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आपदा भी आजीविका का जरिया बनी
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बांदा। जीवन छीन रही आपदा भी आजीविका का जरिया बन गई है। लॉकडाउन ने लगभग सभी कारोबार बंद करा दिए है, लेकिन महामारी से रोज हो रही मौतों ने कई व्यापारियों को व्यवसाय दे दिया है। आपदा को अवसर बनाते हुए इन कारोबारियों ने अंतिम संस्कार और कफन-दफन सामग्री की आनन फानन दुकानें खोल लीं।
ये दुकानं खूब चल रही हैं। पिछले एक माह से भी ज्यादा समय से कोरोना की दूसरी लहर ने दिनचर्या के साथ कारोबार भी ठप कर दिया है। लॉकडाउन/कर्फ्यू में बाजार बंद है। उधर, कोरोना व अन्य मर्जों से रोजाना दर्जनों लोग असामयिक मौत के आगोश में समा रहे हैं। मौतों का ग्राफ इसके पूर्व इतना नहीं रहा। ऐसे में शवों के अंतिम संस्कार/कफन-दफन में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की खपत बढ़ गई। नतीजे में यहां शहर श्मशान व कब्रिस्तानों के आसपास व गली कूचों में कई ऐसी दुकानें खुल गई हैं, जहां सिर्फ शवों के अंतिम संस्कार की सामग्री मिल रही है। ग्राहक को सामान की लिस्ट नहीं देनी पड़ती है। पहले से तैयार पूरे सामान की क्रियाकर्म किट लोगों को दुकानदार पकड़ा देते हैं। मनचाही कीमत ले लेते हैं। शोकग्रस्त खरीददार खामोशी से ये पूरी कीमत अदा कर देते हैं। (संवाद)
यहां है अंतिम संस्कार सामग्री की दुकानें
शहर के मुक्तिधाम हरदौली रोड, मुक्तिधाम राजघाट रोड, खाईपार, छोटी बाजार, चौक बाजार, कालूकुआं, निम्नीपार, खुटला, कटरा, पुलिस लाइन, छाबी तालाब, अतर्रा चुंगी चौकी आदि।
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तीन हजार रुपये में मिलती क्रियाकर्म किट
बांदा। शव के अंतिम संस्कार में उपयोग होने वाली सामग्री यानी क्रियाकर्म किट दुकानों में दो से तीन हजार रुपये में मिलती है। इसमें लकड़ी की अर्थी, 16 मीटर कफन, छाली, लोटा, दो धोती-बनियान, एक किलो जवा आटा, एक किलो रार, 500 ग्राम शुद्ध घी, एक किलो रस्सी, एक छोटा मटका, 100 ग्राम चंदन की लकड़ी आदि शामिल है। (संवाद)
ब्राह्मण और नाई का भी होता है ठेका
बांदा। दुकानों में ब्राह्मण और नाई का भी ठेका होता है। एक दुकानदार ने बताया कि कोरोना काल में पंडित व नाई भी अंतिम संस्कार को नहीं मिल रहे। उन्होंने कुछ ब्राह्मण व नाइयों के मोबाइल नंबर लिख रखे हैं। जब कोई शोकग्रस्त परिवार पंडित व नाई की मांग करता है तो बुक करा दिया जाता है। पूरे कार्यक्रम का पंडित तीन से पांच हजार व नाई दो से तीन हजार रुपये ले रहे। (संवाद)
श्मशान घाटों में खुल गए लकड़ी के टाल
बांदा। श्मशान घाटों में लकड़ी की दुकानें खुल गईं हैं। विक्रेताओं ने कफन व दफन के सामान बेचने वालों को अपना फोन नंबर दे रखा है। फोन पर ही लकड़ी तय होने के बाद पैसा संबंधित दुकान में जमा हो जाता है। लकड़ी श्मशान पहुंच जाती हैं। मौजूदा समय में लकड़ी 600 से 800 रुपये क्विंटल बिक रही है, जबकि आम दिनों में लकड़ी के दाम 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल थे। (संवाद)
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ये दुकानं खूब चल रही हैं। पिछले एक माह से भी ज्यादा समय से कोरोना की दूसरी लहर ने दिनचर्या के साथ कारोबार भी ठप कर दिया है। लॉकडाउन/कर्फ्यू में बाजार बंद है। उधर, कोरोना व अन्य मर्जों से रोजाना दर्जनों लोग असामयिक मौत के आगोश में समा रहे हैं। मौतों का ग्राफ इसके पूर्व इतना नहीं रहा। ऐसे में शवों के अंतिम संस्कार/कफन-दफन में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की खपत बढ़ गई। नतीजे में यहां शहर श्मशान व कब्रिस्तानों के आसपास व गली कूचों में कई ऐसी दुकानें खुल गई हैं, जहां सिर्फ शवों के अंतिम संस्कार की सामग्री मिल रही है। ग्राहक को सामान की लिस्ट नहीं देनी पड़ती है। पहले से तैयार पूरे सामान की क्रियाकर्म किट लोगों को दुकानदार पकड़ा देते हैं। मनचाही कीमत ले लेते हैं। शोकग्रस्त खरीददार खामोशी से ये पूरी कीमत अदा कर देते हैं। (संवाद)
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यहां है अंतिम संस्कार सामग्री की दुकानें
शहर के मुक्तिधाम हरदौली रोड, मुक्तिधाम राजघाट रोड, खाईपार, छोटी बाजार, चौक बाजार, कालूकुआं, निम्नीपार, खुटला, कटरा, पुलिस लाइन, छाबी तालाब, अतर्रा चुंगी चौकी आदि।
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तीन हजार रुपये में मिलती क्रियाकर्म किट
बांदा। शव के अंतिम संस्कार में उपयोग होने वाली सामग्री यानी क्रियाकर्म किट दुकानों में दो से तीन हजार रुपये में मिलती है। इसमें लकड़ी की अर्थी, 16 मीटर कफन, छाली, लोटा, दो धोती-बनियान, एक किलो जवा आटा, एक किलो रार, 500 ग्राम शुद्ध घी, एक किलो रस्सी, एक छोटा मटका, 100 ग्राम चंदन की लकड़ी आदि शामिल है। (संवाद)
ब्राह्मण और नाई का भी होता है ठेका
बांदा। दुकानों में ब्राह्मण और नाई का भी ठेका होता है। एक दुकानदार ने बताया कि कोरोना काल में पंडित व नाई भी अंतिम संस्कार को नहीं मिल रहे। उन्होंने कुछ ब्राह्मण व नाइयों के मोबाइल नंबर लिख रखे हैं। जब कोई शोकग्रस्त परिवार पंडित व नाई की मांग करता है तो बुक करा दिया जाता है। पूरे कार्यक्रम का पंडित तीन से पांच हजार व नाई दो से तीन हजार रुपये ले रहे। (संवाद)
श्मशान घाटों में खुल गए लकड़ी के टाल
बांदा। श्मशान घाटों में लकड़ी की दुकानें खुल गईं हैं। विक्रेताओं ने कफन व दफन के सामान बेचने वालों को अपना फोन नंबर दे रखा है। फोन पर ही लकड़ी तय होने के बाद पैसा संबंधित दुकान में जमा हो जाता है। लकड़ी श्मशान पहुंच जाती हैं। मौजूदा समय में लकड़ी 600 से 800 रुपये क्विंटल बिक रही है, जबकि आम दिनों में लकड़ी के दाम 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल थे। (संवाद)