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आवास की आस लिए ही दुनिया से विदा हो गई गरिमा देवी
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आजमगढ़ के निजामाबाद के शंभूपुर गांव निवासी गरिमा देवी पत्नी स्व. वंश बहादुर उपाध्याय अपने जर्जर आवास में रहती थीं। प्रधानमंत्री आवास के लिए वह ग्राम प्रधान से लेकर तहसील के अधिकारियों तक गुहार लगा-लगाकर थक चुकी थीं लेकिन किसी ने नहीं सुनी। लगातार कई दिनों तक हुई बारिश में 24 सितंबर को उनका जर्जर मकान धराशाई हो गया। नए मकान की आस लिए ही गरिमा इस दुनिया से विदा हो गई।
गरिमा देवी अपने पति के मर जाने के बाद चार लड़की और एक लड़के को लेकर अपने परिवार का जीविकोपार्जन बड़े ही मुश्किल से कर रही थीं। उनका पुत्र संतोष उपाध्याय आजमगढ़ में किसी दुकान पर नौकरी कर अपना परिवार चला रहा था। गांव में पुराना जर्जर मकान था जिसमें वह लोग रहते थे। प्रधानमंत्री आवास के लिए गरिमा प्रधान से आवास की मांग करते करते थक गई। जनप्रतिनिधियों को भी उन्होंने प्रार्थना पत्र देकर कई बार मांग की। तहसील के अधिकारियों के यहां भी खूब चक्कर काटे लेकिन कोई बात नहीं बनी।
उनके जर्जर मकान का कुछ हिस्सा एक साल पहले ही गिर गया था। इसकी सूचना उन्होंने लेखपाल ओर अधिकारियों को दी गई थी लेकिन मकान गिरने का मिलने वाला पैसा भी उन्हें नहीं मिला। आखिरकार 24 तारीख की रात को लगातार हो रही बारिश में इस गरीब का आशियाना पूरी तरह धराशाई हो गया जिसमें 75 वर्षीय गरिमा देवी दबकर गंभीर रूप से घायल हो गई। अस्पताल जाते जाते उनकी मौत हो गई। गरिमा देवी तो इस दुनिया से चली गईं लेकिन उनकी मौत प्रशासन की कार्यशैली पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर गई। आज कोई भी उनकी मौत पर कुछ बोलने को तैयार नहीं है। वहीं पुराने घर के गिरने के बाद उनका पूरा परिवार खुले आसमान के नीचे आ गया है।
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गरिमा देवी अपने पति के मर जाने के बाद चार लड़की और एक लड़के को लेकर अपने परिवार का जीविकोपार्जन बड़े ही मुश्किल से कर रही थीं। उनका पुत्र संतोष उपाध्याय आजमगढ़ में किसी दुकान पर नौकरी कर अपना परिवार चला रहा था। गांव में पुराना जर्जर मकान था जिसमें वह लोग रहते थे। प्रधानमंत्री आवास के लिए गरिमा प्रधान से आवास की मांग करते करते थक गई। जनप्रतिनिधियों को भी उन्होंने प्रार्थना पत्र देकर कई बार मांग की। तहसील के अधिकारियों के यहां भी खूब चक्कर काटे लेकिन कोई बात नहीं बनी।
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उनके जर्जर मकान का कुछ हिस्सा एक साल पहले ही गिर गया था। इसकी सूचना उन्होंने लेखपाल ओर अधिकारियों को दी गई थी लेकिन मकान गिरने का मिलने वाला पैसा भी उन्हें नहीं मिला। आखिरकार 24 तारीख की रात को लगातार हो रही बारिश में इस गरीब का आशियाना पूरी तरह धराशाई हो गया जिसमें 75 वर्षीय गरिमा देवी दबकर गंभीर रूप से घायल हो गई। अस्पताल जाते जाते उनकी मौत हो गई। गरिमा देवी तो इस दुनिया से चली गईं लेकिन उनकी मौत प्रशासन की कार्यशैली पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर गई। आज कोई भी उनकी मौत पर कुछ बोलने को तैयार नहीं है। वहीं पुराने घर के गिरने के बाद उनका पूरा परिवार खुले आसमान के नीचे आ गया है।
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