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बलिया में पराग डेयरी पर ग्रहण!
अमर उजाला ब्यूरो बलिया
Updated Wed, 20 Jan 2016 11:15 PM IST
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मंडल में सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन करने वाली जिले की एकमात्र पराग डेयरी पर
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ग्रहण लगने जा रहा है। यहां तैनात कर्मचारियों को वीआरएस (स्वैच्छिक
सेवानिवृत्ति योजना) देकर उनकी छुट्टी की जा रही है। 16 में से पांच लोगों
को वीआरएस की मंजूरी का पत्र मिल चुका है।
इस इकाई का विलय आजमगढ़ के दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ में कराने की प्रक्रिया अंदर ही अंदर चल रही है। यहां का पूरा लेखा-जोखा मंडल मुख्यालय भेजा जा रहा है। डेयरी पर ग्रहण लगने की खबर से स्थानीय दुग्ध उत्पादकों में मायूसी छा गई है, वहीं धंधे से जुड़े किसान भी चिंतित हैं।
नगर से सटे जीराबस्ती स्थित दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड बलिया का अस्तित्व अब समाप्त होने के कगार पर है। प्रबंधन ने ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले दूध को आजमगढ़ भेजने की योजना तैयार कर ली है। ऐसे में किसान दुग्ध संघ से मिलने वाले पशु आहार सहित कई अन्य सुविधाओं से वंचित हो जाएंगे।
सब कुछ ठीक रहा तो फरवरी के अंत तक डेयरी में काम बंद हो जाएगा। इससे दूध के रोजगार के जरिए जिन सैकड़ों परिवारों की गाड़ी चलती थी, उनका जीवन बेपटरी हो जाएगी। बलिया में पराग डेयरी की शुरूआत वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के प्रयास से हुई थी।
प्रारंभ में सबकुछ ठीक-ठाक चला। शुरूआती दिनों में दुग्ध संघ किराए के मकान में संचालित होता था। जब संघ ने खुद की जमीन और सारा सामान अपना कर लिया तब डेयरी घाटे में चलने लगी। जिसके चलते डेयरी को वर्ष 2001 में बंद करना पड़ा। 2002 में भाजपा शासन में डेयरी फिर चालू हुई ।
इसे उबारने के लिए शासन ने किसानों, कर्मचारियों, अधिकारियों और ट्रांसपोर्टरों का बकाया चुकाने के लिए डेयरी को कई बार अनुदान भी दिया। फिर भी घाटे की भरपाई नहीं हो सकी।
डेयरी अभी भी 12 लाख से अधिक के घाटे में है। सूत्रों की माने तो घाटे से उबारने के लिए दुग्ध संघ की एमडी अर्चना अग्रवाल ने कर्मचारियों को वीआरएस देकर छुट्टी करने का मन बना लिया है और लखनऊ बोर्ड की मीटिंग में उन्होंने बलिया डेयरी में केवल दो कर्मचारी ही रखने की संस्तुति की है।
इसमें एक कैशियर और एक प्रयोगशाला सहायक की ही सेवा ली जायेगी। बलिया दुग्ध संघ में पांच कर्मचारियों को वीआरएस दिया जा चुका है। अन्य बचे कर्मचारियों का वीआरएस आना लगभग तय माना जा रहा है।
वीआरएस पा चुके कर्मचारी 31 जनवरी 2016 तक ही सेवा दे सकेंगे। इसके बाद बलिया दुग्ध उत्पादक संघ का विलय आजमगढ़ की इकाई में किया जाएगा।
इस इकाई का विलय आजमगढ़ के दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ में कराने की प्रक्रिया अंदर ही अंदर चल रही है। यहां का पूरा लेखा-जोखा मंडल मुख्यालय भेजा जा रहा है। डेयरी पर ग्रहण लगने की खबर से स्थानीय दुग्ध उत्पादकों में मायूसी छा गई है, वहीं धंधे से जुड़े किसान भी चिंतित हैं।
नगर से सटे जीराबस्ती स्थित दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड बलिया का अस्तित्व अब समाप्त होने के कगार पर है। प्रबंधन ने ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले दूध को आजमगढ़ भेजने की योजना तैयार कर ली है। ऐसे में किसान दुग्ध संघ से मिलने वाले पशु आहार सहित कई अन्य सुविधाओं से वंचित हो जाएंगे।
सब कुछ ठीक रहा तो फरवरी के अंत तक डेयरी में काम बंद हो जाएगा। इससे दूध के रोजगार के जरिए जिन सैकड़ों परिवारों की गाड़ी चलती थी, उनका जीवन बेपटरी हो जाएगी। बलिया में पराग डेयरी की शुरूआत वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के प्रयास से हुई थी।
प्रारंभ में सबकुछ ठीक-ठाक चला। शुरूआती दिनों में दुग्ध संघ किराए के मकान में संचालित होता था। जब संघ ने खुद की जमीन और सारा सामान अपना कर लिया तब डेयरी घाटे में चलने लगी। जिसके चलते डेयरी को वर्ष 2001 में बंद करना पड़ा। 2002 में भाजपा शासन में डेयरी फिर चालू हुई ।
इसे उबारने के लिए शासन ने किसानों, कर्मचारियों, अधिकारियों और ट्रांसपोर्टरों का बकाया चुकाने के लिए डेयरी को कई बार अनुदान भी दिया। फिर भी घाटे की भरपाई नहीं हो सकी।
डेयरी अभी भी 12 लाख से अधिक के घाटे में है। सूत्रों की माने तो घाटे से उबारने के लिए दुग्ध संघ की एमडी अर्चना अग्रवाल ने कर्मचारियों को वीआरएस देकर छुट्टी करने का मन बना लिया है और लखनऊ बोर्ड की मीटिंग में उन्होंने बलिया डेयरी में केवल दो कर्मचारी ही रखने की संस्तुति की है।
इसमें एक कैशियर और एक प्रयोगशाला सहायक की ही सेवा ली जायेगी। बलिया दुग्ध संघ में पांच कर्मचारियों को वीआरएस दिया जा चुका है। अन्य बचे कर्मचारियों का वीआरएस आना लगभग तय माना जा रहा है।
वीआरएस पा चुके कर्मचारी 31 जनवरी 2016 तक ही सेवा दे सकेंगे। इसके बाद बलिया दुग्ध उत्पादक संघ का विलय आजमगढ़ की इकाई में किया जाएगा।