{"_id":"d9aa496739b74b0ffc2224299e46c4e5","slug":"newborn-buried-in-the-field-eagles-ravens-the-noncha-life-still-wins-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"नवजात को खेत में गाड़ा, चील-कौवों ने नोंचा, फिर भी जीत गई जिंदगी","category":{"title":"Crime","title_hn":"क्राइम ","slug":"crime"}}
नवजात को खेत में गाड़ा, चील-कौवों ने नोंचा, फिर भी जीत गई जिंदगी
बाराबंकी/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 25 Nov 2015 10:45 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पैदा होते ही उसे खेत में जिंदा दफन कर दिया गया। पर, छटपटाहट से थोड़ी मिट्टी हट गई। वह सांस ले सका। पर, चील-कौवे आ धमके और नोंचने लगे। जिंदगी शायद हार जाती अगर संबारा नहीं पहुंचती। संबारा ने चील-कौवों को मंडराते देखा तो उधर लपक पड़ी। जमीन में गड़े बच्चे को देखा तो उसे निकाला। मुंह के अंदर की मिट्टी को साफ किया। चील-कौवों ने उसके पेट में नोंच-नोंचकर छेद कर दिया था। उसे लेकर अस्पताल भागी। जहां से उसे राजधानी के डफरिन अस्पताल रेफर कर दिया गया। अब बच्चा बेहतर है। नन्ही-सी जान ने जिंदगी की जंग जीत ली।
घटना बाराबंकी के सैदनपुर गांव की है। बच्चे के साथ अस्पताल में ही जमीं संबारा बताती हैं- 21 नवंबर की सुबह खेत में कौए और चील मंडरा रहे थे। लगा कुछ गड़बड़ है। पास गई तो बच्चे का पैर नजर आया। दिल कांप गया। पर जैसे ही मिट्टी हटाई बच्चा रो पड़ा। उसके बदन पर नजर गई तो पेट में छेद हो गया था। कौवों और चील ने नोंच खाया था। नाजुक अंगों पर आई चोट से खून बह रहा था। बस फौरन उसे लेकर घर की ओर भागी। पति राम प्रसाद को बताया और हम उसे लेकर निजी अस्पताल भागे।
वहां डॉक्टरों ने तुरंत जिला अस्पताल रेफर कर दिया। संबरा बताती हैं कि जिला अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों ने घायल अंगों को साफ कर टांका लगाया और भर्ती कर लिया। इस दौरान मामले की जानकारी कोठी थाने की पुलिस और चाइल्ड लाइन सेंटर को दी। पुलिस ने एक दिन बाद बाराबंकी की चाइल्ड लाइन कोसूचित किया। मंगलवार शाम को हालत बिगड़ी तो डॉक्टरों ने एनआईसीयू में भर्ती करने के लिए लखनऊ के डफरिन अस्पताल में रेफर कर दिया।
विज्ञापन
करने लगा रिकवर
डफरिन अस्पताल में एनआईसीयू इंचार्ज डॉ. सलमान खान के नेतृत्व में डॉ. मोहित कुमार, डॉ. रमाकांत चौधरी, डॉ. अजीज, डॉ. नीलम गुप्ता और डॉ. फैजान अहमद नवजात के इलाज में जुटे हैं। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सलमान खान ने बताया कि मिट्टी में रहने की वजह से संक्रमण का खतरा है। इसके लिए एंटीबायोटिक चलाई जा रही है। नवजात चम्मच से दूध पी रहा है और तेजी से रिकवर भी कर रहा है।
बच जाए यही मेरी दुआ है
संबारा के पति राम प्रसाद ईंट भट्टे पर मजदूरी कर घर चलाते हैं। संबारा के बेटा श्रीकांत और दो बेटियां रानी और काजल हैं। वह कहती हैं- बच्चा भगवान का रूप होता है और उसकी जिंदगी बचाना ही मेरा मकसद है। भगवान ने ,शायद मेरी सुन ली। वह कहती हैं-गरीब हूं तो क्या, ममता तो है। जिसकी औलाद थी उसे नहीं रखना था तो किसी मंदिर और गुरूद्वारे में छोड़ देना था ताकि इतनी पीड़ा तो नहीं सहन करनी पड़ती।
शनिवार तड़के हुआ प्रसव
डफरिन अस्पताल में भर्ती नवजात की नाभी को काटने के बाद ग्रिप लगाई गई है। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि प्रसव किसी विशेषज्ञ डॉक्टर ने अस्पताल में कराया है। उसका जन्म शनिवार तड़के हुआ होगा।
बाल कल्याण समिति की संवेदनहीनता
कहा-बच्चा मर जाए तो प्रमाणपत्र जमा करवा देना
बच्चे की देखरेख में जुटी बाराबंकी चाइल्ड लाइन की निदेशक नाहिद अकील ने बताया कि रविवार सुबह दस बजे मामले की जानकारी मिली। इसके बाद चाइल्ड लाइन की टीम अस्पताल पहुंची तो संबारा ने पूरी कहानी बताई। बाल कल्याण समिति बाराबंकी से इस मामले में कोई सहयोग नहीं मिला। उससे बच्चे को रेफर करने के लिए पत्र जारी करने केलिए कहा गया तो जवाब मिला कि ‘बच्चा मर जाए तो प्रमाण पत्र जमा करवा दीजिएगा।’
विज्ञापन
घटना बाराबंकी के सैदनपुर गांव की है। बच्चे के साथ अस्पताल में ही जमीं संबारा बताती हैं- 21 नवंबर की सुबह खेत में कौए और चील मंडरा रहे थे। लगा कुछ गड़बड़ है। पास गई तो बच्चे का पैर नजर आया। दिल कांप गया। पर जैसे ही मिट्टी हटाई बच्चा रो पड़ा। उसके बदन पर नजर गई तो पेट में छेद हो गया था। कौवों और चील ने नोंच खाया था। नाजुक अंगों पर आई चोट से खून बह रहा था। बस फौरन उसे लेकर घर की ओर भागी। पति राम प्रसाद को बताया और हम उसे लेकर निजी अस्पताल भागे।
विज्ञापन
वहां डॉक्टरों ने तुरंत जिला अस्पताल रेफर कर दिया। संबरा बताती हैं कि जिला अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों ने घायल अंगों को साफ कर टांका लगाया और भर्ती कर लिया। इस दौरान मामले की जानकारी कोठी थाने की पुलिस और चाइल्ड लाइन सेंटर को दी। पुलिस ने एक दिन बाद बाराबंकी की चाइल्ड लाइन कोसूचित किया। मंगलवार शाम को हालत बिगड़ी तो डॉक्टरों ने एनआईसीयू में भर्ती करने के लिए लखनऊ के डफरिन अस्पताल में रेफर कर दिया।
विज्ञापन
करने लगा रिकवर
डफरिन अस्पताल में एनआईसीयू इंचार्ज डॉ. सलमान खान के नेतृत्व में डॉ. मोहित कुमार, डॉ. रमाकांत चौधरी, डॉ. अजीज, डॉ. नीलम गुप्ता और डॉ. फैजान अहमद नवजात के इलाज में जुटे हैं। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सलमान खान ने बताया कि मिट्टी में रहने की वजह से संक्रमण का खतरा है। इसके लिए एंटीबायोटिक चलाई जा रही है। नवजात चम्मच से दूध पी रहा है और तेजी से रिकवर भी कर रहा है।
बच जाए यही मेरी दुआ है
संबारा के पति राम प्रसाद ईंट भट्टे पर मजदूरी कर घर चलाते हैं। संबारा के बेटा श्रीकांत और दो बेटियां रानी और काजल हैं। वह कहती हैं- बच्चा भगवान का रूप होता है और उसकी जिंदगी बचाना ही मेरा मकसद है। भगवान ने ,शायद मेरी सुन ली। वह कहती हैं-गरीब हूं तो क्या, ममता तो है। जिसकी औलाद थी उसे नहीं रखना था तो किसी मंदिर और गुरूद्वारे में छोड़ देना था ताकि इतनी पीड़ा तो नहीं सहन करनी पड़ती।
शनिवार तड़के हुआ प्रसव
डफरिन अस्पताल में भर्ती नवजात की नाभी को काटने के बाद ग्रिप लगाई गई है। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि प्रसव किसी विशेषज्ञ डॉक्टर ने अस्पताल में कराया है। उसका जन्म शनिवार तड़के हुआ होगा।
बाल कल्याण समिति की संवेदनहीनता
कहा-बच्चा मर जाए तो प्रमाणपत्र जमा करवा देना
बच्चे की देखरेख में जुटी बाराबंकी चाइल्ड लाइन की निदेशक नाहिद अकील ने बताया कि रविवार सुबह दस बजे मामले की जानकारी मिली। इसके बाद चाइल्ड लाइन की टीम अस्पताल पहुंची तो संबारा ने पूरी कहानी बताई। बाल कल्याण समिति बाराबंकी से इस मामले में कोई सहयोग नहीं मिला। उससे बच्चे को रेफर करने के लिए पत्र जारी करने केलिए कहा गया तो जवाब मिला कि ‘बच्चा मर जाए तो प्रमाण पत्र जमा करवा दीजिएगा।’