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11 सौ साल से आस्था का केंद्र बना मां संहारणी मंदिर
अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच
Updated Thu, 07 Apr 2016 11:29 PM IST
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मां संहारणी मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
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शहर के डिगिहा तिराहा के निकट स्थित मां संहारणी देवी मंदिर की स्थापना ग्यारह सौ साल पहले हुई थी। यहां महाराजा सुहेलदेव ने दुश्मनों की सेना पर विजय प्राप्त करने के लिए मां काली की उपासना की थी। तब से मंदिर भक्तों की आस्था और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।
मां संहारणी देवी मंदिर में माता चंडी के सभी स्वरूपों की पूजा अर्चना की जाती है। इस समय यह सिद्ध मंदिर शहर के बीच स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि सोमनाथ मंदिर पर हमले के ठीक समय इस मंदिर की नींव रखी गई थी।
11 सौ साल पहले मुगल सेना से युद्ध के पूर्व महाराज सुहेलदेव ने मंदिर में खड्ग का पूजन अर्चन कर मां संहारिणी को प्रसन्न किया था। उस समय यहां पर घना जंगल था। किवंदितियों पर नजर डालें तो महाराजा सुहेलदेव ने यहां तंत्रोतात्मक विधि से पूजा कर दुश्मन की सेना को हराया था। भक्तों में आस्था है कि मां काली की पूजा से रुके हुए काम पूरे हो जाते हैं।
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उनके जीवन में आने वाली समस्त बाधाओं को मां चंडी समाप्त कर देती है। इसी आस्था के साथ भक्त नवरात्रि के सभी नौ दिनों तक मंदिर में सुबह शाम पूजन अर्चन करते हैं। दुर्गा अष्टमी के दिन मंदिर में विशेष पूजन और हवन होता है।
यहां एक साथ हवन करने के लिए बड़ा हवन कुंड स्थापित है। करीब पचास लोग एक साथ बैठ कर कुंड में आहुतियां दे सकते हैं। नवरात्रि महोत्सव के समापन पर हवन पूरे दिन होता है। मंदिर के महंत की ओर से कन्या पूजन व भोज भी कराया जाता है।
18 साल से कर रहे आराधना
संहारिणी माता मंदिर के महंत ओमप्रकाश ने बताया कि 18 साल से वह अन्न त्यागकर मां की साधना कर रहे हैं। महंत ओमप्रकाश ने बताया कि वर्ष 1970 में उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। उसी समय स्वामी सत्यानंद गोंडा के कर्नलगंज से मां संहारिणी मंदिर पहुंचे थे। उसी समय वह उनके शिष्य बन गए। स्वामी सत्यानंद ने मां संहारिणी की पूजा अर्चना की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी थी। महंत ओमप्रकाश ने बताया कि स्वामी सत्यानंद ने ही मंदिर का जीर्णोद्धार वर्ष 1971 में कराया था।
अतिक्रमण से परेशानी
मां संहारणी मंदिर की चार दशक से सेवा कर रहे महंत ओमप्रकाश मंदिर के चारों ओर किए जा रहे अतिक्रमण से दुखी हैं। उन्होंने कहा कि जब लोग मंदिरों की भूमि पर ही अवैध कब्जा करने लगेंगे। तो समाज के पतन को रोकना असंभव होगा।
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मां संहारणी देवी मंदिर में माता चंडी के सभी स्वरूपों की पूजा अर्चना की जाती है। इस समय यह सिद्ध मंदिर शहर के बीच स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि सोमनाथ मंदिर पर हमले के ठीक समय इस मंदिर की नींव रखी गई थी।
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11 सौ साल पहले मुगल सेना से युद्ध के पूर्व महाराज सुहेलदेव ने मंदिर में खड्ग का पूजन अर्चन कर मां संहारिणी को प्रसन्न किया था। उस समय यहां पर घना जंगल था। किवंदितियों पर नजर डालें तो महाराजा सुहेलदेव ने यहां तंत्रोतात्मक विधि से पूजा कर दुश्मन की सेना को हराया था। भक्तों में आस्था है कि मां काली की पूजा से रुके हुए काम पूरे हो जाते हैं।
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उनके जीवन में आने वाली समस्त बाधाओं को मां चंडी समाप्त कर देती है। इसी आस्था के साथ भक्त नवरात्रि के सभी नौ दिनों तक मंदिर में सुबह शाम पूजन अर्चन करते हैं। दुर्गा अष्टमी के दिन मंदिर में विशेष पूजन और हवन होता है।
यहां एक साथ हवन करने के लिए बड़ा हवन कुंड स्थापित है। करीब पचास लोग एक साथ बैठ कर कुंड में आहुतियां दे सकते हैं। नवरात्रि महोत्सव के समापन पर हवन पूरे दिन होता है। मंदिर के महंत की ओर से कन्या पूजन व भोज भी कराया जाता है।
18 साल से कर रहे आराधना
संहारिणी माता मंदिर के महंत ओमप्रकाश ने बताया कि 18 साल से वह अन्न त्यागकर मां की साधना कर रहे हैं। महंत ओमप्रकाश ने बताया कि वर्ष 1970 में उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। उसी समय स्वामी सत्यानंद गोंडा के कर्नलगंज से मां संहारिणी मंदिर पहुंचे थे। उसी समय वह उनके शिष्य बन गए। स्वामी सत्यानंद ने मां संहारिणी की पूजा अर्चना की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी थी। महंत ओमप्रकाश ने बताया कि स्वामी सत्यानंद ने ही मंदिर का जीर्णोद्धार वर्ष 1971 में कराया था।
अतिक्रमण से परेशानी
मां संहारणी मंदिर की चार दशक से सेवा कर रहे महंत ओमप्रकाश मंदिर के चारों ओर किए जा रहे अतिक्रमण से दुखी हैं। उन्होंने कहा कि जब लोग मंदिरों की भूमि पर ही अवैध कब्जा करने लगेंगे। तो समाज के पतन को रोकना असंभव होगा।