पशु दाने का विकल्प बनेगी जिज्वा घास

ब्यूरो/अमर उजाला, बरेली Updated Thu, 20 Oct 2016 01:03 AM IST
Animal Jijwa grass seed will have the option
- फोटो : अमर उजाला
गुजरात की ‘जिज्वा’ घास उत्तर भारत के पशुपालकों के लिए मुनाफे का जरिया बनने वाली है। पशुपालक इसे पशुओं को दाने के बदले खिला सकते हैं। इसमें सामान्य घास से दोगुना ज्यादा प्रोटीन पाया गया है। यही वजह है कि इसे पशुओं के दाने का सर्वोत्तम विकल्प माना जा रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह उत्तर भारत की जलवायु में आसानी से उगाई भी जा सकेगी।
द्वारिका (राजकोट) में उगने वाली इस घास पर बंशी गौशाला के संचालक रमेश भाई रुपालिया ने एक साल तक परीक्षण किया। उन्होंने 10-10 बीघे खेत में जिज्वा सहित करीब आधा दर्जन किस्म की घास उगाई और उनको खिलाने के लिए दुधारू पशुओं को खेतों में खुला छोड़ दिया। पाया गया कि पशुओं ने जिज्वा घास को अधिक पसंद किया। छह महीने पहले आईवीआरआई के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. रनवीर सिंह राजकोट की बंशी गोशाला में एक अध्ययन के सिलसिले में गए थे। गोशाला संचालक ने डॉ. सिंह को बताया कि वह इन गायों को जिज्वा घास ही खिला रहे हैं। इससे उन्हें गायों को अलग से दाना खिलाने की जरूरत नहीं पड़ती है। इसके बाद डॉ. रनवीर सिंह इस घास के कुछ पौधे बरेली ले लाए। इसे अपने किचन गार्डन में उगाया और परीक्षण किया। उन्होंने जिज्वा घास की खासियतों को सही पाया। उन्होंने अखा गांव के पशुपालक ऋषि पाल सिंह और पीलीभीत के रोहताश चौहान को इसके पौधे दिए हैं।

15 से 18 फीसदी तक प्रोटीन मौजूद
आईवीआरआई सहित कई संस्थानों ने पाया है कि पशु इस घास को बड़े चाव से खाते हैं। इसमें अन्य की अपेक्षा मिठास भी अधिक है। सामान्य घास में सात से नौ फीसदी तक प्रोटीन होता है जबकि इसमें 15 से 18 फीसदी तक प्रोटीन पाए जाने की पुष्टि हुई है।

जिज्वा घास मानकों पर खरी पाई गई है। बंशी गौशाला का प्रयोग पशुओं के पोषण के लिए क्रांतिकारी कदम है। एक बार इसके पौधे लगाकर पांच साल तक इनका इस्तेमाल चारे के रूप में किया जा सकता है।
- डॉ. रनवीर सिंह प्रमुख वैज्ञानिक, आईवीआरआई बरेली

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