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खेती की जमीन पर बन रही सड़कें और कट रही कॉलोनियां

Sun, 21 Feb 2021 10:50 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 21 Feb 2021 10:50 PM IST
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Roads are being cut on farm land and colonies are being cut
बागपत। बढ़ते शहरीकरण और विकास कार्यों से खेती की जमीन सिमट रही है। ढाई दशक में लगभग 250 हेक्टेयर कृषि भूमि पर या तो आवासीय कॉलोनी बन चुकी है या फिर सड़कें। साल 1997 में बागपत को जिले का दर्जा मिला था। खेती का कुल रकबा एक लाख नौ हजार 136 हेक्टेयर था, जो घटकर एक लाख आठ हजार 886 के लगभग रह गया है।
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कृषि विज्ञान केंद्र खेकड़ा के कृषि वैज्ञानिक डॉ संदीप चौधरी बताते हैं कि औसतन हर साल दस हेक्टेयर खेती की जमीन कम हो रही है। पांच सालों में इसमें तेजी आई है। भविष्य में यह आंकड़ा 20 हेक्टेयर प्रति वर्ष तक पहुंच सकता है। इसकी वजह यह है कि शहरीकरण तेजी से बढ़ा है। बागपत, बड़ौत और खेकड़ा के अलावा देहात क्षेत्र के बाहरी हिस्सों में तेजी से मकानों का निर्माण हुआ है। यही वजह है कि खेती की जमीन लगातार कम हो रही है। जिले में सड़कों का जाल बिछ रहा है, जिसका असर खेती की जमीन पर पड़ा है।
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केस-एक
बागपत। ईस्टर्न पेरीफेरल एक्सप्रेस-वे का बागपत में करीब 20.125 किमी का टुकड़ा है। काठा, मवीकलां, खेकड़ा, रावण उर्फ बड़ा गांव, नंगला बहेड़ी, लहचौड़ा, गौना, सिंगौली तगा, शरफाबाद, आलमगिरपुर उर्फ टुकाली एवं फुलैरा गांव के 2221 किसानों की भूमि का अधिग्रहण किया गया।
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केस-दो
बागपत। दिल्ली से देहरादून तक बनने वाले इकनॉमिक कॉरिडोर की तैयारियां चल रही हैं। जिले में ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे पर बनने वाले जंक्शन से भूमि अधिग्रहण शुरू होगा। लगभग 31 गांव में कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा।
फसल चक्र में बदलाव नहीं कर रहे किसान
बागपत। किसानों के हिस्से में जोत लगातार कम हुई है। जिस वजह से गेहूं और गन्ने का फसल चक्र ही रह गया है। रबी की फसल साल 2018-19 में 61 हजार 785 हेक्टेयर में थी, जबकि 2020-21 में 59 हजार 351 हेक्टेयर में खड़ी है। मुख्य फसल गेहूं के रकबे में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है, लेकिन जौ, चना, मटर, मसूर और सरसों का रकबा कम हुआ है। जोत कम होने की वजह से सीधा फसल चक्र रह गया है।
इस तरह घटा दालों का रकबा
बागपत। साल 2013 में जिलेे में अरहर का रकबा 930 हेक्टेयर में था, लेकिन अब सिर्फ 600 हेक्टेयर ही रह गया है। जाहिर है कि मुख्य फसलों को जोड़कर अन्य फसलों का रकबा प्रभावित हुआ है।
कीटनाशकों से उत्पादन बढ़ा और बीमारियां भी
बागपत। कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से कम क्षेत्रफल में भी उत्पादन में सुधार हुआ है। जिले में गन्ने की फसल की बात करें तो साल 2011-12 में 69 हजार 511 हेक्टेयर में 460 लाख क्विंटल गन्ना पैदा हुआ था। हर साल गन्ने का रकबा बढ़ा। वर्तमान पेराई सत्र में रकबा 74 हजार 196 हेक्टेयर पर खड़ा है। पैदावार 633 लाख क्विंटल पर पहुंच गई है। अन्य फसल कम कर पिछले दस साल में लगातार गन्ने के रकबे में बढ़ोत्तरी हुई। कीटनाशकों के इस्तेमाल से पैदावार में भी सुधार हुआ। लेकिन सात ही बीमारियां भी बढ़ी है।

खाद्यान्न की गुणवत्ता और जमीन की उपजाऊ शक्ति घटी
बागपत। कृषि विज्ञान केंद्र खेकड़ा के कृषि वैज्ञानिक डॉ संदीप चौधरी का कहना है कि पिछले 10 साल में अंधाधुंध कीटनाशकों का प्रयोग किया गया है। इससे जमीन की उपजाऊ शक्ति भी कम हुई है। खाद्यान्नों की गुणवत्ता पर भी विपरीत असर पड़ा है।
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