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मां भगवती के तृतीय स्वरूप चंद्रघंटा की हुई पूजा अर्चना
Updated Wed, 21 Mar 2018 01:12 AM IST
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बागपत। जिले भर में नवरात्र में मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप चंद्रघंटा की पूजा अर्चना की गई। मंदिरों में भजन कीर्तन का आयोजन हुआ और अखंड ज्योति जलाई। मंदिरों में पूजा अर्चना के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। शाम के समय उपासकों ने व्रत खोले। मां चंद्रघंटा के साथ भैरव बाबा की भी उपासना की गई।
सुखी जीवन भोगते हुए प्रभु की भक्ति के इंसान
अमीनगर सराय। कस्बे के शिव मंदिर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दौरान वृंदावन धाम से आई बहन स्तुति ने प्रभु की महत्ता को बताया। उन्होंने कहा कि हम भले ही लाख माया अपने पास जोड़ लें, लाख संसाधन से अपने को चारों ओर से घेर ले लेकिन हम अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाते। मानव जीवन का मात्र एक लक्ष्य भौतिकता की चकाचौंध में खो जाना नहीं है।
देवी के मंदिर में चढ़ता है आस्था का प्रसाद
अग्रवाल मंडी टटीरी। खट्टा प्रहलादपुर की भगवती की तपस्या ने उन्हें देवी स्वरूप बना दिया। उनकी आस्था के बाद ही टटीरी में मंदिर बना था। बताते हैं कि खट्टा प्रहलादपुर निवासी बलवंत सिंह की पुत्री भगवती देवी ने मां दुर्गा के प्रति आस्था बचपन से ही कूट-कूटकर भरी हुई थी। 1958 में 10 वर्ष की उम्र में गांव में ही 40 दिन तक खड़ी तपस्या की। उसके बाद सूरजपुर महनवा में इतने ही दिन तो घोर तपस्या पर बैठ गई। भगवती देवी के भतीजे ऋषिपाल सिंह और उनकी पत्नी सुमन ने बताया कि उस समय शाहदरा से सहारनपुर तक छोटी रेल चलती थी और भगवती की भक्ति के कारण ट्रेन महनवा में ही खाली हो जाती थी। भक्ति के चलते सभी ट्रेन यात्री उनके पास पहुंचते थे। उन्होंने मेरठ-बागपत मार्ग पर मंदिर बनाने की इच्छा प्रकट की थी। जिसके बाद 1960 में मंदिर का निर्माण हुआ। मंदिर पर नवरात्र में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
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सुखी जीवन भोगते हुए प्रभु की भक्ति के इंसान
अमीनगर सराय। कस्बे के शिव मंदिर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दौरान वृंदावन धाम से आई बहन स्तुति ने प्रभु की महत्ता को बताया। उन्होंने कहा कि हम भले ही लाख माया अपने पास जोड़ लें, लाख संसाधन से अपने को चारों ओर से घेर ले लेकिन हम अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाते। मानव जीवन का मात्र एक लक्ष्य भौतिकता की चकाचौंध में खो जाना नहीं है।
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देवी के मंदिर में चढ़ता है आस्था का प्रसाद
अग्रवाल मंडी टटीरी। खट्टा प्रहलादपुर की भगवती की तपस्या ने उन्हें देवी स्वरूप बना दिया। उनकी आस्था के बाद ही टटीरी में मंदिर बना था। बताते हैं कि खट्टा प्रहलादपुर निवासी बलवंत सिंह की पुत्री भगवती देवी ने मां दुर्गा के प्रति आस्था बचपन से ही कूट-कूटकर भरी हुई थी। 1958 में 10 वर्ष की उम्र में गांव में ही 40 दिन तक खड़ी तपस्या की। उसके बाद सूरजपुर महनवा में इतने ही दिन तो घोर तपस्या पर बैठ गई। भगवती देवी के भतीजे ऋषिपाल सिंह और उनकी पत्नी सुमन ने बताया कि उस समय शाहदरा से सहारनपुर तक छोटी रेल चलती थी और भगवती की भक्ति के कारण ट्रेन महनवा में ही खाली हो जाती थी। भक्ति के चलते सभी ट्रेन यात्री उनके पास पहुंचते थे। उन्होंने मेरठ-बागपत मार्ग पर मंदिर बनाने की इच्छा प्रकट की थी। जिसके बाद 1960 में मंदिर का निर्माण हुआ। मंदिर पर नवरात्र में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
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