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पिपरी किला के अस्तित्व पर संकट

Wed, 01 Aug 2018 11:19 PM IST
Updated Wed, 01 Aug 2018 11:19 PM IST
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पिपरी किला के अस्तित्व पर संकट
राजीचौराहा (बहराइच)। कभी स्वतंत्रता अंादोलन की रूपरेखा बनती थी, इंकलाब के नारे बुलंद होते थे। इन नारों की गूंज को समेटे पिपरी किला का अस्तित्व अब संकट में है।
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संघर्षों से अंग्रेजों से जीत हासिल कर ली, लेकिन अपनों ने ही धरोहर को उपेक्षित कर दिया। अब किले की यादों को ईंट के रूप में सहेजने के लिए उस पर हथौड़ियां चलाई जा रही है। प्राचीर को मिटाया जा रहा है।
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कारण, किला और नदी के बीच महज 50 मीटर का फासला बचा है। अब तक प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया है। वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद लार्ड रिबन वायसराय बनकर जब भारत आया तो उसने इलाहाबाद में राजे रजवाड़ों की मीटिंग बुलाई।
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इसमें महारानी विक्टोरिया के घोषणा पत्र को सुनाया गया। इस घोषण पत्र के बाद अंग्रेेजों ने छीनी गई रियासतों का बंटवारा किया। उसी बंटवारे में बहराइच के पिपरी रियासत के 33 गांव पंजाब के राजा रणजीत सिंह के वंशजों के पाले में आए।

इस रियासत पर राजा जगदेव सिंह को कब्जा मिला। बाद में उन्होंने अपनी बहन कुंवर सिंह को पिपरी रियासत दान दे दी थी। उसी के तहत वर्ष 1867 में किले का निर्माण कराया गया था।

लगभग एक एकड़ में किले की प्राचीर है। किले के आसपास 25 एकड़ की जमीन धरोहर का परिसर मानी जाती है। यह किला राजा दलजीत सिंह के पिता राजा जगजोत सिंह ने बनवाया था। किला का निर्माण होने के बाद यहां पर भी स्वतंत्रता आंदोलन के तराने गाए जाते थे।

1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद जब स्वतंत्रता आंदोलन का नया दौर शुरू हुआ, तब इस किले में भी अंग्रेजों के खिलाफ रूपरेखा बनती थी।

पिपरी रियासत के वंशज राजा दलबीर सिंह का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी तो नहीं थी, लेकिन देश की आजादी के लिए गुपचुप योजनाएं जरूर बनती थी। अति प्राचीन धरोहर को घाघरा की लहरें लीलने को बेताब हैं। धरोहर को सुरक्षित करने के उपाय नहीं किए गए हैं।

प्रशासन ने नहीं की धरोहर को बचाने के प्रयास
राजा दलजीत सिंह के वंशज के रूप में उनके भांजे दलबीर सिंह किले की देखरेख करते हैं। उन्होंने बताया कि राजा दलजीत सिंह ने यह किला उनके परिवार को दिया था।

कानपुर और इकौना की रियासत भी उन्हीं के परिवार के नाम है। लेकिन दलबीर प्रशासनिक उपेक्षा से आहत हैं। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष से वह अधिकारियों के यहां चक्कर लगा रहे हैं, पर सुनवाई नहीं हो रही है।


एसडीएम बोले-जानकारी नहीं थी, बचाने के करेंगे उपाय
एसडीएम राजेश कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि धरोहर अमूल्य होती है। उसकी रक्षा की जाएगी। ऐतिहासिक किले के नदी के कटान की जद में आने की सूचना नहीं थी। पता चला है।

एतिहासिक किले के संरक्षण के हर उपाय किए जाएंगे। जांच करवाकर घाघरा की धारा को किले की ओर से मोड़ने की कोशिश होगी।
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