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अरबों पानी में फिर भी बुंदेलखंड प्यासा
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
Updated Fri, 29 Apr 2016 11:25 PM IST
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पानी की टंकी
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चित्रकूट। बुंदेलखंड में पेयजल परियोजनाओं की बाढ़ है। इसके बाद भी यहां बूंद- बूंद पानी के लिए संघर्ष की नौबत है। एशिया की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना कही जाने वाली पाठा पेयजल परियोजना भी इस इलाके में कारगर साबित नहीं हुई।
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सरकारी मशीनरी की ढिलाई से पेयजल परियोजनाएं ठप हैं। जो चल रही हैं, उनसे भी लोगों को जरूरत भर का पानी नहीं मिल रहा है। ऐसे में इस इलाके में खाने से अधिक पीने के पानी को लेकर सजगता बरती जा रही है।
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बुंदेलखंड के सबसे पिछड़े इलाके पाठा की प्यास बुझाने के लिए 1973 में बनी पाठा पेयजल परियोजना को एशिया की सबसे बड़ी जल परियोजना के नाम से प्रसिद्धी मिली। करीब 196.485 लाख की इस परियोजना से मानिकपुर के दूर दराज बसे आदिवासी इलाके सहित 375गांवों में पेयजल आपूर्ति होनी थी, लेकिन काफी प्रयास के बाद भी सिर्फ 234 गांवों और तीन शहरी क्षेत्र को 7.66 एमएलडी पानी दिए जाने का दावा किया जा रहा है, जबकि जमीनी सच्चाई इससे अलग है।
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विभाग के दावे की पड़ताल करने पर हालात चौकाने वाले मिले। सेमरिया गांव में पाइप लाइन तो बिछी है। इस गांव के रामसामुझ, शंकर और हरगुन कहते हैं कि गर्मी आते ही टोटी का पानी भी खत्म हो गया। वे नल की ओर इशारा करते हैं और फिर साइकिल से बंधे डिब्बे को दिखाते हैं। सवाल करते हैं कि नल से पानी आता तो दूर दराज से पानी क्योें लाते? कुछ ऐसा ही हाल बरगढ़ ग्राम पेयजल योजना का भी है। यह भी अधर में लटकी है।
यही हाल मानिकपुर, मऊ, राजापुर आदि पेयजल योजनाओं का भी है। सबसे ज्यादा उन गांवों की हालत खराब है, जो पहाड़ियों के बीच में बसे हैं। परंपरागत जलस्रोतों के सूख जाने की वजह से लोगों को पहाड़ी के दूसरे छोर पर जाना पड़ रहा है। वहां पानी मिलेगा, इस पर भी संशय बना रहता है। गोबरी गांव के कीरत बताते हैं पानी के लिए सुबह ही साइकिल से निकल गए थे, लेकिन जब तक पहुंचे पानी खत्म हो गया। इसी तरह कोनिया, अरवारी, कोलमजरा, पनहाई, खोहर सहित अन्य गांव में बनीं पानी की टंकियां शोपीस हैं।
ट्यूबवेल के पास के लोगों को पानी एक वक्त मिल जाता है, लेकिन दूसरे पुरवे तक पानी नहीं पहुंचता। ऐसे में लोग तड़के बैलगाड़ी, ठेला, ट्रैक्टर आदि लेकर निकल जाते हैं। बरगढ़ में लोगों को भी ट्यूबवेल नहीं चलने पर बूंद-बूंद पानी के लिए तड़पना पड़ता है। क्योंकि टंकियों में पानी नहीं भरा जाता है। ट्यूबवेल से सीधे सप्लाई होती है।
प्रकाश चंद्र केसरवानी
पूर्व प्रधान एवं वर्तमान प्रधान प्रतिनिधि, बरगढ़