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आधुनिकता के दौर में खोया चहका और चौताल

Wed, 20 Mar 2019 08:54 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 20 Mar 2019 08:54 PM IST
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आधुनिकता के दौर में खोया चहका और चौताल
आजमगढ़। आधुनिकता के इस दौर में होली मनाने के तरीकों में भी काफी बदलाव है। पहले जहां लोग ढोलक की थाप पर फगुआ गीतों को गाते, सुनते और झूमते हुए देखे जाते थे। वहीं आज के युवा डीजे के फूहड़ गीतों पर थिरकते हुए देखने को मिलते हैं। त्योहार तो वहीं पुराना है लेकिन उसे मनाने का तरीका बदल गया है। यह कहना है भारत सरकार से राष्ट्रीय शिक्षा रत्न पुरस्कार प्राप्त गगहा निवासी डॉ. अभिषेक पांडेय का। अतीत को याद करते हुए डॉ. पांडेय ने कहा कि एक समय था जब बसंत ऋतु शुरू होते ही मतवालों की टोली ढ़ोलक, झाल और मजीरा लेकर गांव में किसी के दरवाजे पर बैठ जाती थी और वहां पर शुरू होता था। चहका और चौताल का दौर। लोग पूरे दिन खेती के कामों से निवृत्त होकर रात को एक स्थान पर जुटते थे। देर रात तक लोग फगुआ गीतों को आनंद उठाते थे। वहीं टोली के लोग लोगों की फरमाइश पर भी फगुआ गीतों को सुनाते थे। वहीं जिसके दरवाजे पर मतवालों की टोली बैठती थी वहां पर उनके गीतों को सुनने के लिए पूरे गांव के लोग जुटते थे। घर की महिलाएं उनके लिए तरह-तरह के व्यंजन परोसा करती थी। होली के दिन मतवालों की टोली निकलती थी और गांव के एक-एक घर के सामने जाकर फगुआ गीतों को गाती थी। घर की महिलाए अट्टालिकाओं से उनके ऊपर रंगों की बरसात करती थी और उन्हें खाने के लिए गुझिया, मालपुआ आदि स्वादिष्ट व्यंजन को परोसती थी। टोली के लोग अपने अपने हाथ में लेकर खाते हुए चेहरे पर मुस्कान लिए आगे बढ़ जाते थे लेकिन आज यह परंपरा लेकिन विलुप्त हो चुकी है। इस परंपरा में जो मिठास थी वह गायब हो चुकी है क्योंकि इसी बहाने सब लोग एक दूसरे के दरवाजे पर जाते थे। आज आधुनिक दौर में इस परंपरा का स्थान डीजे ने ले लिया है। जिस पर बजने वाले अश्लील गीतों की धुन पर युवा थिरकते हैं। उन्हें देश-दुनिया से कोई मतलब नहीं। पहले जहां लोगों द्वारा मस्ती के लिए ठंडई का प्रयोग होता था, वही आज उसका स्थान शराब ने ले लिया है। आज लगभग हर युवा इसका सेवन कर मस्ती में झूमता नजर आता है। पाश्चात्य संस्कृति में ऱ्ुबे युवा अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। जिसके कारण फगुआ गीत चहका और चौताल अब सुनने को नहीं मिलते हैं।
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