{"_id":"5a03391d4f1c1bc1678ba0d3","slug":"job-training-after-fake-certificates-no-action-taken-after-directive","type":"story","status":"publish","title_hn":"फर्जी प्रमाण-पत्र पर ट्रेनिंग कर नौकरी, निर्देश के बाद नहीं हुई कार्रवाई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
फर्जी प्रमाण-पत्र पर ट्रेनिंग कर नौकरी, निर्देश के बाद नहीं हुई कार्रवाई
ब्यूरो,अमर उजाला,आजमगढ़
Updated Wed, 08 Nov 2017 10:34 PM IST
विज्ञापन
teacher demo pic
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आजमगढ़। वर्ष 2007 और 2008 में विशिष्ट बीटीसी में चयन के लिए जिले के 21 लोगों ने फर्जी विकलांग प्रमाण-पत्र का सहारा लेकर प्रशिक्षण पाने के बाद इनमें से 13 ने नौकरी भी पा ली। वर्ष 2010 में राज्यस्तरीय बोर्ड ने इनके विकलांग प्रमाणपत्र को फर्जी करार दिया गया।
इसके बाद राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के निदेशक ने इनपर विधिक कार्रवाई का निर्देश दिया था जिसे अधिकारी दबाकर बैठ गए। मामले की जानकारी मिलने पर डीएम ने जांच बैठाते हुए कमेटी का गठन किया है।
मुलायम सिंह यादव की सरकार में बीएड डिग्री धारकों को छह माह के विशिष्ट बीटीसी कोर्स के बाद शिक्षक की नौकरी देने का नियम था। वर्ष 2007-08 में प्रदेश के डायटों से ये कोर्स कराए गए। कोर्स में प्रवेश लेने के लिए फर्जी विकलांग प्रमाण-पत्र का सहारा लिया और कोर्स करने के बाद नौकरी भी पा ली।
विज्ञापन
शिकायत के बाद प्रदेश सरकार ने राज्य स्तरीय विकलांग कल्याण बोर्ड की ओर से 22 जनपदों के विकलांग प्रमाण-पत्र लगाने वाले 231 प्रशिक्षणार्थियों का जुलाई 2010 में फिर से परीक्षण और भौतिक सत्यापन किया गया।
इसमें 72 प्रशिक्षुओं के प्रमाण-पत्र फर्जी मिले। वर्ष अक्तूबर 2010 में राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के तत्कालीन निदेशक अशोक गांगुली की ओर से आजमगढ़ सहित प्रदेश के 22 जनपदों को डायट प्रिंसिपल को एक सूची जारी की। सूची में शामिल फर्जी प्रशिक्षणार्थियों के ऊपर विधिक कार्रवाई करने के निर्देश दिए।
इसके बाद उक्त 21 प्रशिक्षु हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गए, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद डायट को मामले में कार्रवाई करनी थी, लेकिन विभाग मामले को दबा गया। इस बीच मामला जिलाधिकारी तक पहुंच गया।
उन्होंने मामला संज्ञान में आने के बाद जांच के लिए चार सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया है। इसमें डायट प्राचार्य, बीएसए, वित्त एवं लेखाधिकारी बेसिक और जिला अर्थ एवं संख्याधिकारी को शामिल किया गया है।
फर्जी विकलागंता सर्टिफिकेट के आधार पर प्रशिक्षण करने वाले मामले में कार्रवाई के आदेश शासन की ओर से मिले थे, लेकिन मामले में विभागीय अधिकारियों की ओर से कार्रवाई नहीं की गई। मामले की जांच के लिए कमेटी का गठन किया गया है। सभी दोषियों पर कार्रवाई होगी।
चंद्रभूषण सिंह, जिलाधिकारी
फर्जीवाड़े में शामिल 21 में 13 कर रहे नौकरी
आजमगढ़। राज्यस्तर पर गठित बोर्ड की ओर से जनपद के 21 प्रशिुओं के प्रमाण-पत्र को फर्जी बताया था। इसमें से 13 प्रशिक्षु जिले में ही नौकरी कर रहे हैं। इसमें माधुरी सिंह, चंद्रशेखर सिंह, भरत लाल यादव, अजीत कुमार सिंह, रेखा सिंह, नंद किशोर यादव, शिव नरायण, राजेश कुमार, जय सिंह यादव, अखिलेश कुमार, राहु यादव, राम सिंह प्रसाद और सीमा यादव शामिल हैं।
इसके अलावा आठ प्रशिक्षुओं को पता नहीं चल रहा है कि वो कहां नौकरी कर रहे हैं। इसमें सत्यसेन सिंह, जयपाल सिंह यादव, हेमा साहू, वीर बहादुर सिंह, ब्रह्मशील यादव, सत्येंद्र कुमार सिंह, शशिभूषण उपाध्याय, सुनीता देवी शामिल हैं।
इन जिलों के प्रशिक्षु थे शामिल
आजमगढ़। राज्यस्तर पर गठित बोर्ड की ओर से 22 जनपदों के 72 प्रशिक्षुओं के विकलांग प्रमाण-पत्र को फर्जी बताया था। इसमें बदायूं, बागपत, मेरठ, बुलंदशहर, सहारनपुर, सीतापुर, इलाहाबाद, फतेहपुर, झांसी, जालौन, प्रतापगढ़, वाराणसी, चंदौली, मिर्जापुर, जौनपुर, गाजीपुर, आजमगढ़, सोमभद्र, भदोही, बलिया, मऊ और गोरखपुर जिले के प्रशिक्षु शामिल थे।
विज्ञापन
इसके बाद राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के निदेशक ने इनपर विधिक कार्रवाई का निर्देश दिया था जिसे अधिकारी दबाकर बैठ गए। मामले की जानकारी मिलने पर डीएम ने जांच बैठाते हुए कमेटी का गठन किया है।
विज्ञापन
मुलायम सिंह यादव की सरकार में बीएड डिग्री धारकों को छह माह के विशिष्ट बीटीसी कोर्स के बाद शिक्षक की नौकरी देने का नियम था। वर्ष 2007-08 में प्रदेश के डायटों से ये कोर्स कराए गए। कोर्स में प्रवेश लेने के लिए फर्जी विकलांग प्रमाण-पत्र का सहारा लिया और कोर्स करने के बाद नौकरी भी पा ली।
विज्ञापन
शिकायत के बाद प्रदेश सरकार ने राज्य स्तरीय विकलांग कल्याण बोर्ड की ओर से 22 जनपदों के विकलांग प्रमाण-पत्र लगाने वाले 231 प्रशिक्षणार्थियों का जुलाई 2010 में फिर से परीक्षण और भौतिक सत्यापन किया गया।
इसमें 72 प्रशिक्षुओं के प्रमाण-पत्र फर्जी मिले। वर्ष अक्तूबर 2010 में राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के तत्कालीन निदेशक अशोक गांगुली की ओर से आजमगढ़ सहित प्रदेश के 22 जनपदों को डायट प्रिंसिपल को एक सूची जारी की। सूची में शामिल फर्जी प्रशिक्षणार्थियों के ऊपर विधिक कार्रवाई करने के निर्देश दिए।
इसके बाद उक्त 21 प्रशिक्षु हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गए, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद डायट को मामले में कार्रवाई करनी थी, लेकिन विभाग मामले को दबा गया। इस बीच मामला जिलाधिकारी तक पहुंच गया।
उन्होंने मामला संज्ञान में आने के बाद जांच के लिए चार सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया है। इसमें डायट प्राचार्य, बीएसए, वित्त एवं लेखाधिकारी बेसिक और जिला अर्थ एवं संख्याधिकारी को शामिल किया गया है।
फर्जी विकलागंता सर्टिफिकेट के आधार पर प्रशिक्षण करने वाले मामले में कार्रवाई के आदेश शासन की ओर से मिले थे, लेकिन मामले में विभागीय अधिकारियों की ओर से कार्रवाई नहीं की गई। मामले की जांच के लिए कमेटी का गठन किया गया है। सभी दोषियों पर कार्रवाई होगी।
चंद्रभूषण सिंह, जिलाधिकारी
फर्जीवाड़े में शामिल 21 में 13 कर रहे नौकरी
आजमगढ़। राज्यस्तर पर गठित बोर्ड की ओर से जनपद के 21 प्रशिुओं के प्रमाण-पत्र को फर्जी बताया था। इसमें से 13 प्रशिक्षु जिले में ही नौकरी कर रहे हैं। इसमें माधुरी सिंह, चंद्रशेखर सिंह, भरत लाल यादव, अजीत कुमार सिंह, रेखा सिंह, नंद किशोर यादव, शिव नरायण, राजेश कुमार, जय सिंह यादव, अखिलेश कुमार, राहु यादव, राम सिंह प्रसाद और सीमा यादव शामिल हैं।
इसके अलावा आठ प्रशिक्षुओं को पता नहीं चल रहा है कि वो कहां नौकरी कर रहे हैं। इसमें सत्यसेन सिंह, जयपाल सिंह यादव, हेमा साहू, वीर बहादुर सिंह, ब्रह्मशील यादव, सत्येंद्र कुमार सिंह, शशिभूषण उपाध्याय, सुनीता देवी शामिल हैं।
इन जिलों के प्रशिक्षु थे शामिल
आजमगढ़। राज्यस्तर पर गठित बोर्ड की ओर से 22 जनपदों के 72 प्रशिक्षुओं के विकलांग प्रमाण-पत्र को फर्जी बताया था। इसमें बदायूं, बागपत, मेरठ, बुलंदशहर, सहारनपुर, सीतापुर, इलाहाबाद, फतेहपुर, झांसी, जालौन, प्रतापगढ़, वाराणसी, चंदौली, मिर्जापुर, जौनपुर, गाजीपुर, आजमगढ़, सोमभद्र, भदोही, बलिया, मऊ और गोरखपुर जिले के प्रशिक्षु शामिल थे।