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हर साल घट रही दलहनीं फसलें, तिलहन में बढ़ रही सरसों
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बागपत। दलहनी यान दालों की खेती की परंपरा धीरे-धीरे टूट रही है। यही वजह है कि दालों के लिए अब किसानों की भी बाजार पर निर्भरता बढ़ रही है। हर साल जिले में दलहनी फसलों का रकबा कम हुआ है। मटर की खेती किसानों को रास नहीं आ रही है। दालों की खेती के नाम पर सिर्फ उड़द की किसान सबसे अधिक बुआई करते हैं। मूंग और मसूर की फसलों का रकबा हर साल कम होता चला जा रहा है। यही वजह है कि बाजार में दालों के दाम भी आसमान छू रहे हैं। तिलहनी फसलों के नाम पर किसान सिर्फ सरसों की फसल उगाते हैं। राहत देने वाली बात यह है कि पिछले कुछ सालों में सरसों का रकबा बढ़ना शुरू हुआ है। सरसों की अधिकतर बुआई घरेलू प्रयोग के लिए हो रही है। पशुओं के लिए खल और घरेलू प्रयोग के लिए तेल निकलवाते हैं। जिले में सरसों के लिए स्पेलर संचालित हैं। दुकानदार अमित अग्रवाल का कहना है कि स्थानीय स्तर पर दालों की खेती नहीं होने से कीमत बढ़ रही है। हर साल दलहन और तिलहन के उत्पादों का दाम बढ़ रहा है।
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मटर का रकबा (हेक्टेयर में)
साल रकबा
2016-17 145
2017-18 141
2018-19 138
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मसूर का रकबा (हेक्टेयर में)
साल रकबा
2016-17 66
2017-18 63
2018-19 61
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मूंग का रकबा (हेक्टेयर में)
साल रकबा
2018-19 28
2019-20 17
2020-21 16
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उर्द का रकबा (हेक्टेयर में)
2018-19 449
2019-20 322
2020-21 435
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दालों से लौटेगी भूमि की उर्वरा शक्ति
बागपत। कृषि विज्ञान केंद्र खेकड़ा के कृषि वैज्ञानिक डॉ संदीप चौधरी का कहना है कि किसान अगर दलहनी फसलों की खेती करते हैं तो जमीन की उर्वरा शक्ति मजबूत होगी। दालों से जमीन में नाइट्रोजन बढ़ती है, जो अन्य फसलों के लिए लाभदायक होती है। किसानों को दालों की खेती जरूर करनी चाहिए।
जिले में सरसों का रकबा बढ़ा
बागपत। जिला कृषि अधिकारी डॉ सूर्य प्रताप का कहना है कि जिले में सरसों का रकबा बढ़ रहा है। साल 2018-19 में सरसों का रकबा 2065 हेक्टेयर था। 2019-20 में 2075 पर पहुंच गया और इस साल यानि 2020-21 का लक्ष्य 2088 हेक्टेयर का रखा गया है। उम्मीद यह है कि करीब 2100 हेक्टेयर तक इस साल सरसों की बुवाई हो जाएगी। मूंगफली, सूरजमूखी समेत अन्य तिलहनी खेती से किसान परहेज कर रहे हैं।
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क्या कहते हैं किसान
बागपत। सरूरपुर कलां गांव के बुजुर्ग किसान रामकिशन नैन और ओमप्रकाश का कहना है कि नील गाय किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। दलहनी और तिलहनी फसलों के लिए खेतों में पहरा लगाना पड़ता है। जंगली जानवर नुकसान करते हैं। दलहनी फसलों पर फलियां आते ही नील गाय चट कर जाती है, जिस कारण किसान इन फसलों को छोड़ रहे हैं।
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मटर का रकबा (हेक्टेयर में)
साल रकबा
2016-17 145
2017-18 141
2018-19 138
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मसूर का रकबा (हेक्टेयर में)
साल रकबा
2016-17 66
2017-18 63
2018-19 61
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मूंग का रकबा (हेक्टेयर में)
साल रकबा
2018-19 28
2019-20 17
2020-21 16
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उर्द का रकबा (हेक्टेयर में)
2018-19 449
2019-20 322
2020-21 435
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दालों से लौटेगी भूमि की उर्वरा शक्ति
बागपत। कृषि विज्ञान केंद्र खेकड़ा के कृषि वैज्ञानिक डॉ संदीप चौधरी का कहना है कि किसान अगर दलहनी फसलों की खेती करते हैं तो जमीन की उर्वरा शक्ति मजबूत होगी। दालों से जमीन में नाइट्रोजन बढ़ती है, जो अन्य फसलों के लिए लाभदायक होती है। किसानों को दालों की खेती जरूर करनी चाहिए।
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जिले में सरसों का रकबा बढ़ा
बागपत। जिला कृषि अधिकारी डॉ सूर्य प्रताप का कहना है कि जिले में सरसों का रकबा बढ़ रहा है। साल 2018-19 में सरसों का रकबा 2065 हेक्टेयर था। 2019-20 में 2075 पर पहुंच गया और इस साल यानि 2020-21 का लक्ष्य 2088 हेक्टेयर का रखा गया है। उम्मीद यह है कि करीब 2100 हेक्टेयर तक इस साल सरसों की बुवाई हो जाएगी। मूंगफली, सूरजमूखी समेत अन्य तिलहनी खेती से किसान परहेज कर रहे हैं।
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क्या कहते हैं किसान
बागपत। सरूरपुर कलां गांव के बुजुर्ग किसान रामकिशन नैन और ओमप्रकाश का कहना है कि नील गाय किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। दलहनी और तिलहनी फसलों के लिए खेतों में पहरा लगाना पड़ता है। जंगली जानवर नुकसान करते हैं। दलहनी फसलों पर फलियां आते ही नील गाय चट कर जाती है, जिस कारण किसान इन फसलों को छोड़ रहे हैं।