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सीएचसी के जच्चा-बच्चा केंद्र में गंदगी का अंबार
Updated Tue, 08 May 2018 12:04 AM IST
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लाटघाट (आजमगढ़)। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हरैया के जच्चा-बच्चा केंद्र की स्थिति बद से बदतर हो गई है। चारों तरफ जहां गंदगी का अंबार लगा हुआ है तो वहीं जो बेड लगाये गये है वह भी खस्ताहाल हो चुके है। वर्तमान में स्थिति तो यह है कि यहां डिलेवरी के लिए आने वाली प्रसूताएं मजबूरी में ही ठहरती है। डिलेवरी के बाद वह सीधे घर चली जाना ही ज्यादा बेहतर समझती है।
सीएचसी पर प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में मरीजों का आना जाना होता है। इतना ही नहीं दो से तीन डिलेवरी प्रतिदिन जच्चा-बच्चा केंद्र पर होती है। जच्चा बच्चा केंद्र के बेडों की हालत तो इतनी दयनीय हो चुकी है कि जब प्रसूताएं यहां पहुंचती है तो गंदगी और बेड की दशा देख कर अन्यत्र डिलेवरी के लिए चली जाती है। जो रूकती भी है तो वे भी डिलेवरी होने के बाद घर लौटने की कवायद में जुट जाती है। अस्पताल पर आने वाले मरीजों का आरोप है इस अस्पताल पर सुविधाओं की जबर्दस्त कमी है। दवाएं जहां बाहर की लिख दी जाती है तो वहीं जांच के लिए भी बाहर प्राइवेट पैथॉलाजी पर भेज दिया जाता है। बेड पर कभी चादर नहीं बिछाया जाता और हमेशा ही मक्खियां भनभनाती रहती है। गुरुवार की सुबह यहां रुखसाना पत्नी मुर्तजा, सरोजनी पत्नी राम सिंह, बबीता पत्नी श्रवण्न और उर्मिला पत्नी जितेंद्र की डिलेवरी हुई। डिलेवरी के बाद इन महिलाओं को भोजन तो दूर सुबह का नाश्ता भी नहीं उपलब्ध कराया गया। जबकि डिलेवरी के लिए भर्ती मरीजों को दोनो वक्त के भोजन और नाश्ता उपलब्ध कराये जाने की व्यवस्था है। यहां भर्ती मरीजों को लगभग-लगभग सारी व्यवस्थाओं को बाहर से ही करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि चिकित्सा प्रभारी भी अक्सर अस्पताल से लापता रहते है तो वहीं मोबाइल पर फोन करने पर वे कॉल भी नहीं उठाते है।
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सीएचसी पर प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में मरीजों का आना जाना होता है। इतना ही नहीं दो से तीन डिलेवरी प्रतिदिन जच्चा-बच्चा केंद्र पर होती है। जच्चा बच्चा केंद्र के बेडों की हालत तो इतनी दयनीय हो चुकी है कि जब प्रसूताएं यहां पहुंचती है तो गंदगी और बेड की दशा देख कर अन्यत्र डिलेवरी के लिए चली जाती है। जो रूकती भी है तो वे भी डिलेवरी होने के बाद घर लौटने की कवायद में जुट जाती है। अस्पताल पर आने वाले मरीजों का आरोप है इस अस्पताल पर सुविधाओं की जबर्दस्त कमी है। दवाएं जहां बाहर की लिख दी जाती है तो वहीं जांच के लिए भी बाहर प्राइवेट पैथॉलाजी पर भेज दिया जाता है। बेड पर कभी चादर नहीं बिछाया जाता और हमेशा ही मक्खियां भनभनाती रहती है। गुरुवार की सुबह यहां रुखसाना पत्नी मुर्तजा, सरोजनी पत्नी राम सिंह, बबीता पत्नी श्रवण्न और उर्मिला पत्नी जितेंद्र की डिलेवरी हुई। डिलेवरी के बाद इन महिलाओं को भोजन तो दूर सुबह का नाश्ता भी नहीं उपलब्ध कराया गया। जबकि डिलेवरी के लिए भर्ती मरीजों को दोनो वक्त के भोजन और नाश्ता उपलब्ध कराये जाने की व्यवस्था है। यहां भर्ती मरीजों को लगभग-लगभग सारी व्यवस्थाओं को बाहर से ही करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि चिकित्सा प्रभारी भी अक्सर अस्पताल से लापता रहते है तो वहीं मोबाइल पर फोन करने पर वे कॉल भी नहीं उठाते है।
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