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अंग्रेजों के जुल्मों की याद ताजा करता है बरगद का पेड़

Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
Baghpat
Baghpat Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
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बड़ौत। सन 1857 की क्रांति में बिजरौल गांव के लोगों की अहम भूमिका रही है। गांव में मौजूद बरगद का वह पेड़ आज भी अंग्रेजी हुकूमत के जल्मों की याद ताजा करा देता है, जिस पर अंग्रेजों ने 32 क्रांतिकारियों को सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाकर मौत के घाट उतार दिया था।
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अंग्रेजों को नाकों चने चबवाने वाले अमर शहीद बाबा शाहमल सिंह भी बिजरौल गांव में ही रहते थे। वे इतने साहसी और बहादुर थे कि अंग्रेजी सेना के बड़े अफसर भी उनका नाम लेते ही कांपने लगते थे। सन 1857 की क्रांति से जुड़ी जनपद बागपत की एतिहासिक घटनाएं, स्थल व इमारतें और गांव के क्रांतिकारियों की वीर गाथाएं आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन के मुताबिक मेरठ से शुरू हुई 10 मई 1857 की क्रांति की आग जल्द ही बागपत और बड़ौत क्षेत्र में भी फैल गई थी। बिजरौल के सैकड़ों क्रांतिकारियों ने बाबा शाहमल के साथ तत्कालीन बड़ौत तहसील पर हमला बोल सरकारी खजाना लूट लिया था। इसके बाद वे बड़का के गांव जंगल में छुप गए थे। किसी मुखबिर ने यह सूचना अंग्रेजों को दे दी, जिसके बाद 18 जुलाई 1857 को अंग्रेजों ने भारी असलहे के साथ उन पर हमला बोल दिया। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के अत्याधुनिक असलहों का सामना बडे़ ही साहस के साथ किया तभी एटोनोकी नाम के फ्रांसीसी सैनिक ने बाबा शाहमल पर पीछे से हमला बोल दिया था, जिसमें बाबा शहीद हो गए। इसके बाद गुस्से मेें बौखलाए अंग्रेजों ने बिजरौल गांव में पहुंच 32 और क्रांतिकारियों को गांव के ही दक्षिणी छोर पर खडे़ विशाल बरगद के पेड़ पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाकर मौत के घाट उतार दिया था। आज भी वह बरगद का पेड़ बिजरौल के शहीदों की याद दिलाता है।
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