{"_id":"13caceb3892a31edbe63fa98e0d04ecc","slug":"har-jakhm-par-hota-hai-fakhra-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"हर जख्म पर होता है फख्र ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हर जख्म पर होता है फख्र
ब्यूरो/अमर उजाला, बागपत
Updated Sun, 30 Aug 2015 01:35 AM IST
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1965 के युद्घ में पाकिस्तानी सेना के दांत खट्टे करने वाले बहादुर सैनिकों में से एक कैप्टन राज सिंह ढाका के शरीर में जख्मों के गहरे निशान ही नहीं, उस पाकिस्तानी मोर्टार के टुकड़े आज भी मौजूद हैं जो उनके ऊपर गिरा था। घायल राज सिंह के जख्मों को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की पत्नी ललिता शास्त्री ने अपने हाथों से धोया था। उन्हें अपने जख्मों के निशान को देखकर आज भी फख्र होता हैं।
रिटायर्ड कैप्टन राज सिंह ढाका (87) बताते है कि 1965 में वे फर्स्ट पैरा रेजीमेंट में नायब सूबेदार के पद पर थे। उनकी तैनाती बारामूला की तहसील उड़ी में थी। 14 अगस्त 1965 को दोपहर एक बजे वे अपने साथियों के साथ मैस में खाना बना रहे थे। इसी दौरान वहां पर 15-20 मोर्टार गिरे। तभी अलार्म बज गया।
सभी जवान ब्रिगेडियर रणसिंह के नेतृत्व में हथियार लेकर पहाड़ियों की ओर दौड़ पड़े। 24 अगस्त को 8464 फीट की ऊंचाई पर पहुंचकर रात 11 बजे पाकिस्तान की उड़ी की पश्चिमी शंख पैकेट को उड़ा दिया। 25 अगस्त को मेजर आरएस दयाल के नेतृत्व में हाजी पीर दर्रे के लिए रवाना हुए।
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26 अगस्त को हाजी पीर को कैप्चर कर लिया गया। अगले दिन पाकिस्तान के डिफेंस पर कब्जा किया। इस दौरान दस हिंदुस्तानी जवान शहीद हो गए थे, जबकि दस से अधिक घायल हुए। मगर, दुश्मनों को पस्त करते हुए पाकिस्तान के क्षेत्र में बढ़ते रहेे। 28 अगस्त को पीर पंजाल रेंज के हेड क्वार्टर पर कब्जा कर लिया।
8 सितंबर को हाजी पीर से 12 किलो मीटर दूर 8777 फीट ऊंची पहाड़ी पर हमला करते समय उनके ऊपर मोर्टार गिरा। इसमें मेजर जेसीएम और उनके समेत 20 जवान घायल हो गए थे। उन्हें जहाज द्वारा श्रीनगर भेजा गया। वहां से प्राथमिक उपचार देकर दिल्ली भेज दिया गया ।
दिल्ली के जनरल हॉस्पिटल में उनका उपचार हुआ था। जनरल हॉस्पिटल में उनसे मिलने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पत्नी ललिता शास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दिल्ली पहुंची। इस दौरान उन्होंने उनके जख्म धोए थे। बाद में उनका ऑपरेशन पूना में हुआ था।
आंखों के सामने हुए 12 जवान शहीद
बागपत। कैप्टर राज सिंह का कहना है कि उनकी आंखों के सामने 12 जवान शहीद और 250 जवान घायल हुए थे। उन्होंने अनेकों पाक सैनिकों को अपनी गोलियों का निशाना बनाया।
पाकिस्तानी सेना का लेकर आए संदूक
बागपत। राज सिंह बताते है जंग के दौरान दुश्मन अपना संदूक छोड़ गए थे। वे उस संदूक को वहां से ले आए थे। उनके घर पर आज भी वह संदूक मौजूद है।
राज सिंह को मिले 14 राष्ट्रपति मेडल
बागपत। रिटायर्ड कैंप्टन राज सिंह का कहना है कि उन्हें 14 राष्ट्रपति मेडल मिल चुके हैं। इनके अलावा विभिन्न जगहों पर पुरस्कार मिले हैं।
तीन पीढ़ी कर रही देश सेवा
बागपत। राजसिंह ढाका, थल सेना से कैप्टन के पद से रिटायर्ड हुए है। उनका बेटा बाबू ढाका हवलदार के पद से रिटायर्ड हो चुके हैं। अब उनका पौत्र संजीव ढाका देश की सेवा कर रहा है।
चार दिन तक भूखे पेट की थी लड़ाई
बागपत। राज सिंह बताते हैं कि उन्होंने चार दिन तक बगैर भोजन किए दुश्मनों से जंग की। उसके बाद दो हेलीकॉप्टर पहाड़ी पर भोजन लेकर पहुंचे थे। एक हेलीकॉप्टर ने ऊपर से खाना फेंका था। दूसरे हेलीकॉप्टर पर दुश्मनों ने फायरिंग की थी। अधिकांश भोजन पेड़ों और मिट्टी पर गिरने से खराब हो गया था। बताया कि 26 अगस्त से 8 सितंबर तक उन्होंने मात्र चार-पांच बार ही खाना खाया था। उनके पास खच्चर से खाना पहुंचता था।
चिकित्सकों ने कर दिया था मृत घोषित
बागपत। राजसिंह बताते हैं कि दिल्ली के जनरल हॉस्पिटल के चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था। उनके घर और डिपार्टमेंट में मौत का टेलीग्राम पहुंच गया था। परिवार के लोग उनका शव लेने के लिए दिल्ली पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गए थे। इसी दौरान उन्हें होश आया और वे बोले तो वहां पर मौजूद स्वीपर डर गया था। उसने चिकित्सकों को इसकी जानकारी दी तो उसे धमकाकर वहां से भगा दिया गया था। दोबारा उसके कहने पर चिकित्सक वहां पहुंचे थे। इसके बाद उनका अस्पताल में उपचार हुआ था।
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रिटायर्ड कैप्टन राज सिंह ढाका (87) बताते है कि 1965 में वे फर्स्ट पैरा रेजीमेंट में नायब सूबेदार के पद पर थे। उनकी तैनाती बारामूला की तहसील उड़ी में थी। 14 अगस्त 1965 को दोपहर एक बजे वे अपने साथियों के साथ मैस में खाना बना रहे थे। इसी दौरान वहां पर 15-20 मोर्टार गिरे। तभी अलार्म बज गया।
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सभी जवान ब्रिगेडियर रणसिंह के नेतृत्व में हथियार लेकर पहाड़ियों की ओर दौड़ पड़े। 24 अगस्त को 8464 फीट की ऊंचाई पर पहुंचकर रात 11 बजे पाकिस्तान की उड़ी की पश्चिमी शंख पैकेट को उड़ा दिया। 25 अगस्त को मेजर आरएस दयाल के नेतृत्व में हाजी पीर दर्रे के लिए रवाना हुए।
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26 अगस्त को हाजी पीर को कैप्चर कर लिया गया। अगले दिन पाकिस्तान के डिफेंस पर कब्जा किया। इस दौरान दस हिंदुस्तानी जवान शहीद हो गए थे, जबकि दस से अधिक घायल हुए। मगर, दुश्मनों को पस्त करते हुए पाकिस्तान के क्षेत्र में बढ़ते रहेे। 28 अगस्त को पीर पंजाल रेंज के हेड क्वार्टर पर कब्जा कर लिया।
8 सितंबर को हाजी पीर से 12 किलो मीटर दूर 8777 फीट ऊंची पहाड़ी पर हमला करते समय उनके ऊपर मोर्टार गिरा। इसमें मेजर जेसीएम और उनके समेत 20 जवान घायल हो गए थे। उन्हें जहाज द्वारा श्रीनगर भेजा गया। वहां से प्राथमिक उपचार देकर दिल्ली भेज दिया गया ।
दिल्ली के जनरल हॉस्पिटल में उनका उपचार हुआ था। जनरल हॉस्पिटल में उनसे मिलने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पत्नी ललिता शास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दिल्ली पहुंची। इस दौरान उन्होंने उनके जख्म धोए थे। बाद में उनका ऑपरेशन पूना में हुआ था।
आंखों के सामने हुए 12 जवान शहीद
बागपत। कैप्टर राज सिंह का कहना है कि उनकी आंखों के सामने 12 जवान शहीद और 250 जवान घायल हुए थे। उन्होंने अनेकों पाक सैनिकों को अपनी गोलियों का निशाना बनाया।
पाकिस्तानी सेना का लेकर आए संदूक
बागपत। राज सिंह बताते है जंग के दौरान दुश्मन अपना संदूक छोड़ गए थे। वे उस संदूक को वहां से ले आए थे। उनके घर पर आज भी वह संदूक मौजूद है।
राज सिंह को मिले 14 राष्ट्रपति मेडल
बागपत। रिटायर्ड कैंप्टन राज सिंह का कहना है कि उन्हें 14 राष्ट्रपति मेडल मिल चुके हैं। इनके अलावा विभिन्न जगहों पर पुरस्कार मिले हैं।
तीन पीढ़ी कर रही देश सेवा
बागपत। राजसिंह ढाका, थल सेना से कैप्टन के पद से रिटायर्ड हुए है। उनका बेटा बाबू ढाका हवलदार के पद से रिटायर्ड हो चुके हैं। अब उनका पौत्र संजीव ढाका देश की सेवा कर रहा है।
चार दिन तक भूखे पेट की थी लड़ाई
बागपत। राज सिंह बताते हैं कि उन्होंने चार दिन तक बगैर भोजन किए दुश्मनों से जंग की। उसके बाद दो हेलीकॉप्टर पहाड़ी पर भोजन लेकर पहुंचे थे। एक हेलीकॉप्टर ने ऊपर से खाना फेंका था। दूसरे हेलीकॉप्टर पर दुश्मनों ने फायरिंग की थी। अधिकांश भोजन पेड़ों और मिट्टी पर गिरने से खराब हो गया था। बताया कि 26 अगस्त से 8 सितंबर तक उन्होंने मात्र चार-पांच बार ही खाना खाया था। उनके पास खच्चर से खाना पहुंचता था।
चिकित्सकों ने कर दिया था मृत घोषित
बागपत। राजसिंह बताते हैं कि दिल्ली के जनरल हॉस्पिटल के चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था। उनके घर और डिपार्टमेंट में मौत का टेलीग्राम पहुंच गया था। परिवार के लोग उनका शव लेने के लिए दिल्ली पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गए थे। इसी दौरान उन्हें होश आया और वे बोले तो वहां पर मौजूद स्वीपर डर गया था। उसने चिकित्सकों को इसकी जानकारी दी तो उसे धमकाकर वहां से भगा दिया गया था। दोबारा उसके कहने पर चिकित्सक वहां पहुंचे थे। इसके बाद उनका अस्पताल में उपचार हुआ था।