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दांत है राक्षस और जीभ संत
Ballia
Updated Thu, 25 Apr 2013 02:37 PM IST
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सुखपुरा। संत यतिनाथ मंदिर प्रांगण में आयोजित श्रीराम कथा के तीसरे दिन काशी से पधारे मानस मारतंड डा. बृजेश मणि पांडेय ने बाली वध प्रसंग का विस्तृत वर्णन किया। जिसे सुन उपस्थित लोग मंत्रमुग्ध हो गए।
उन्होंने कहा कि जब बाली श्रीराम से पूछा कि आप ने मुझे क्यों मारा? तब रामजी ने भारतीय संस्कृति के उद्यांत आदर्श को प्रस्तुत करते हुए कहा कि पौराणिक मान्यता के अनुसार सुग्रीव की पत्नी रूमा को बाली ने नहीं अपनाया था। वास्तविकता यह है कि जब युवा अवस्था को प्राप्त कर बाली और सुग्रीव ने सागर मंथन किया, तो सबसे पहले पहले रूमा प्रकट हुई। बड़ा भाई होने के नाते बाली ने उसे स्वीकार कर लिया। पुन: सागर का मंथन किए जाने पर तारा प्रकट हुई। जिसे नियमानुसार सुग्रीव की पत्नी होना चाहिए था, लेकिन तारा के अप्रतिम सौंदर्य को देखकर बाली स्वयं को नियंत्रित नहीं कर सका और उसने तारा को अपना लिया। साथ ही सुग्रीव का विवाह रूमा से करा दिया। रामजी ने बाली को इसी कथा को याद दिलाया। इसी क्रम में डा. पांडेय ने दांत और जीभ की तुलना करते हुए कहा कि दांत राक्षस होता है और जीभ संत। जब व्यक्ति का जन्म होता है तो दांत नहीं रहता है, परंतु जीभ रहती है। प्राय: यह देखने को मिलता है कि बूढ़ापे में दांत टूट जाता है। इस बात का जिक्र तुलसीदास ने मानस में किया है कि राक्षस बीच में आता है और चला जाता है। सर्वदेव सिंह, रमाशंकर यादव, गणेश गुप्त, डा. दीनानाथ ओझा, विनय कुमार सिंह, वीरबहादुर, हरेराम, राजेंद्र सिंह, विमला, ज्योति, पप्पू सिंह, महावीर प्रसाद गुप्त, अशोक, जिऊत पांडेय, मिंटू आदि ने डा. मणि का माल्यार्पण कर स्वागत किया।
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उन्होंने कहा कि जब बाली श्रीराम से पूछा कि आप ने मुझे क्यों मारा? तब रामजी ने भारतीय संस्कृति के उद्यांत आदर्श को प्रस्तुत करते हुए कहा कि पौराणिक मान्यता के अनुसार सुग्रीव की पत्नी रूमा को बाली ने नहीं अपनाया था। वास्तविकता यह है कि जब युवा अवस्था को प्राप्त कर बाली और सुग्रीव ने सागर मंथन किया, तो सबसे पहले पहले रूमा प्रकट हुई। बड़ा भाई होने के नाते बाली ने उसे स्वीकार कर लिया। पुन: सागर का मंथन किए जाने पर तारा प्रकट हुई। जिसे नियमानुसार सुग्रीव की पत्नी होना चाहिए था, लेकिन तारा के अप्रतिम सौंदर्य को देखकर बाली स्वयं को नियंत्रित नहीं कर सका और उसने तारा को अपना लिया। साथ ही सुग्रीव का विवाह रूमा से करा दिया। रामजी ने बाली को इसी कथा को याद दिलाया। इसी क्रम में डा. पांडेय ने दांत और जीभ की तुलना करते हुए कहा कि दांत राक्षस होता है और जीभ संत। जब व्यक्ति का जन्म होता है तो दांत नहीं रहता है, परंतु जीभ रहती है। प्राय: यह देखने को मिलता है कि बूढ़ापे में दांत टूट जाता है। इस बात का जिक्र तुलसीदास ने मानस में किया है कि राक्षस बीच में आता है और चला जाता है। सर्वदेव सिंह, रमाशंकर यादव, गणेश गुप्त, डा. दीनानाथ ओझा, विनय कुमार सिंह, वीरबहादुर, हरेराम, राजेंद्र सिंह, विमला, ज्योति, पप्पू सिंह, महावीर प्रसाद गुप्त, अशोक, जिऊत पांडेय, मिंटू आदि ने डा. मणि का माल्यार्पण कर स्वागत किया।
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