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Bahraich News: मुखिया व पुरोहित को रंग लगाने के साथ शुरू होती होली

Sun, 05 Mar 2023 11:15 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच
संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच Updated Sun, 05 Mar 2023 11:15 PM IST
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Holi begins with coloring the chief and the priest
श्रावस्ती। रंगों के महापर्व का आगाज हो चुका है। गांव गली मोहल्लों में बच्चे अभी से होली की ठिठोली करने लगे हैं। इन सबके बीच थारू समुदाय की होली आज भी प्राचीन सभ्यताओं को संजोए हुए हैं। जहां गांव के मुखिया व पुरोहित को रंग लगा कर शुरू होने वाला होली का त्योहार दूसरे दिन कीचड़ व गोबर की होली के साथ संपन्न होता है। नेपाल सीमा से सटे सिरसिया क्षेत्र में थारू जनजाति बाहुल्य गांवों में आज भी होली की प्राचीन परंपराएं जिंदा हैं। यहां होलिका दहन के लिए प्रत्येक परिवार से एक सदस्य अपने घर से लकड़ी लेकर होलिका दहन स्थल पहुंचता है। जहां मुखिया की उपस्थिति में गांव के पुरोहित होलिका दहन करते हैं।
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इसके बाद क्या महिलाएं, क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग, क्या युवतियां हर कोई पुरोहित व मुखिया के चेहरे पर रंग व गुलाल लगाती हैं। इसके बाद शुरू होता है थारू लोक नृत्य व होली गीत का सिलसिला भोर तक जारी रहता है। इसके बाद दूसरे दिन लोग जमकर एक दूसरे पर रंग गुलाल व अबीर उड़ाते हैं। थारू बाहुल्य मोतीपुर कला, रनियापुर, भचकाही, रावलपुर सहित अन्य ग ांवों में दोपहर बाद कीचड़ व गोबर आदि से जमकर होली खेली जाती है। संध्या बेला में सभी लोग पुरोहित व मुखिया के साथ जलाशयों पर जाकर स्नान करते हैं। इसके बाद लोगों के घरों में बने पकवानों को अपने इष्ट मित्रों व रिश्तेदारों सहित दोस्तों को खिलाया जाता है। थारू समुदाय में होली की खुमारी तीसरे दिन उतरती है।
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बात जब थारू समुदाय के लोगों के त्योहारों की हो तो घर पर बनी कच्ची शराब व चावल से बनने वाली जाड़माड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रनियापुर निवासी चीपू बताते हैं कि हमारे समुदाय में गुड़ व सोंठ की गुझिया व गुलगुला का विशेष महत्व होता है। लेकिन होली पर यदि जाड़माड़ न परोसा जाए तो आगंतुक इसे अपना अपमान मानते हैं। लल्लू बताते हैं कि थारू समुदाय के लोग खाने पीने व स्वागत करने के बेहद शौकीन होते हैं। लोग अपने सामर्थ्य से अनुसार आगंतुकों का स्वागत करने में कोई कसर नहीं लगाते। पारंपरिक परिधान व लोकगीतों का प्रचलन अब धीरे धीरे समाप्त हो रहा है। लेकिन थारू समुदाय में परंपराएं आज भी जिंदा हैं।
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