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Banda News: किसानों की आत्महत्या ने सोचने पर किया मजबूर, जलसंरक्षण कर बने पानीदार
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बांदा। जिले के बड़ोखर खुर्द ब्लाॅक के पड़ुई गांव में वर्ष 2004 में गांव के एक किसान ने आत्महत्या कर ली। फिर एक के बाद एक सात किसानों ने जान दे दी। किशोरी लाल साहू की आत्महत्या के बाद गांव वाले जलसंकट से उबरने के बारे में सोचने पर विवश हो गए। इसके बाद पुष्पेंद्र सिंह ने अपने गांव से जलसंरक्षण की मुहिम शुरू की। हालांकि, इससे पहले जखनी गांव के उमाशंकर पांडेय वर्ष 1998 में जल संरक्षण की मुहिम शुरू कर चुके थे। बाद में इस मुहिम से रामबाबू तिवारी जैसे कई सामाजिक कई कार्यकर्ता जुड़ते चले गए।
तालाब खोदो और पानी बचाओ अभियान का असर यह रहा है कि दशक भर में ही बुंदेलखंड करीब 60,000 तालाब बन गए। बांदा जिले में 5000 से ज्यादा तालाब खोदे गए। पड़ुई गांव में बिना सरकारी मदद के सामुदायिक प्रयास से पुष्पेंद्र सिंह ने करीब 160 तालाब खोदवाए। पहले यहां भूमिगत जल 90 मीटर नीचे मिलता था, अब 30 से 40 मीटर पर पानी उपलब्ध है। गांव में ज्यादातर किसान धान की खेती करते हैं।
जलगांव के नाम से प्रसिद्ध जखनी के उमाशंकर पांडेय दिव्यांग होते हुए भी लोगों को परंपरागत जल संरक्षण की प्रक्रिया अपनाने के लिए प्रेरित किया। पानी की समस्या से निपटने के लिए गांव के लोग सिर्फ सरकारी संसाधनों पर निर्भर नहीं रहे। उन्होंने परंपरागत खेती-किसानी का सहारा लिया। बिना किसी सरकारी सहायता के बच्चे, बुजुर्ग, जवान, स्त्री-पुरुष के सहयोग से गांवों के जलस्रोत तालाब, कुएं और पोखरों को दुरुस्त करवाया। उमाशंकर पांडेय के खेत पर मेड़-मेड़ पर पेड़ अभियान ने जखनी गांव ही नहीं, पूरे बुंदेलखंड को पानीदार बना दिया। उनकी यह परंपरागत भूजल संरक्षण तकनीक देश में माॅडल बनी। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने वर्ष 2020 में उनके इस माॅडल को पूरे देश में लागू किया।
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रामबाबू ने छात्र जीवन से शुरू किया जल आंदोलन, अब वाटर हीरो
कमासिन के अधांव गांव निवासी पीएचडी के छात्र रामबाबू तिवारी ने केवल 17 वर्ष की उम्र में जल समस्याओं के समाधान के लिए मिशन शुरू किया। परिवार और मित्रों के विरोध के बावजूद उन्होंने ग्रामीणों को संगठित कर तालाबों की सफाई और पुनरुद्धार कार्य किया। इसके लिए उनकी सराहना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की। रामबाबू तिवारी के जल संरक्षण की मुहिम का परिणाम है कि हमेशा सूखे का दंश झेलने वाला कमासिन गांव अब पानीदार है। धीरे-धीरे उनकी मुहिम पूरे बुंदेलखंड और प्रयागराज तक पहुंच गई। रामबाबू ने पांच हजार से ज्यादा जल मित्र बनाए हैं। वह बताते हैं कि 13 साल पहले जब 12वीं कक्षा के छात्र के रूप में बुंदेलखंड की जल समस्याओं से निपटने के लिए निकले थे, तो नहीं सोचा था कि यह निर्णय उनके जीवन की दिशा तय करेगा। उन्होंने बुंदेलखंड के करीब 300 पुराने तालाबों को गंदगी से मुक्त कराया। इसके लिए वह खुद बिना झिझक तालाबों में उतरे। गांव-गांव जल चौपाल लगाकर लोगों को जल बचाने के लिए प्रेरित किया। करीब दो हजार किलोमीटर की जल यात्रा निकाली। उन्हें वाटर हीरो सहित कई पुरस्कार मिले।
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तालाब खोदो और पानी बचाओ अभियान का असर यह रहा है कि दशक भर में ही बुंदेलखंड करीब 60,000 तालाब बन गए। बांदा जिले में 5000 से ज्यादा तालाब खोदे गए। पड़ुई गांव में बिना सरकारी मदद के सामुदायिक प्रयास से पुष्पेंद्र सिंह ने करीब 160 तालाब खोदवाए। पहले यहां भूमिगत जल 90 मीटर नीचे मिलता था, अब 30 से 40 मीटर पर पानी उपलब्ध है। गांव में ज्यादातर किसान धान की खेती करते हैं।
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जलगांव के नाम से प्रसिद्ध जखनी के उमाशंकर पांडेय दिव्यांग होते हुए भी लोगों को परंपरागत जल संरक्षण की प्रक्रिया अपनाने के लिए प्रेरित किया। पानी की समस्या से निपटने के लिए गांव के लोग सिर्फ सरकारी संसाधनों पर निर्भर नहीं रहे। उन्होंने परंपरागत खेती-किसानी का सहारा लिया। बिना किसी सरकारी सहायता के बच्चे, बुजुर्ग, जवान, स्त्री-पुरुष के सहयोग से गांवों के जलस्रोत तालाब, कुएं और पोखरों को दुरुस्त करवाया। उमाशंकर पांडेय के खेत पर मेड़-मेड़ पर पेड़ अभियान ने जखनी गांव ही नहीं, पूरे बुंदेलखंड को पानीदार बना दिया। उनकी यह परंपरागत भूजल संरक्षण तकनीक देश में माॅडल बनी। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने वर्ष 2020 में उनके इस माॅडल को पूरे देश में लागू किया।
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रामबाबू ने छात्र जीवन से शुरू किया जल आंदोलन, अब वाटर हीरो
कमासिन के अधांव गांव निवासी पीएचडी के छात्र रामबाबू तिवारी ने केवल 17 वर्ष की उम्र में जल समस्याओं के समाधान के लिए मिशन शुरू किया। परिवार और मित्रों के विरोध के बावजूद उन्होंने ग्रामीणों को संगठित कर तालाबों की सफाई और पुनरुद्धार कार्य किया। इसके लिए उनकी सराहना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की। रामबाबू तिवारी के जल संरक्षण की मुहिम का परिणाम है कि हमेशा सूखे का दंश झेलने वाला कमासिन गांव अब पानीदार है। धीरे-धीरे उनकी मुहिम पूरे बुंदेलखंड और प्रयागराज तक पहुंच गई। रामबाबू ने पांच हजार से ज्यादा जल मित्र बनाए हैं। वह बताते हैं कि 13 साल पहले जब 12वीं कक्षा के छात्र के रूप में बुंदेलखंड की जल समस्याओं से निपटने के लिए निकले थे, तो नहीं सोचा था कि यह निर्णय उनके जीवन की दिशा तय करेगा। उन्होंने बुंदेलखंड के करीब 300 पुराने तालाबों को गंदगी से मुक्त कराया। इसके लिए वह खुद बिना झिझक तालाबों में उतरे। गांव-गांव जल चौपाल लगाकर लोगों को जल बचाने के लिए प्रेरित किया। करीब दो हजार किलोमीटर की जल यात्रा निकाली। उन्हें वाटर हीरो सहित कई पुरस्कार मिले।