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आजादी के 27 दीवानों को अंग्रेजों ने दी थी फांसी
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भूरागढ़ किला में बना शहीद स्मारक। (फाइल फोटो)
- फोटो : BANDA
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बांदा। जंगे आजादी में बुंदेलखंड के वीरों का किरदार कम नहीं रहा। इसमें हर धर्म मजहब के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सैकड़ों लोगों ने वतन के लिए जान कुर्बान कर दी। आजादी के इन दीवानों ेमें न कोई हिंदू था न मुसलमान, सिर्फ हिंदुस्तानी थे। ऐसे ही 27 क्रांतिकारी और वतनपरस्तों को अंग्रेजों ने भूरागढ़ दुर्ग में फांसी पर चढ़ा दिया था। इनमें ज्यादातर मुस्लिम थे।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड भी अंग्रेजों और क्रांतिकारियों के बीच घमासान का गढ़ रहा। बांदा जिले में अंग्रेजों से बगावत की शुरुआत पूर्वी सरहद से हुई। बांदा गजेटियर के पृष्ठ संख्या 183 में यह बात लिखी है। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि क्रांति के शुरुआती 2 साल बाद सन 1859 में बांदा शहर की सरहद पर केन नदी किनारे स्थित भूरागढ़ दुर्ग में अंग्रेजी फौजों ने 27 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर उन्हें फांसी पर लटका दिया था।
इनमें ज्यादातर क्रांतिकारी मुस्लिम वर्ग के थे। 8 जून 1858 को अंग्रेजों की अदालत ने बांदा के इन 27 क्रांतिकारियों को सजाए मौत सुनाई थी। इनमें कई तत्कालीन अफसर भी थे। फांसी स्थल दुर्ग में आज भी शहीद स्मारक क्रांतिकारियों की शहादत की याद दिला रहा है। स्मारक पर शहीदों के नाम भी दर्ज हैं।
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फांसी पर लटकाए गए क्रांतिकारी
विलायत हुसैन (दीवाने रियासत, बांदा), सरदार मोहम्मद (डिप्टी कलक्टर), हिकमत उल्ला खां (डिप्टी कलक्टर), मीर फरहत अली (तहसीलदार, बांदा), उस्मान खां (तहसीलदार, स्योंढ़ा), मिर्जा इमदाद बेग (राजस्व अधिकारी), हैदर खां (नाजिम रियासत), गुलाम हैदर खां, इमदाद अली, हनुमंत राव थत्थे, बाबूराव गोरे, नवाब अली, अकबर बेग (गोलनदाज), फैय्याज मोहम्मद, छत्ता खां, मुख्तार मोहम्मद, देवीदीन, कादिर बेग, इदरीश मोहम्मद, बेग अली, मोहम्मद अली बेग, पैगाम अली, काले खां, इस्माइल खां, कुतुब अली खां, अय्याम, शेख जुम्मन।
युवाओं में कुछ गांधीवादी तो कुछ क्रांतिकारी थे
बांदा। मुगल काल में ही बांदा में स्वतंत्रता का बिगुल बज उठा था। यहां के युवाओं ने भी आजादी में अहम भूमिका निभाई। आजादी के आंदोलन में दो गुट सक्रिय रहे। कुछ गांधीवादी थे तो कुछ क्रांतिकारी दल का नेतृत्व कर रहे थे। वर्ष 1921 में लक्ष्मीनारायण अग्निहोत्री ने युवाओं में आजादी का जुनून भरा। उन्होंने अलग क्षेत्रों में कई क्रांतिकारी गुट तैयार किए, जिन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया।
1941 में विनोबा भावे के आंदोलन में केके त्रिपाठी की अगुवाई में जिले के दर्जनों युवा कूदे। उसी समय महात्मा गांधी का असहयोग और अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। इन आंदोलनों में बलदेव सिंह, कुंवर हर प्रसाद सिंह, गज्जू खां (बांदा के गांधी कहे जाते थे) और महंत जगवेदी (कांग्रेस के वाइस प्रेसीडेंट) ने आजादी का शंखनाद किया। इनके त्याग व मेहनत तथा देश के प्रति जज्बे से चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस व महात्मा गांधी भी प्रभावित थे।
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1857 के स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड भी अंग्रेजों और क्रांतिकारियों के बीच घमासान का गढ़ रहा। बांदा जिले में अंग्रेजों से बगावत की शुरुआत पूर्वी सरहद से हुई। बांदा गजेटियर के पृष्ठ संख्या 183 में यह बात लिखी है। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि क्रांति के शुरुआती 2 साल बाद सन 1859 में बांदा शहर की सरहद पर केन नदी किनारे स्थित भूरागढ़ दुर्ग में अंग्रेजी फौजों ने 27 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर उन्हें फांसी पर लटका दिया था।
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इनमें ज्यादातर क्रांतिकारी मुस्लिम वर्ग के थे। 8 जून 1858 को अंग्रेजों की अदालत ने बांदा के इन 27 क्रांतिकारियों को सजाए मौत सुनाई थी। इनमें कई तत्कालीन अफसर भी थे। फांसी स्थल दुर्ग में आज भी शहीद स्मारक क्रांतिकारियों की शहादत की याद दिला रहा है। स्मारक पर शहीदों के नाम भी दर्ज हैं।
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फांसी पर लटकाए गए क्रांतिकारी
विलायत हुसैन (दीवाने रियासत, बांदा), सरदार मोहम्मद (डिप्टी कलक्टर), हिकमत उल्ला खां (डिप्टी कलक्टर), मीर फरहत अली (तहसीलदार, बांदा), उस्मान खां (तहसीलदार, स्योंढ़ा), मिर्जा इमदाद बेग (राजस्व अधिकारी), हैदर खां (नाजिम रियासत), गुलाम हैदर खां, इमदाद अली, हनुमंत राव थत्थे, बाबूराव गोरे, नवाब अली, अकबर बेग (गोलनदाज), फैय्याज मोहम्मद, छत्ता खां, मुख्तार मोहम्मद, देवीदीन, कादिर बेग, इदरीश मोहम्मद, बेग अली, मोहम्मद अली बेग, पैगाम अली, काले खां, इस्माइल खां, कुतुब अली खां, अय्याम, शेख जुम्मन।
युवाओं में कुछ गांधीवादी तो कुछ क्रांतिकारी थे
बांदा। मुगल काल में ही बांदा में स्वतंत्रता का बिगुल बज उठा था। यहां के युवाओं ने भी आजादी में अहम भूमिका निभाई। आजादी के आंदोलन में दो गुट सक्रिय रहे। कुछ गांधीवादी थे तो कुछ क्रांतिकारी दल का नेतृत्व कर रहे थे। वर्ष 1921 में लक्ष्मीनारायण अग्निहोत्री ने युवाओं में आजादी का जुनून भरा। उन्होंने अलग क्षेत्रों में कई क्रांतिकारी गुट तैयार किए, जिन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया।
1941 में विनोबा भावे के आंदोलन में केके त्रिपाठी की अगुवाई में जिले के दर्जनों युवा कूदे। उसी समय महात्मा गांधी का असहयोग और अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। इन आंदोलनों में बलदेव सिंह, कुंवर हर प्रसाद सिंह, गज्जू खां (बांदा के गांधी कहे जाते थे) और महंत जगवेदी (कांग्रेस के वाइस प्रेसीडेंट) ने आजादी का शंखनाद किया। इनके त्याग व मेहनत तथा देश के प्रति जज्बे से चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस व महात्मा गांधी भी प्रभावित थे।