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फूलों की खेती ने संभाली घर की तकदीर

Mon, 10 Aug 2015 12:33 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो औरैया
अमर उजाला ब्यूरो औरैया Updated Mon, 10 Aug 2015 12:33 AM IST
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Floriculture took over the destiny of the hous

यूं तो चना, अरहर, गेहूं, बाजरा आदि की खेती किसानों की जीविका के मुख्य साधन माने जाते हैं, लेकिन फूलों की खेती भी इनसे कहीं कम लाभकारी नहीं होती। इसकी जीती जागती मिसाल है, कानपुर रोड पर ग्राम जैतापुर में फूलों की खेती को जीविका का मुख्य व्यवसाय बनाने वाले लल्लन बाबू।

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लल्लन को अन्य जींसों की अपेक्षा फूलों की खेती ज्यादा भायी है। अमर उजाला टीम ने रविवार को लल्लन बाबू से मुलाकात कर फूलों की खेती के प्रति उनकी अटूट लगन और मेहनत की हकीकत जानी।
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लल्लन बाबू बताते हैं कि वर्ष1995 में माली हालत खराब पर थोड़ी ही पूंजी बची थी। किसी भी व्यवसाय को शुरू करने को पैसा होना बहुत ही जरूरी होता है। ऐसे में बड़ा काम करने की हैसियत न होने पर थोड़ी ही लागत से एक एकड़ जमीन पर फूलों की खेती शुरू कर दी।
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सिंचाई को पहले इधर-उधर से मदद लेकर काम चलाते रहे। धीरे-धीरे फूलों से कमाई करने के बाद फिर एक ट्यूबबैल लगा लिया। जमीन भी खरीद ली। आज 20 वर्षों की मेहनत ने रंग दिखाया और एक एकड़ से कारोबार बढ़ते-बढ़ते तीन एकड़ तक पहुंच गया।

 
लल्लन कहते हैं कि फूलों में गेंदा व गुलदावरी की खेती सबसे ज्यादा लाभकारी साबित हुई है। फूलों की खरीद को उनके पास शहर के अलावा कानपुर, लखनऊ के थोक व्यापारी आते हैं। वर्तमान में 70 रुपये किलो गेंदा, 150 से 300 रुपये किलो गुलाब बिक जाता है।

हालांकि उनके बढ़ते कारोबार में सरकारी योजना का लाभ मिला है। उद्यान विभाग से बीज से लेकर दवाइयां तक उपलब्ध कराई गई है। बताया कि अभी फूलों के बीज की बुवाई का समय चल रहा है। इसके लिए दो माह पूर्व पौध तैयार करने को गेंदा, गुलदावरी, गुलाब का बीज डाला था, जो अब तैयार हो गया है।



अभी खेतों की गुड़ाई कराकर तैयार कराया है। एक-दो दिन में उनकी रोपाई शुरू कर दी जाएगी। वहीं वाटर लेबल कम होने से उनके सामने सिंचाई की समस्या खड़ी है। आसपास सरकारी ट्यूबबैल न होने से सिंचाई समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। अब बस बरसात का इंतजार है।

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