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मंत्रिमंडल से हटाना था तो हटा देते, मगर मेरा कसूर भी बता देते
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बरेली की शहर विधानसभा सीट से 1984 में डॉ. दिनेश जौहरी जब पहली बार भाजपा के टिकट पर विधायक चुने गए थे, जब भाजपा के प्रदेश में केवल 14 विधायक थे। लगातार तीन बार शहर सीट से विधायक चुने गए और मुख्यमंत्री कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रहे डॉ. दिनेश जौहरी अब पिछले तीस सालों से से सक्रिय राजनीति में नहीं हैं लेकिन राजनीतिक गतिविधियों पर अब भी उनकी नजर बराबर बनी रहती है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई, पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और राजमाता विजयराजे सिंधिया का सानिध्य पा चुके डॉ. दिनेश जौहरी को पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से मतभेद होने के बाद सक्रिय राजनीति से बाहर होना पड़ा था। हालांकि अब भी वह भाजपा से जुड़े हुए हैं। अमर उजाला ने उनसे वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर विस्तृत बातचीत की।
सवाल : उस दौर की बात करते हैं जब भाजपा का जन्म हुआ था, उस दौर की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत क्या थी?
जवाब: 1982 में बेगम आबिदा अहमद बरेली से सांसद बनी थीं। उसी समय भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ था। अटल और आडवाणी पार्टी का विस्तार करने में लगे हुए थे। संतोष जी ने मेरे घर पर आडवाणी जी की बैठक रखवा दी। आडवाणी जी बैठक में बोले- भाजपा को सक्रिय कार्यकर्ता चाहिए। कुछ लोगों ने मेरा नाम सुझाया तो मुझे शहर अध्यक्ष बना दिया गया। फिर मैं भाजपा का पहला महानगर अध्यक्ष बना। प्रदेश नेतृत्व ने हमसे शहर विधानसभा सीट के चुनाव के लिए तीन नाम मांगे थे। मैने अपना छोड़कर तीन नाम भेज दिए। राजकुमार अग्रवाल का टिकट फाइनल हो गया। मगर जब उनका नामांकन कराने कलक्ट्रेट पहुंचे तो कार्यकर्ताओं में सुगबुगाहट उठी कि कांग्रेस से राम सिंह खन्ना मजबूत प्रत्याशी हैं। अगर डॉ. दिनेश जौहरी को टिकट मिलता तो भाजपा के लिए उम्मीद बन सकती थी। किसी कार्यकर्ता ने कल्याण सिंह को फोन मिला दिया। कल्याण सिंह ने कहा कि राजकुमार अग्रवाल से बात कराने को कहा। राजकुमार अग्रवाल ने भी उनसे कह दिया कि आप डॉ. दिनेश जौहरी को टिकट दे दीजिए। इस तरह मुझे टिकट मिला और मैं विधायक भी चुना गया।
सवाल : अब तो चुनाव जीतने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए जाते हैं, आपने अपना पहला चुनाव कैसे जीता था?
जवाब : सही बात तो यह है कि जब पार्टी ने मेरा टिकट फाइनल किया तो मुझे सिर्फ झंडे और बैनर पर ही खर्च करना पड़ा। इसके अलावा बाकी सारे इंतजार पार्टी की ओर से ही किए गए। सबने मिलकर लगभग 50 हजार रुपए चंदा इकट्ठा किया था। पूरा चुनाव उसी में निपट गया। मेरे पास एक फिएट कार थी। मैं उससे प्रचार करता था। बाकी कार्यकर्ता बूथों पर काम कर रहे थे, वह पार्टी कार्यालय से संचालित होते थे। पत्नी ऑटो में बैठकर महिलाओं से वोट मांगती थीं। मेरा तो मानना यह है कि मैं पहला चुनाव मुफ्त में ही जीत गया था। हालांकि उसके बाद के चुनाव में मेरी जेब से पैसे खर्च हुए। मगर 30-40 साल पहले इतने महंगे चुनाव होते भी नहीं थे।
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सवाल : 1984 और 2019 के चुनाव में आप क्या अंतर देखते हैं?
जवाब : 1984 के चुनाव में कोई भी कैंडिडेट चाहे किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ रहा हो, लेकिन टकराव इतना नहीं बढ़ता था कि आपस में बातचीत का रास्ता भी बंद हो जाए। सिर्फ विचारों के ही मतभेद होते थे, लेकिन आपसी दुश्मनी में नहीं तब्दील हो पाते थे। अब तो हर पार्टी का प्रत्याशी सामने वाले प्रत्याशी को दुश्मन मानकर चुनाव लड़ता है। दूसरी बात तब चुनाव इतने महंगे नहीं थे। अब चुनाव आयोग ने हालांकि काफी बंदिशें लगा रखी हैं, मगर प्रत्याशी फिर भी भरसक खर्च करता है। पहले तो टिकट भी ऐसे ही मिलता है। अब टिकट लेने में भी प्रत्याशी को पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसके बाद वह चुनाव में पैसा लगाता है। इस तरह चुनाव बहुत महंगा है। अब चुनाव लड़ना आम आदमी के बस की बात नहीं रह गया है।
सवाल : कल्याण सिंह ने आपको पहली बार टिकट दिया, फिर उन्हीं के साथ क्या मतभेद हो गए थे, जो आपको मंत्रिमंडल से हटा दिया?
जवाब : मेरे पास स्वास्थ्य मंत्रालय था। चार महीने ही हुए थे मंत्री बने हुए। मेरे मंत्रालय के अफसर मेरी बात नहीं सुनते थे। मैने एक दिन सोचा कि मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से इन अफसरों से शिकायत करेंगे। मैं कल्याण सिंह से शिकायत करने अगले दिन जाने वाला था। उसी समय कुछ पत्रकार मित्र मिलने आ गए। हमने यही बात उनसे कह दी कि अधिकारी मेरी बात नहीं सुनते। उन्होंने लखनऊ के अखबारों में यह बात छाप दी। अगले दिन जब मैं कल्याण सिंह से शिकायत करने गया तो उनका रुख सही नहीं था। बोले- आपको यह बात पार्टी फोरम पर बात रखनी चाहिए थी। तुरंत कारण बताओ नोटिस भी मिल गया। मेरा पक्ष पहुंच भी नहीं पाया और बेटे की शादी से एक दिन पहले मंत्रिमंडल से हटा दिया गया। कल्याण सिंह मुझे मंत्रिमंडल से हटाना चाहते थे तो हटा देते, लेकिन मुझे मेरा कसूर भी बता देते तो शायद कोई कसक न रहती।
सवाल : बीच में आप समाजवादी पार्टी में भी चले गए थे, इसके पीछे राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं ही रही होंगी?
जवाब : जब भाजपा ने मुझे मंत्रिमंडल से हटा दिया और विधानसभा का टिकट भी नहीं दिया तो मैं सपा में चला गया था। मुलायम सिंह यादव ने हमसे कहा था कि तुम्हारा समाजवादी पार्टी में सम्मान होगा। बाद में बंटवारे में शहर सीट तिवारी कांग्रेस में चली गई। मुझे सपा से टिकट राजनीतिक परिस्थितियों की वजह से नहीं मिला। मगर जब मैं राजमाता विजयराजे सिंधिया के पास गया तो उन्होंने कहा कि तुम्हारा सपा में कोई स्थान नहीं है। उन्होंने कुशाभाऊ ठाकरे से बात की और मुझे फिर भाजपा में वापस ले आईं। 27 साल से मेरे पास कोई पद नहीं है, फिर भी मैं भाजपा में हूं।
सवाल : राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार बस गया, आपके दिमाग में इसे खत्म करने का कोई फार्मूला है?
जवाब : मोदी जी ने ऊपर के स्तर पर भ्रष्टाचार पर काफी लगाम लगाई है। मगर निचले स्तर पर सरकारी दफ्तरों से लेकर हर जगह भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है। मेरा मानना है कि अगर जनता तय कर ले कि उसको किसी भी काम के किसी को भी पैसे नहीं देने हैं। जब यह मेसेज चला जाएगा तो न बाबू से अफसर तक कोई पैसे मांगेगा न उन्हें किसी से कुछ उम्मीद रहेगी। तभी भ्रष्टाचार खत्म होगा। राजनीतिक नेता या प्रशासनिक तंत्र भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकते क्योंकि इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। जनता ही भ्रष्टाचार खत्म करेगी। भ्रष्टाचार खत्म होते ही भारत दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा होगा।
सवाल : आप भाजपाई हैं, लेकिन क्या किसी और राजनीतिक दल को सरकार बनाने के लिए उचित मानते हैं?
जवाब : इस समय मोदी जी का विकल्प नहीं है। राजनीतिक नफा नुकसान अपनी जगह। मगर जब सवाल देश का है तो मोदी जी को ही दोबारा सरकार में आना चाहिए। अगर मोदी जी पूर्ण बहुमत से आते हैं और राज्यसभा में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलता है तो मुझे पूरी उम्मीद है कि वह देशहित में कुछ चौंकाने वाले और बड़े फैसले ले सकते हैं। भारत को विकसित देशों की श्रेणी में ले जा सकते हैं। विपक्ष के पास उनसे बेहतर कैंडिडेट नहीं है। खिचड़ी सरकारें बनने में तो ठीक लगती हैं, लेकिन देश हित में फैसले नहीं ले पातीं। देश को सख्त और मजबूत सरकार की जरूरत है। तभी हम विकास की दिशा में आगे बढ़ेंगे।
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सवाल : उस दौर की बात करते हैं जब भाजपा का जन्म हुआ था, उस दौर की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत क्या थी?
जवाब: 1982 में बेगम आबिदा अहमद बरेली से सांसद बनी थीं। उसी समय भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ था। अटल और आडवाणी पार्टी का विस्तार करने में लगे हुए थे। संतोष जी ने मेरे घर पर आडवाणी जी की बैठक रखवा दी। आडवाणी जी बैठक में बोले- भाजपा को सक्रिय कार्यकर्ता चाहिए। कुछ लोगों ने मेरा नाम सुझाया तो मुझे शहर अध्यक्ष बना दिया गया। फिर मैं भाजपा का पहला महानगर अध्यक्ष बना। प्रदेश नेतृत्व ने हमसे शहर विधानसभा सीट के चुनाव के लिए तीन नाम मांगे थे। मैने अपना छोड़कर तीन नाम भेज दिए। राजकुमार अग्रवाल का टिकट फाइनल हो गया। मगर जब उनका नामांकन कराने कलक्ट्रेट पहुंचे तो कार्यकर्ताओं में सुगबुगाहट उठी कि कांग्रेस से राम सिंह खन्ना मजबूत प्रत्याशी हैं। अगर डॉ. दिनेश जौहरी को टिकट मिलता तो भाजपा के लिए उम्मीद बन सकती थी। किसी कार्यकर्ता ने कल्याण सिंह को फोन मिला दिया। कल्याण सिंह ने कहा कि राजकुमार अग्रवाल से बात कराने को कहा। राजकुमार अग्रवाल ने भी उनसे कह दिया कि आप डॉ. दिनेश जौहरी को टिकट दे दीजिए। इस तरह मुझे टिकट मिला और मैं विधायक भी चुना गया।
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सवाल : अब तो चुनाव जीतने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए जाते हैं, आपने अपना पहला चुनाव कैसे जीता था?
जवाब : सही बात तो यह है कि जब पार्टी ने मेरा टिकट फाइनल किया तो मुझे सिर्फ झंडे और बैनर पर ही खर्च करना पड़ा। इसके अलावा बाकी सारे इंतजार पार्टी की ओर से ही किए गए। सबने मिलकर लगभग 50 हजार रुपए चंदा इकट्ठा किया था। पूरा चुनाव उसी में निपट गया। मेरे पास एक फिएट कार थी। मैं उससे प्रचार करता था। बाकी कार्यकर्ता बूथों पर काम कर रहे थे, वह पार्टी कार्यालय से संचालित होते थे। पत्नी ऑटो में बैठकर महिलाओं से वोट मांगती थीं। मेरा तो मानना यह है कि मैं पहला चुनाव मुफ्त में ही जीत गया था। हालांकि उसके बाद के चुनाव में मेरी जेब से पैसे खर्च हुए। मगर 30-40 साल पहले इतने महंगे चुनाव होते भी नहीं थे।
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सवाल : 1984 और 2019 के चुनाव में आप क्या अंतर देखते हैं?
जवाब : 1984 के चुनाव में कोई भी कैंडिडेट चाहे किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ रहा हो, लेकिन टकराव इतना नहीं बढ़ता था कि आपस में बातचीत का रास्ता भी बंद हो जाए। सिर्फ विचारों के ही मतभेद होते थे, लेकिन आपसी दुश्मनी में नहीं तब्दील हो पाते थे। अब तो हर पार्टी का प्रत्याशी सामने वाले प्रत्याशी को दुश्मन मानकर चुनाव लड़ता है। दूसरी बात तब चुनाव इतने महंगे नहीं थे। अब चुनाव आयोग ने हालांकि काफी बंदिशें लगा रखी हैं, मगर प्रत्याशी फिर भी भरसक खर्च करता है। पहले तो टिकट भी ऐसे ही मिलता है। अब टिकट लेने में भी प्रत्याशी को पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसके बाद वह चुनाव में पैसा लगाता है। इस तरह चुनाव बहुत महंगा है। अब चुनाव लड़ना आम आदमी के बस की बात नहीं रह गया है।
सवाल : कल्याण सिंह ने आपको पहली बार टिकट दिया, फिर उन्हीं के साथ क्या मतभेद हो गए थे, जो आपको मंत्रिमंडल से हटा दिया?
जवाब : मेरे पास स्वास्थ्य मंत्रालय था। चार महीने ही हुए थे मंत्री बने हुए। मेरे मंत्रालय के अफसर मेरी बात नहीं सुनते थे। मैने एक दिन सोचा कि मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से इन अफसरों से शिकायत करेंगे। मैं कल्याण सिंह से शिकायत करने अगले दिन जाने वाला था। उसी समय कुछ पत्रकार मित्र मिलने आ गए। हमने यही बात उनसे कह दी कि अधिकारी मेरी बात नहीं सुनते। उन्होंने लखनऊ के अखबारों में यह बात छाप दी। अगले दिन जब मैं कल्याण सिंह से शिकायत करने गया तो उनका रुख सही नहीं था। बोले- आपको यह बात पार्टी फोरम पर बात रखनी चाहिए थी। तुरंत कारण बताओ नोटिस भी मिल गया। मेरा पक्ष पहुंच भी नहीं पाया और बेटे की शादी से एक दिन पहले मंत्रिमंडल से हटा दिया गया। कल्याण सिंह मुझे मंत्रिमंडल से हटाना चाहते थे तो हटा देते, लेकिन मुझे मेरा कसूर भी बता देते तो शायद कोई कसक न रहती।
सवाल : बीच में आप समाजवादी पार्टी में भी चले गए थे, इसके पीछे राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं ही रही होंगी?
जवाब : जब भाजपा ने मुझे मंत्रिमंडल से हटा दिया और विधानसभा का टिकट भी नहीं दिया तो मैं सपा में चला गया था। मुलायम सिंह यादव ने हमसे कहा था कि तुम्हारा समाजवादी पार्टी में सम्मान होगा। बाद में बंटवारे में शहर सीट तिवारी कांग्रेस में चली गई। मुझे सपा से टिकट राजनीतिक परिस्थितियों की वजह से नहीं मिला। मगर जब मैं राजमाता विजयराजे सिंधिया के पास गया तो उन्होंने कहा कि तुम्हारा सपा में कोई स्थान नहीं है। उन्होंने कुशाभाऊ ठाकरे से बात की और मुझे फिर भाजपा में वापस ले आईं। 27 साल से मेरे पास कोई पद नहीं है, फिर भी मैं भाजपा में हूं।
सवाल : राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार बस गया, आपके दिमाग में इसे खत्म करने का कोई फार्मूला है?
जवाब : मोदी जी ने ऊपर के स्तर पर भ्रष्टाचार पर काफी लगाम लगाई है। मगर निचले स्तर पर सरकारी दफ्तरों से लेकर हर जगह भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है। मेरा मानना है कि अगर जनता तय कर ले कि उसको किसी भी काम के किसी को भी पैसे नहीं देने हैं। जब यह मेसेज चला जाएगा तो न बाबू से अफसर तक कोई पैसे मांगेगा न उन्हें किसी से कुछ उम्मीद रहेगी। तभी भ्रष्टाचार खत्म होगा। राजनीतिक नेता या प्रशासनिक तंत्र भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकते क्योंकि इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। जनता ही भ्रष्टाचार खत्म करेगी। भ्रष्टाचार खत्म होते ही भारत दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा होगा।
सवाल : आप भाजपाई हैं, लेकिन क्या किसी और राजनीतिक दल को सरकार बनाने के लिए उचित मानते हैं?
जवाब : इस समय मोदी जी का विकल्प नहीं है। राजनीतिक नफा नुकसान अपनी जगह। मगर जब सवाल देश का है तो मोदी जी को ही दोबारा सरकार में आना चाहिए। अगर मोदी जी पूर्ण बहुमत से आते हैं और राज्यसभा में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलता है तो मुझे पूरी उम्मीद है कि वह देशहित में कुछ चौंकाने वाले और बड़े फैसले ले सकते हैं। भारत को विकसित देशों की श्रेणी में ले जा सकते हैं। विपक्ष के पास उनसे बेहतर कैंडिडेट नहीं है। खिचड़ी सरकारें बनने में तो ठीक लगती हैं, लेकिन देश हित में फैसले नहीं ले पातीं। देश को सख्त और मजबूत सरकार की जरूरत है। तभी हम विकास की दिशा में आगे बढ़ेंगे।