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किसानों को नहीं खींच पा रहा बासमती सुगंधा
बरेली
Updated Mon, 19 Oct 2015 12:46 AM IST
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बरेली। खुशबूदार बासमती के लिए हर कोई लालायित रहता है, लेकिन यह चावल महंगा होने की वजह से हर किसी को उपलब्ध नहीं हो पाता। हम बात कर रहे हैं रुहेलखंड के खुशबूदार बासमती की। इसी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान है लेकिन अब निर्यात बंद हो चुका है जिससे इस धान को लोग लगाने से बच रहे हैं।
इस बार जिले में एक हजार क्विंटल बासमती का सुगंधा धान बीज का उत्पादन हुआ। सरकारी बीज वितरण केन्द्र से किसानों को 70 रुपये किलो की दर से यह बीज वितरित किया गया। 500 क्विंटल बीज तो बिक गया, लेकिन 500 क्विंटल सुगंधा धान बीज अब भी बचा है। इसे खरीदने कोई किसान नहीं आया। कृषि विभाग अब इस बीज की नीलामी कराएगा, ताकि यह बिक जाए।
जिला कृषि अधिकार आरटी यादव ने बताया कि किसानों ने बीज खरीदने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली, इसलिए यह बच गया है। इसकी रिपोर्ट मुख्यालय तक पहुंचा दी गई है।
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बासमती में लागत भी नहीं निकल पाती
किसान किशन लाल ने बताया कि बासमती धान लगाने में खर्च ज्यादा आता है। पैदावार कम होती है। अब धान बाहर भी नहीं जा पा रहे हैं, इसलिए पूरा मूल्य नहीं मिल पा रहा है। मोटा चावल लगाना ज्यादा फायदेमंद है। उसमें कम लागत से ही अच्छी पैदावार मिल जाती है तो कम से कम पूरी लागत तो मिल जाती है।
निर्यात ही नहीं तो क्यों ये चावल लगाएं
किसान धर्मवीर सिंह ने बताया कि पहले बासमती चावल विदेशों तक जाता था। बाहर जाने की वजह से अच्छी आय हो जाती थी लेकिन, दो साल से कोई बाहर चावल नहीं खरीद रहा है। जब कोई बासमती ले ही नहीं रहा है तो लगाकर क्या करेंगे।
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इस बार जिले में एक हजार क्विंटल बासमती का सुगंधा धान बीज का उत्पादन हुआ। सरकारी बीज वितरण केन्द्र से किसानों को 70 रुपये किलो की दर से यह बीज वितरित किया गया। 500 क्विंटल बीज तो बिक गया, लेकिन 500 क्विंटल सुगंधा धान बीज अब भी बचा है। इसे खरीदने कोई किसान नहीं आया। कृषि विभाग अब इस बीज की नीलामी कराएगा, ताकि यह बिक जाए।
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जिला कृषि अधिकार आरटी यादव ने बताया कि किसानों ने बीज खरीदने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली, इसलिए यह बच गया है। इसकी रिपोर्ट मुख्यालय तक पहुंचा दी गई है।
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बासमती में लागत भी नहीं निकल पाती
किसान किशन लाल ने बताया कि बासमती धान लगाने में खर्च ज्यादा आता है। पैदावार कम होती है। अब धान बाहर भी नहीं जा पा रहे हैं, इसलिए पूरा मूल्य नहीं मिल पा रहा है। मोटा चावल लगाना ज्यादा फायदेमंद है। उसमें कम लागत से ही अच्छी पैदावार मिल जाती है तो कम से कम पूरी लागत तो मिल जाती है।
निर्यात ही नहीं तो क्यों ये चावल लगाएं
किसान धर्मवीर सिंह ने बताया कि पहले बासमती चावल विदेशों तक जाता था। बाहर जाने की वजह से अच्छी आय हो जाती थी लेकिन, दो साल से कोई बाहर चावल नहीं खरीद रहा है। जब कोई बासमती ले ही नहीं रहा है तो लगाकर क्या करेंगे।