{"_id":"59c555974f1c1b0d6c8b4e20","slug":"71506104727-azamgarh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"फोरम ने किया वाद खारिज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
फोरम ने किया वाद खारिज
Updated Fri, 22 Sep 2017 11:55 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आजमगढ़। न्यायाधीश और उनकी पत्नी द्वारा स्टेट बैंक आफ इंडिया शाखा आजमगढ़ के विरुद्ध अलग-अलग दाखिल वाद पर हुई सुनवाई के बाद बुधवार को उपभोक्ता फोरम की अदालत ने खारिज कर दिया। मुकदमे में संचालित भविष्य निधि खाता में सही अंकन नहीं किए जाने का आरोप लगाया गया था।
मुकदमे के अनुसार वाराणसी में तैनात रहे अपर जिला जज दिनेश कुमार सिंह और उनकी पत्नी प्रेमकला सिंह ने स्टेट बैंक के पूर्व प्रबंधक सुनील सिंह समेत बैंक के चीफ जनरल मैनेजर और चेयरमैन के विरुद्ध जिला उपभोक्ता फोरम में 22मार्च वर्ष 2011 में अलग-अलग वाद दाखिल किया। मुकदमे में आरोप है कि वादीगण का खाता स्टेट बैंक आफ इंडिया शाखाआजमगढ़ में संचालित है। समय-समय पर वर्ष 2006-07-08 में क्रमश: दो लाख और दो लाख दस हजार रुपये की धनराशि अपने-अपने खातों में कराया। लेकिन उक्त धनराशि का खाते में अंकन नहीं किया गया। बैंक के इस कृत्य से क्षुब्ध होकर न्यायाधीश और उनकी पत्नी ने फोरम की अदालत में मैं ब्याज के अनुतोष पाने की मांग की। लगभग साढ़े छह वर्ष तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद फोरम की अदालत ने बैंक के अधिवक्ता जगदंबा प्रसाद पांडेय के तर्को और पत्रावली में प्राप्त साक्ष्यों के अवलोकन के बाद फोरम की अदालत ने पाया कि खाता में समय-समय से धनराशि ही नहीं जमा की गई है। जिसके चलते बैंक कर्मी द्वारा दुर्विनियोग करने का मामला फोरम की अदालत ने नहीं पाया। अदालत ने सही तथ्य न पाए जाने पर मुकदमा खारिज कर दिया।
विज्ञापन
मुकदमे के अनुसार वाराणसी में तैनात रहे अपर जिला जज दिनेश कुमार सिंह और उनकी पत्नी प्रेमकला सिंह ने स्टेट बैंक के पूर्व प्रबंधक सुनील सिंह समेत बैंक के चीफ जनरल मैनेजर और चेयरमैन के विरुद्ध जिला उपभोक्ता फोरम में 22मार्च वर्ष 2011 में अलग-अलग वाद दाखिल किया। मुकदमे में आरोप है कि वादीगण का खाता स्टेट बैंक आफ इंडिया शाखाआजमगढ़ में संचालित है। समय-समय पर वर्ष 2006-07-08 में क्रमश: दो लाख और दो लाख दस हजार रुपये की धनराशि अपने-अपने खातों में कराया। लेकिन उक्त धनराशि का खाते में अंकन नहीं किया गया। बैंक के इस कृत्य से क्षुब्ध होकर न्यायाधीश और उनकी पत्नी ने फोरम की अदालत में मैं ब्याज के अनुतोष पाने की मांग की। लगभग साढ़े छह वर्ष तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद फोरम की अदालत ने बैंक के अधिवक्ता जगदंबा प्रसाद पांडेय के तर्को और पत्रावली में प्राप्त साक्ष्यों के अवलोकन के बाद फोरम की अदालत ने पाया कि खाता में समय-समय से धनराशि ही नहीं जमा की गई है। जिसके चलते बैंक कर्मी द्वारा दुर्विनियोग करने का मामला फोरम की अदालत ने नहीं पाया। अदालत ने सही तथ्य न पाए जाने पर मुकदमा खारिज कर दिया।
विज्ञापन