बलरामपुर: अतिक्रमण मामले में डीएम को 20 हजार जमा करने का आदेश, हलफनामा भी दाखिल करना होगा
हाईकोर्ट ने आवश्यक निर्देश उपलब्ध नहीं कराने पर नाराजगी जताई है। ऐसे में जिलाधिकारी को व्यक्तिगत हलफनामा भी दाखिल करना होगा। मामले में अगली सुनवाई 13 नवंबर को होगी।
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बलरामपुर जिले में सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटाने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई है। मामले में बार-बार सूचना दिए जाने के बावजूद आवश्यक निर्देश उपलब्ध नहीं कराने पर न्यायालय ने जिलाधिकारी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया है। उन्हें अपने निजी खाते से 20 हजार रुपये जमा करने का आदेश दिया है। साथ ही जिलाधिकारी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करना होगा कि न्यायालय में समय से आवश्यक निर्देश क्यों नहीं उपलब्ध कराए गए।
कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगली सुनवाई से पहले आदेश का अनुपालन नहीं हुआ तो जिलाधिकारी को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होना पड़ेगा। इस आदेश के बाद बृहस्पतिवार को कलेक्ट्रेट में खलबली रही। न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की एकल पीठ ने तीन नवंबर 2026 को जनहित याचिका संख्या 1033/2026 (शिव जी पांडेय एवं एक अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। याचिका सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटवाने की मांग को लेकर दाखिल की गई है। इसमें प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव समेत 27 पक्षकार बनाए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता दीपक कुमार पांडेय ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से स्थायी अधिवक्ता और पंकज गुप्ता उपस्थित थे। न्यायालय के आदेश के मुताबिक जनहित याचिका की अग्रिम प्रति 11 अगस्त 2026 को ही मुख्य स्थायी अधिवक्ता के कार्यालय को प्राप्त हो गई थी।
इसके बाद 14 अगस्त को संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजकर मामले से अवगत कराया गया था। इसके बावजूद राज्य सरकार की ओर से न्यायालय में आवश्यक निर्देश उपलब्ध नहीं कराए गए। मामला 27 अक्तूबर को सुनवाई के लिए न्यायालय के सामने आया था, लेकिन उस दिन भी सरकारी पक्ष के अधिवक्ता को संबंधित विभाग से जरूरी निर्देश नहीं मिलने के कारण सुनवाई नहीं हो सकी। तीन नवंबर को दोबारा सुनवाई के दौरान स्थायी अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि संबंधित प्राधिकारी को जानकारी देने के बावजूद अभी तक आवश्यक निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं। इस पर पीठ ने टिप्पणी की कि अगस्त में याचिका की अग्रिम प्रति मिलने, 14 अगस्त और 27 अक्तूबर को पत्र भेजे जाने के बावजूद निर्देश उपलब्ध नहीं कराना राज्य सरकार की निष्क्रियता का स्पष्ट उदाहरण है। सरकारी अधिकारी इस तरह की लापरवाही बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन न्यायालय इसे स्वीकार नहीं कर सकता।
सरकारी पक्ष की लापरवाही का खामियाजा डीएम पर
न्यायालय ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए माना कि आवश्यक निर्देश उपलब्ध नहीं कराना सुनवाई टालने का प्रयास प्रतीत होता है। इसी के मद्देनजर जिलाधिकारी पर 20 हजार रुपये की लागत लगाई गई है। यह धनराशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि जिलाधिकारी को अपने व्यक्तिगत खाते से हाईकोर्ट के मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र में जमा करनी होगी। राशि जमा करने के बाद उसकी रसीद न्यायालय के रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करनी होगी।
इसके अलावा जिलाधिकारी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर बताना होगा कि संबंधित मामले में आवश्यक निर्देश समय से क्यों नहीं भेजे गए। न्यायालय ने साफ किया है कि अगली सुनवाई से पहले आदेश का अनुपालन नहीं किया गया तो जिलाधिकारी को स्वयं न्यायालय में उपस्थित होना होगा। हाईकोर्ट ने मामले को 13 नवंबर को नए मामलों की सूची में शामिल कर सुनवाई के लिए प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
जिलाधिकारी विपिन कुमार जैन का कहना है कि प्रकरण जनपद की सदर तहसील से संबंधित था। इस प्रकरण में आवश्यक निर्देश प्राप्त करने हेतु पत्राचार किया गया था, लेकिन न्यायालय के समक्ष समयबद्ध निर्देश प्रस्तुत नहीं हो सके। प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए आवश्यक अभिलेखों एवं पत्राचार की समीक्षा की जा रही है तथा संबंधित अधिकारियों से प्रभावी कार्यवाही सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। न्यायालय के आदेशों का पूर्ण सम्मान करते हुए निर्धारित समयावधि में अनुपालन किया जाएगा।