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घायल गायों का रखवाला जफरुद्दीन
अमर उजाला, औरैया
Updated Sat, 01 Jul 2017 12:10 AM IST
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Jaffruddin
- फोटो : amar ujala
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देश में एक तरफ कुछ लोग गोवंश के प्रति मुस्लिमों को शक की निगाह से देख रहे हैं वहीं दूसरी तरफ जफरुद्दीन घायल गायों के रखवाले बने हैं। आवारा घूमने वाली घायल गायों की सेवा के प्रति उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिए है। पशु अस्पतालों में दवाएं मांग कर लाते हैं। जो दवाएं वहां नहीं मिलतीं, उसके लिए अपने जान-पहचान वालों से सहयोग लेते हैं। इतना ही नहीं वे किसानों से खेत किनारे लगे कटीले तार हटाने की अपील भी करते हैं।
औरैया के अछल्दा ब्लाक के हरचंदपुर निवासी जफरुद्दीन गरीब हैं। वे दिहाड़ी मजदूर हैं। परिवार में बूढ़े पिता व दो छोटे भाई के अलावा पत्नी और दो बच्चे हैं। खेती बाड़ी है नहीं, इसलिए दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। सुबह काम पर जाने से पहले और शाम को लौटने पर वे गायों की सेवा में जुट जाते हैं। जफरुद्दीन बताते हैं कि करीब तीन साल पहले खेत की बाड़ में लगे कटीले तार से एक गाय घायल हो गई थी। जब वह उसके पास गए तो उसने हाथ पर जीभ फेरना शुरू कर दिया।
फिर जफरुद्दीन उसे घर ले आए और उसके चोट पर घरेलू दवाएं लगाईं। यही से उनका मन गो सेवा में रम गया। उस गाय को उन्होंने अपने घर पर ही रख लिया। धीरे-धीरे गाय ठीक हो गई और कुछ समय बाद दूध भी देने लगी। इस तरह उनके परिवार के लिए दूध का इंतजाम हो गया। इसके बाद उन्हें जहां भी कटीले तार से घायल गाय दिखती है, उसे अपने घर ले आते हैं। इलाज के दौरान गाय को पकड़ने के लिए पड़ोसियों की मदद लेते हैं। अब तक करीब 50 से ज्यादा गायों की मरहम पट्टी करके इलाज कर चुके हैं। इन दिनों वे अपने घर पर इलाज के बाद ठीक हुई तीन गायों को रखे हुए हैं। बाकी को छोड़ दिया। चारे का इंतजाम आसपास के गांवों से मांग कर करते हैं।
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औरैया के अछल्दा ब्लाक के हरचंदपुर निवासी जफरुद्दीन गरीब हैं। वे दिहाड़ी मजदूर हैं। परिवार में बूढ़े पिता व दो छोटे भाई के अलावा पत्नी और दो बच्चे हैं। खेती बाड़ी है नहीं, इसलिए दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। सुबह काम पर जाने से पहले और शाम को लौटने पर वे गायों की सेवा में जुट जाते हैं। जफरुद्दीन बताते हैं कि करीब तीन साल पहले खेत की बाड़ में लगे कटीले तार से एक गाय घायल हो गई थी। जब वह उसके पास गए तो उसने हाथ पर जीभ फेरना शुरू कर दिया।
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फिर जफरुद्दीन उसे घर ले आए और उसके चोट पर घरेलू दवाएं लगाईं। यही से उनका मन गो सेवा में रम गया। उस गाय को उन्होंने अपने घर पर ही रख लिया। धीरे-धीरे गाय ठीक हो गई और कुछ समय बाद दूध भी देने लगी। इस तरह उनके परिवार के लिए दूध का इंतजाम हो गया। इसके बाद उन्हें जहां भी कटीले तार से घायल गाय दिखती है, उसे अपने घर ले आते हैं। इलाज के दौरान गाय को पकड़ने के लिए पड़ोसियों की मदद लेते हैं। अब तक करीब 50 से ज्यादा गायों की मरहम पट्टी करके इलाज कर चुके हैं। इन दिनों वे अपने घर पर इलाज के बाद ठीक हुई तीन गायों को रखे हुए हैं। बाकी को छोड़ दिया। चारे का इंतजाम आसपास के गांवों से मांग कर करते हैं।
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