आंख खुली तो सामने था बीहड़: कभी थी हाथों में बंदूक, अब घर-गृहस्थी संभाल रहीं दस्यु सुंदरी नीलम; खास बातचीत
Azamgarh News: कभी हाथों में बंदूक थामकर बीहड़ में जीवन बिताने वाली दस्यु सुंदरी नीलम अब गृहस्थी संभाल रही हैं। कक्षा पांच में पढ़ने के दौरान रास्ता पूछने के बहाने उनका अपहरण कर लिया गया था। आंख खुली तो सामने बीहड़ था। बाद में घरवालों ने अपनाने से इनकार किया तो उन्होंने लखनऊ में नौकरी की। अब नीलम सामान्य जिंदगी जीने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
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विस्तार
उम्र महज 12-13 साल। कक्षा पांच की छात्रा। सात भाई बहनों में छठवें नंबर की संतान। घर में किसी तरह की बड़ी परेशानी नहीं थी। माता-पिता स्वस्थ थे और पढ़ाई सामान्य रूप से चल रही थी। फिर एक दिन रास्ता पूछने के बहाने उसकी जिंदगी को ऐसा मोड़ मिला, जिसने उसका बचपन छीन लिया।
यह कोई फिल्म की कहानी नहीं बल्की औरैया जिले के विधूना कस्बे की रहने वाली नीलम गुप्ता के असल जीवन की कहानी है। हालांकि कभी बीहड़ में बंदूक थामकर खूंखार डकैत निर्भय सिंह गुर्जर के गैंग के साथ रहने वाली दस्यु सुंदरी नीलम गुप्ता की जिंदगी अब पूरी तरह बदल चुकी है। बीहड़ की जिंदगी से बाहर आने के बाद नीलम ने नया जीवन साथी चुना और अब वह परिवार की जिम्मेदारियां निभा रही है। कभी जिन हाथों में बंदूक रहती थी, उन्हीं हाथों से आज वह घर-परिवार संभाल रही है।
दस्यु सुंदरी रहीं नीलम गुप्ता ने जब अपनी पुराने जीवन को याद कर अपनी कहानी से रूबरू कराया तो मानों चंबल का वो दृश्य उनके सामने हो। नीलम ने बातचीत के दौरान बताया कि जब 12-13 वर्ष की उम्र में वर्ष 2003 में उनका अपहरण हुआ तो निर्भय सिंह गुर्जर उन्हें लेकर बीहड़ के जंगल में ले गया।
आंख खुली तो घर नहीं, चंबल का बीहड़ सामने था। सामने खाकी और चितकबरी वर्दी पहने लोग थे। उसे लगा कि शायद पुलिस या फौज के लोग उसे बचाकर यहां लाए हैं। लेकिन, जल्द ही हकीकत सामने आ गई। वह पुलिस के बीच नहीं, बल्कि डकैत निर्भय सिंह गुर्जर के गिरोह के बीच थी। उसने घर पहुंचाने की गुहार लगाई। लेकिन वहां मौजूद लोग हंसने लगे।
फिर उसे बताया गया कि जो इस जगह पर एक बार आ जाता है, वह वापस नहीं जाता। यहीं से उसे पता चला कि वह किस दुनिया में पहुंच चुकी है। जब निर्भय सिंह गुर्जर के बारे में पूछा कि कौन है तो पीछे से बड़ी-बड़ी दाढ़ी और बड़ी आंखों वाला निर्भय सिंह गुर्जर ने कहा मैं हूं आईपीएस दस्यु सम्राट निर्भय सिंह गुर्जर, तुम मेरी कैद में हो।
नीलम ने बताया कि अपहरण के करीब छह माह बाद निर्भय ने 26 जनवरी 2004 को इटावा जिले के जाहरपुर गांव के एक मंदिर में जबरन शादी की थी। इस दौरान पुलिस की छापेमारी हुई तो वहीं पर उसका लहंगा छूट गया। इसे लेकर निर्भय ने काफी बवाल काटा था। आठ यादवों का अपहरण कर लिया और जान से मारने की धमकी दे डाली।
हालांकि बिचौलियों की मदद से निर्भय लहंगा के बदले हर्जाना लेकर शांत हो गया। करीब 22 महीने तक डकैतों के बीच रहने के बाद नीलम गुप्ता ने गिरोह से बगावत कर दी। भागने की कोशिशें कीं, कथित प्रताड़ना झेली, दूसरे अपहृत लोगों की मदद करने का प्रयास किया और आखिरकार अपनी जिंदगी को उस अंधेरी दुनिया से बाहर निकालने में सफल हुई।
दुर्गा मंदिर का रास्ता पूछा, पीछे से बेहोश कर उठा ले गए : नीलम के मुताबिक घटना के समय वह कक्षा पांच में पढ़ती थी और स्कूल में परीक्षाएं चल रही थीं। गांव में मार्शल वाहन से आए कुछ लोगों ने उससे दुर्गा मंदिर का रास्ता पूछा। वह सामान्य तरीके से रास्ता बताने लगी। इसी दौरान पीछे से आए लोगों ने उसे कथित तौर पर बेहोश कर दिया। इसके बाद उसे कहां ले जाया गया, इसकी उसे कोई जानकारी नहीं थी। काफी देर बाद जब आंख खुली तो सामने जंगल था।
घर लौटने की कोशिश की तो झेलनी पड़ी कथित प्रताड़ना : नीलम ने बताया कि बीहड़ पहुंचने के बाद उसका मन लगातार घर लौटने का था। उसने कई बार वहां से निकलने की कोशिश की, लेकिन हर बार पकड़ी गई। बताया कि भागने की कोशिशों के दौरान उसे मारापीटा गया और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। कम उम्र होने के कारण वह उन परिस्थितियों को पूरी तरह समझ भी नहीं पा रही थी। लेकिन एक बात उसके भीतर लगातार बनी रही उसे किसी भी तरह इस दुनिया से बाहर निकलना था।
भागने के लिए सही मौके का करती रही इंतजार : नीलम बताती है कि वह बाहर निकलने का रास्ता लगातार तलाशती रही। आसपास के गांवों, सड़कों और रास्तों की जानकारी जुटाती रही। गिरोह में रहते हुए भी उसने अपनी वास्तविक मंशा किसी को जाहिर नहीं होने दी। बाहर से वह परिस्थितियों के साथ चलती दिखाई देती रही, लेकिन भीतर ही भीतर वह बीहड़ से निकलने की योजना बनाती रही। उसके लिए हर दिन इस उम्मीद में गुजरता था कि शायद आज ऐसा मौका मिल जाए, जिससे वह वापस अपने घर और सामान्य जिंदगी में लौट सके।
दो अपहृत युवकों की मदद करने की कोशिश : नीलम ने बताया कि गिरोह में केवल डकैत ही नहीं थे, बल्कि कुछ अपहृत लोग भी रहते थे। उसने दो युवकों को वहां से निकलने में मदद करने की कोशिश की। इसके लिए उसने गिरोह की चाबी तक उपलब्ध कराई। हालांकि दोनों युवक जंगल से निकलने में सफल नहीं हो सके। इस घटना के बाद नीलम के लिए खतरा और बढ़ गया। उसे डर था कि अगर गिरोह को उसकी भूमिका का पता चल गया तो उसकी जान भी जा सकती है। फिर भी उसके भीतर अपराध की दुनिया से बाहर निकलने की इच्छा कम नहीं हुई।
अपराधों को देखकर मन में बढ़ती गई नाराजगी : नीलम ने बताया कि गिरोह के साथ रहते हुए उसने कई ऐसी घटनाएं देखीं, जिनसे अपराध की दुनिया के प्रति उसके मन में नाराजगी बढ़ती गई। खासकर महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाले व्यवहार ने उसे भीतर तक झकझोर दिया। वह बताती हैं कि उसने कई बार निर्भय सिंह गुर्जर से आत्मसमर्पण कर सामान्य जिंदगी में लौटने की बात कही, लेकिन उसकी बात नहीं मानी गई। आखिरकार उसने तय कर लिया कि अब किसी भी कीमत पर उसे इस दुनिया से बाहर निकलना है।
बेहद अय्याश था निर्भय गुज्जर : नीलम ने बताया कि निर्भय सिंह बेहद अय्याश था। उसे अपनी हवस पूरी करने के लिए आए दिन नई-नई लड़कियों की तलाश रहती थी। जिस समय उसने मेरी जिंदगी बर्बाद की, मैं उसकी बेटी की उम्र की थी। उसने मेरे साथ इतना बुरा सलूक किया, जो मैं कभी भूल नहीं सकती हूं। धीरे-धीरे गैंग के लोगों से उसके बारे में पता चला। मुझसे पहले भी उसकी हवस पूरी करने के लिए कई लड़कियां लाई जा चुकी थीं।
मुन्नी पांडेय, सीमा और सरला का नाम भी इन्हीं में से था। उसने अपने बेटे श्याम जाटव की पत्नी सरला को भी नहीं छोड़ा था। निर्भय कभी डकैती या किसी अपराध के दौरान गैंग के नए लोगों पर भरोसा नहीं करता था। वो मुझे कभी इन जगहों पर नहीं ले जाता था। वो मुझे हमेशा शक की निगाह से देखता था क्योंकि मैं कई बार भागने की कोशिश कर चुकी थी।
श्याम जाटव के साथ बनाई भागने की योजना : नीलम ने बताया कि इसी दौरान उसकी गिरोह के सदस्य और निर्भय सिंह गुर्जर के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले श्याम जाटव से नजदीकी बढ़ी। दोनों ने परिस्थितियों को समझते हुए बीहड़ से निकलने की योजना बनाई। श्याम को जंगल और बीहड़ के रास्तों की जानकारी थी, जबकि नीलम को बाहर की दुनिया और शहरों की जानकारी थी। दोनों ने मिलकर रास्ता तलाशा और अंततः गिरोह से बगावत कर बाहर निकल गए।
निर्भय ने नीलम पर घोषित किया था 21 लाख का इनाम : नीलम गुप्ता ने बताया कि जब उन्होंने श्याम के साथ 31 जुलाई 2004 को इटावा की एंटी डकैती कोर्ट में सरेंडर कर दिया तो निर्भय गुर्जर आगबबूला हो गया था। उसने एलान किया था कि जो भी उसकी पत्नी को जिंदा या मुर्दा पकड़कर लाएगा, उसे वो 21 लाख रुपए का इनाम देगा। उसके लिए यह सिर्फ बीहड़ से निकलने की घटना नहीं थी, बल्कि उस सोच के खिलाफ विद्रोह था कि गिरोह में आने वाला कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से बाहर नहीं जा सकता।
आत्मसमर्पण के बाद भी खत्म नहीं हुआ संघर्ष : बीहड़ से बाहर निकलना नीलम की कहानी का अंत नहीं था। इसके बाद भी उनके सामने लंबी न्यायिक प्रक्रिया और जेल का दौर आया। नीलम ने बताया कि आत्म समर्पण के बाद उन्हें लंबे समय तक करीब 12 साल तक जेल में रहना पड़ा। बाद में उम्र से जुड़े तथ्यों को लेकर न्यायिक प्रक्रिया में उन्हें नाबालिग घोषित किया गया। जेल से बाहर आने के बाद असली चुनौती सामान्य समाज में लौटने की थी।
2016 में घर लौटने का जिक्र करते हुए नीलम कहती हैं कि उनके मन में सामान्य इंसान की तरह यही इच्छा थी कि इतने वर्षों बाद जब वह घर जाएंगी तो भाई और परिवार उन्हें अपनाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। परिवार में एक भाई छोटी-मोटी मदद करता था, लेकिन वह भी उस समय आर्थिक रूप से सक्षम नहीं था। जिन लोगों से उन्हें अपनाए जाने की उम्मीद थी, वहां भी वह सहारा नहीं मिला। आखिरकार उन्हें फिर घर छोड़ना पड़ा।
लखनऊ में तीन साल, फिर मेहनत से खड़ी की जिंदगी : घर से निकलने के बाद नीलम करीब तीन साल लखनऊ में रहीं। कुछ समय राजनीति से भी जुड़ीं। इसके बाद गुजारा चलाने के लिए एक कंपनी में नौकरी शुरू की। वह बताती हैं कि करीब 15 हजार रुपये से काम शुरू किया था। उनका तर्क सीधा था “चोरी-डकैती तो कर नहीं रहे हैं, मेहनत करने में कोई चोरी नहीं है।” उन्होंने अपना परिचय छिपाकर काम किया। कुछ महीने इसी तरह बीते और धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर आने लगी।
राजनीति में भी आजमाया हाथ, शिवपाल यादव की पार्टी के साथ किया काम : समय बीतने के साथ उनकी मुलाकात और बातचीत कुछ राजनीतिक लोगों से होने लगी। नीलम ने बताया कि उन्होंने शिवपाल सिंह यादव के साथ भी काम किया। इसी दौरान एक महिला ने उनकी नियुक्ति कराने में मदद की। कुछ समय राजनीतिक गतिविधियों में रहने के बाद उन्हें लगा कि अपराध की दुनिया तो वह पीछे छोड़ चुकी हैं, लेकिन समाज से पूरी तरह कटकर रहना भी कोई समाधान नहीं है। फिर उन्होंने सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश जारी रखी।
नीलम ने वर्ष 2018 में चुना नया जीवन साथी
नीलम ने बताया कि जेलर हर्षिता मिश्रा ने उनकी काफी मदद की। जेल में उन्होंने पढ़ाया लिखाया और अपनी बेटी की तरह रखा। जेल में ही कक्षा 10वीं की पढ़ाई पूरी की। नीलम ने बताया कि हर्षिता मिश्रा ने ही उनके केस को स्टडी किया और परिवार से मिलकर छुड़ाने के लिए कहा। इसके बाद नीलम के भाई प्रदीप गुप्ता ने नीलम के स्कूल से अभिलेख लिए। इसके बाद जुनाइल जस्टिस बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया गया। जहां पर जुनाइल (किशोर/नाबालिग) घोषित किया गया।
जेल से निकलने के बाद नीलम की मुलाकात आजमगढ़ जनपद के जहानागंज थाना क्षेत्र के सिंहपुर निवासी शिवशंकर सोनी से हुई। दोनों के बीच इस कदर दोस्ती आगे बढ़ी कि दोनों ने 23 नवंबर वर्ष 2018 में शादी रचा ली। नीलम एक बेटी की मां भी हैं। पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। शादी के बाद उनका कहना है कि वह अपनी जिंदगी से संतुष्ट हैं और अब उसे अपने तरीके से आगे बढ़ाना चाहती हैं।
डकैतों की पहचान आसान, समाज के चेहरों को पहचानना मुश्किल
नीलम ने बताया कि अपराध की दुनिया छोड़ने के बाद उन्होंने समाज को एक अलग नजर से देखा। उनका कहना है कि बीहड़ में कम से कम यह पता होता है कि सामने वाला कौन है और किस दुनिया से जुड़ा है। लेकिन सामान्य समाज में लोग कई चेहरे लेकर सामने आते हैं। यही वजह है कि वह कहती हैं कि बीहड़ के डकैतों को पहचानना शायद आसान है, लेकिन समाज के चेहरों को पहचानना कई बार मुश्किल होता है। नीलम ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा यही है कि जिस दर्द से वह गुजरीं, वह कहानी किसी दूसरी लड़की की जिंदगी का हिस्सा न बने।