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गांव की तस्वीर बदलने में जुटीं है प्रधान सुनीता
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बड़ौत के बावली गांव में महिलाओं को बालिका शिक्षा व कन्या भ्रूण हत्या को लेकर जागरूक करती प्रधान
- फोटो : BARAUT
बड़ौत। पहली बार प्रधानी की कमान संभालने वाली बावली गांव की सुनीता गृहस्थी की जिम्मेदारी तो बखूबी निभाई ही रही है, नई सोच व इच्छाशक्ति के बल पर गांव की तस्वीर और तकदीर दोनों ही बदलने में जुटी है। यही वजह है कि लोगों ने उनके इस जज्बे को सराहा है तो सरकार ने उनके हौसले को सलाम करते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरता पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी है।
बड़ौत ब्लाक की बावली ग्राम पंचायत की प्रधान सुनीता पत्नी ओमवीर भले ही दसवीं तक पढ़ी हैं, लेकिन उन्होंने गांव में विकास की ऐसी बयार चलाई कि दूसरे प्रधानों के लिए मिसाल बन गईं। 11 हजार आबादी वाली ग्राम पंचायत का प्रतिनिधित्व करने वाली सुनीता स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य पर काम कर रही हैं। उनकी ग्राम पंचायत में नालियां पक्की बनी हुई हैं, नियमित साफ-सफाई होती है, रोज कूड़ा उठता है। प्रधान सुनीता बताती है जब चुनाव जीतीं तो उसी दिन तय कर लिया था कि कुछ ऐसा करके दिखाएंगी कि लोग उन्हें याद रखें। उन्होंने तय कर लिया कि गांव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर काम करेंगी। गांव मेें तीन प्राइमरी विद्यालय है जबकि एक राजकीय कन्या इंटर कॉलेज व एक केन्द्रीय विद्यालय है। इतना ही नहीं बालक-बालिकाओं की शिक्षा के लिए उन्हें ग्राम समाज की ओर से गांव में केंद्रीय विद्यालय खुलवाने के लिए 25 बीघा जमीन तक दे दी। इसके अलावा सुनीता महिलाओं के साथ रोज संवाद करती हैं, उन्हें भ्रूण हत्या व बाल विवाह जैसी बुराइयों के दुष्परिणामों के बारे में बताती हैं। उनका सबसे ज्यादा जोर बेटियों की शिक्षा पर रहता है। कहती हैं कि अगर महिला पढ़ी लिखी होगी तो दो कुलों को रोशन करेगी।
पति के साथ रोजाना गांव का भ्रमण
प्रधान बताती है कि वह रोज दो घंटे पति के साथ गांव में निकलकर ग्रामीणों को खुले में शौच न जाने के लिए प्रेरित करती हैं। वह खुश हैं कि आज उनके गांव की तस्वीर बदली है और अपने काम की बदौलत उन्हें सम्मान मिला है।
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बेटी को बनाया टीचर
बड़ौत। सुनीता देवी भले ही दसवीं पास हो, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी आयुषी को पढ़ा-लिखाकर टीचर बनाया। बेटी आयुषी भी अपनी मां के कार्यों पर गर्व महसूस करती है।
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बड़ौत ब्लाक की बावली ग्राम पंचायत की प्रधान सुनीता पत्नी ओमवीर भले ही दसवीं तक पढ़ी हैं, लेकिन उन्होंने गांव में विकास की ऐसी बयार चलाई कि दूसरे प्रधानों के लिए मिसाल बन गईं। 11 हजार आबादी वाली ग्राम पंचायत का प्रतिनिधित्व करने वाली सुनीता स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य पर काम कर रही हैं। उनकी ग्राम पंचायत में नालियां पक्की बनी हुई हैं, नियमित साफ-सफाई होती है, रोज कूड़ा उठता है। प्रधान सुनीता बताती है जब चुनाव जीतीं तो उसी दिन तय कर लिया था कि कुछ ऐसा करके दिखाएंगी कि लोग उन्हें याद रखें। उन्होंने तय कर लिया कि गांव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर काम करेंगी। गांव मेें तीन प्राइमरी विद्यालय है जबकि एक राजकीय कन्या इंटर कॉलेज व एक केन्द्रीय विद्यालय है। इतना ही नहीं बालक-बालिकाओं की शिक्षा के लिए उन्हें ग्राम समाज की ओर से गांव में केंद्रीय विद्यालय खुलवाने के लिए 25 बीघा जमीन तक दे दी। इसके अलावा सुनीता महिलाओं के साथ रोज संवाद करती हैं, उन्हें भ्रूण हत्या व बाल विवाह जैसी बुराइयों के दुष्परिणामों के बारे में बताती हैं। उनका सबसे ज्यादा जोर बेटियों की शिक्षा पर रहता है। कहती हैं कि अगर महिला पढ़ी लिखी होगी तो दो कुलों को रोशन करेगी।
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पति के साथ रोजाना गांव का भ्रमण
प्रधान बताती है कि वह रोज दो घंटे पति के साथ गांव में निकलकर ग्रामीणों को खुले में शौच न जाने के लिए प्रेरित करती हैं। वह खुश हैं कि आज उनके गांव की तस्वीर बदली है और अपने काम की बदौलत उन्हें सम्मान मिला है।
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बेटी को बनाया टीचर
बड़ौत। सुनीता देवी भले ही दसवीं पास हो, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी आयुषी को पढ़ा-लिखाकर टीचर बनाया। बेटी आयुषी भी अपनी मां के कार्यों पर गर्व महसूस करती है।