक्त सचिव पुस्तकालय के लिए संजय देव सिंह भदौरिया, रूपेश कुमार, कोषाध्यक्ष पद पर जयपाल सिंह कश्यप, कार्यकारिणी सदस्य वरिष्ठ पर अनिल गुप्ता, फिरोज मोहम्मद, संतोष मौर्य, अमित सिंह, धर्मनारायण शर्मा, मुरारी लाल, अमित अवस्थी, अशोक शर्मा, उपमेंद्र स्वरूप सक्सेना, कार्यकारिणी सदस्य कनिष्ठ पर रोहित कुमार, महेंद्र पाल, अनुज कुमार, प्रमोद गौरव, शुभ आशीष सिंह, उमेश खंडेलवाल, पुनीत आर्य और मनोज पांडेय ने नामांकन दाखिल कराया।
प्रमुख पदों के उम्मीदवार
अध्यक्ष : श्यामा नंदन सिंह गंगवार, शशिकांत शर्मा, अनिल द्विवेदी, अरविंद कुमार, मोतीराम मौर्य।
वरिष्ठ उपाध्यक्ष : विजय शर्मा, योगेश गिरि गोस्वामी, उदयवीर सिंह, अजय निम, राकेश श्रीवास्तव।
उपाध्यक्ष : स्वतंत्र पाठक, अमित सिंह, विजयपाल, अमित सक्सेना, अनुपम अग्रवाल।
कनिष्ठ उपाध्यक्ष : अनुज गंगवार, ललित सिंह।
सचिव : वीपी ध्यानी, शेर सिंह, अजय शर्मा, शशिकांत तिवारी, संजय वर्मा, धर्मवीर गुप्ता, मोहम्मद असलम।
कोषाध्यक्ष : जयपाल सिंह, सुनील सिंह नेगी, दीपक पांडे।
निवर्तमान अध्यक्ष घनश्याम शर्मा इस बार चुनाव मैदान में नहीं
बरेली। बार एसोसिएशन के चुनाव में लंबे समय बाद ऐसा हुआ है कि जब निवर्तमान अध्यक्ष घनश्याम शर्मा चुनाव मैदान में नहीं हैं। वह 15 साल अध्यक्ष रहे हैं। सचिव अमर भारती के साथ उनकी जोड़ी बार एसोसिएशन में लंबे समय तक लोकप्रिय रही। पिछले दिनों कोरोना के चलते अमर भारती की मौत हो गई। अब घनश्याम शर्मा ने भी चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि अब वह चुनाव लड़ने के बजाय सपोर्ट करेंगे। इसके चलते चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है। संवाद
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हाथ उठाकर बनाया था अध्यक्ष
बाबू सोमपाल सिंह एडवोकेट कहते हैं कि उन्होंने 59 साल से कचहरी को बढ़ते देखा है। सन 1962 से वकालत कर रहे हैं। तब बार एसोसिएशन में 350 सदस्य हुआ करते थे। अब यह आंकड़ा 2056 तक पहुंच गया है। जमीन आसमान का फर्क हो गया है। वह 1988 में अध्यक्ष बने थे, तब चुनाव हाथ उठा कर होता था, लेकिन बाद में मतदान होने लगा। पहले पदाधिकारी आम राय से चुने जाते थे। चुनाव वकीलों की समस्याओं पर केंद्रित रहता था। अब जातिवाद चुनाव पर हावी रहता है। धनबल भी बढ़ गया है। पहले बैनर पोस्टर न के बराबर होते थे। कोई जीते या हारे, सब एकसाथ रहते थे।
एक साल होना चाहिए बार का कार्यकाल
वर्ष 2004-05 में सचिव रह चुके वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्र शेखर कहते हैं कि अब बार एसोसिएशन के चुनावों से मुद्दे गायब हो गए हैं। जो मुद्दे हैं भी, वे क्षणिक हैं। उम्मीदवारों को दूरदर्शी होना चाहिए। मगर अब वकीलों के हित की बात नहीं होती। जब वह सचिव थे तो भारी विरोध के बावजूद बार काउंसिल के मॉडल बाइलाज लागू किए। अब तो हाल यह है कि हम लोग यूपी बार काउंसिल से भी संबद्ध नहीं हैं। आम वकील को इस बारे में सोचना चाहिए। बरेली बार का कार्यकाल एक साल का होना चाहिए ताकि हर किसी को अपनी प्रशासनिक क्षमता दिखाने का अवसर मिले।
हार पहनाकर बना लेते थे अध्यक्ष
वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी के पद पर काम कर चुके अधिवक्ता जेडए खान कहते हैं कि पहले सिविल के किसी सीनियर वकील के पास हार लेकर पहुंच जाते थे और कहते थे कि बाबू जी आपको अध्यक्ष बनना है। उनके मना करने के बावजूद हार पहना दिया जाता था और वह अध्यक्ष बन जाते थे। मौलवी फखरुद्दीन अहमद खां को इसी तरह अध्यक्ष बनाया गया था। ऐसे ही फौजदारी के किसी सीनियर वकील को सचिव बना दिया जाता था। कार्यकारिणी के सदस्य बैठकर तय कर लेते थे। जब से बार चुनाव में पैसा हावी हुआ है, मुद्दे खत्म हो गए हैं। लायक उम्मीदवार मुश्किल से ही जीत पाते हैं।
अब तो धनबल से लड़ा जाता है चुनाव
फौजदारी के वरिष्ठ अधिवक्ता बाबू अब्दुल हमीद सिद्दीकी पुराने चुनाव को याद करते हुए कहते हैं कि अब बार एसोसिएशन का चुनाव आर्थिक लाभ हासिल करने के लिए ज्यादा प्रचलित हो गया है। मुख्य धारा की राजनीति की तरह यह चुनाव भी अब धनबल पर लड़ा जाने लगा है। जीत सुनिश्चित करने के लिए जातिवाद, लालच, दबाव सभी तरह के हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं। इस बार का चुनाव कुछ अलग हो तो कुछ अच्छी उम्मीद भी बंधे। कम से कम बडे़ पदों पर तो चुनाव निर्विरोध ही होने चाहिए।
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बरेली। बार एसोसिएशन चुनाव के लिए नामांकन की प्रक्रिया शुक्रवार को पूरी हो गई। अंतिम दिन विभिन्न पदों के लिए 36 अधिवक्ताओं ने नामांकन दाखिल किए। अब तक कुल 66 लोगों ने नामांकन कराया है। 13 दिसंबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी। 14 दिसंबर को नाम वापसी के बाद 20 दिसंबर को मतदान होगा। 21 दिसंबर को मतगणना के बाद परिणाम घोषित किया जाएगा।
मुख्य चुनाव अधिकारी सत्येंद्र शंकर सक्सेना के मुताबिक, शुक्रवार को अध्यक्ष पद पर चार लोगों ने नामांकन दाखिल किया। वरिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर दो, उपाध्यक्ष और कनिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर एक-एक, सचिव पद पर चार लोगों ने अपने नामांकन दाखिल किए। संयुक्त सचिव प्रशासन के लिए प्रदीप कुमार गंगवार, मुकेश गोस्वामी, मोहम्मद नसीम सैफी, संयुक्त सचिव प्रकाशन के लिए अंकित सक्सेना, संयुक्त सचिव पुस्तकालय के लिए संजय देव सिंह भदौरिया, रूपेश कुमार, कोषाध्यक्ष पद पर जयपाल सिंह कश्यप, कार्यकारिणी सदस्य वरिष्ठ पर अनिल गुप्ता, फिरोज मोहम्मद, संतोष मौर्य, अमित सिंह, धर्मनारायण शर्मा, मुरारी लाल, अमित अवस्थी, अशोक शर्मा, उपमेंद्र स्वरूप सक्सेना, कार्यकारिणी सदस्य कनिष्ठ पर रोहित कुमार, महेंद्र पाल, अनुज कुमार, प्रमोद गौरव, शुभ आशीष सिंह, उमेश खंडेलवाल, पुनीत आर्य और मनोज पांडेय ने नामांकन दाखिल कराया।
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प्रमुख पदों के उम्मीदवार
अध्यक्ष : श्यामा नंदन सिंह गंगवार, शशिकांत शर्मा, अनिल द्विवेदी, अरविंद कुमार, मोतीराम मौर्य।
वरिष्ठ उपाध्यक्ष : विजय शर्मा, योगेश गिरि गोस्वामी, उदयवीर सिंह, अजय निम, राकेश श्रीवास्तव।
उपाध्यक्ष : स्वतंत्र पाठक, अमित सिंह, विजयपाल, अमित सक्सेना, अनुपम अग्रवाल।
कनिष्ठ उपाध्यक्ष : अनुज गंगवार, ललित सिंह।
सचिव : वीपी ध्यानी, शेर सिंह, अजय शर्मा, शशिकांत तिवारी, संजय वर्मा, धर्मवीर गुप्ता, मोहम्मद असलम।
कोषाध्यक्ष : जयपाल सिंह, सुनील सिंह नेगी, दीपक पांडे।
निवर्तमान अध्यक्ष घनश्याम शर्मा इस बार चुनाव मैदान में नहीं
बरेली। बार एसोसिएशन के चुनाव में लंबे समय बाद ऐसा हुआ है कि जब निवर्तमान अध्यक्ष घनश्याम शर्मा चुनाव मैदान में नहीं हैं। वह 15 साल अध्यक्ष रहे हैं। सचिव अमर भारती के साथ उनकी जोड़ी बार एसोसिएशन में लंबे समय तक लोकप्रिय रही। पिछले दिनों कोरोना के चलते अमर भारती की मौत हो गई। अब घनश्याम शर्मा ने भी चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि अब वह चुनाव लड़ने के बजाय सपोर्ट करेंगे। इसके चलते चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है। संवाद
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हाथ उठाकर बनाया था अध्यक्ष
बाबू सोमपाल सिंह एडवोकेट कहते हैं कि उन्होंने 59 साल से कचहरी को बढ़ते देखा है। सन 1962 से वकालत कर रहे हैं। तब बार एसोसिएशन में 350 सदस्य हुआ करते थे। अब यह आंकड़ा 2056 तक पहुंच गया है। जमीन आसमान का फर्क हो गया है। वह 1988 में अध्यक्ष बने थे, तब चुनाव हाथ उठा कर होता था, लेकिन बाद में मतदान होने लगा। पहले पदाधिकारी आम राय से चुने जाते थे। चुनाव वकीलों की समस्याओं पर केंद्रित रहता था। अब जातिवाद चुनाव पर हावी रहता है। धनबल भी बढ़ गया है। पहले बैनर पोस्टर न के बराबर होते थे। कोई जीते या हारे, सब एकसाथ रहते थे।
एक साल होना चाहिए बार का कार्यकाल
वर्ष 2004-05 में सचिव रह चुके वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्र शेखर कहते हैं कि अब बार एसोसिएशन के चुनावों से मुद्दे गायब हो गए हैं। जो मुद्दे हैं भी, वे क्षणिक हैं। उम्मीदवारों को दूरदर्शी होना चाहिए। मगर अब वकीलों के हित की बात नहीं होती। जब वह सचिव थे तो भारी विरोध के बावजूद बार काउंसिल के मॉडल बाइलाज लागू किए। अब तो हाल यह है कि हम लोग यूपी बार काउंसिल से भी संबद्ध नहीं हैं। आम वकील को इस बारे में सोचना चाहिए। बरेली बार का कार्यकाल एक साल का होना चाहिए ताकि हर किसी को अपनी प्रशासनिक क्षमता दिखाने का अवसर मिले।
हार पहनाकर बना लेते थे अध्यक्ष
वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी के पद पर काम कर चुके अधिवक्ता जेडए खान कहते हैं कि पहले सिविल के किसी सीनियर वकील के पास हार लेकर पहुंच जाते थे और कहते थे कि बाबू जी आपको अध्यक्ष बनना है। उनके मना करने के बावजूद हार पहना दिया जाता था और वह अध्यक्ष बन जाते थे। मौलवी फखरुद्दीन अहमद खां को इसी तरह अध्यक्ष बनाया गया था। ऐसे ही फौजदारी के किसी सीनियर वकील को सचिव बना दिया जाता था। कार्यकारिणी के सदस्य बैठकर तय कर लेते थे। जब से बार चुनाव में पैसा हावी हुआ है, मुद्दे खत्म हो गए हैं। लायक उम्मीदवार मुश्किल से ही जीत पाते हैं।
अब तो धनबल से लड़ा जाता है चुनाव
फौजदारी के वरिष्ठ अधिवक्ता बाबू अब्दुल हमीद सिद्दीकी पुराने चुनाव को याद करते हुए कहते हैं कि अब बार एसोसिएशन का चुनाव आर्थिक लाभ हासिल करने के लिए ज्यादा प्रचलित हो गया है। मुख्य धारा की राजनीति की तरह यह चुनाव भी अब धनबल पर लड़ा जाने लगा है। जीत सुनिश्चित करने के लिए जातिवाद, लालच, दबाव सभी तरह के हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं। इस बार का चुनाव कुछ अलग हो तो कुछ अच्छी उम्मीद भी बंधे। कम से कम बडे़ पदों पर तो चुनाव निर्विरोध ही होने चाहिए।