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औरैयाः आजादी से पहले ही अंग्रेजों से मुक्त हो गई थी बेला तहसील

Sat, 13 Aug 2022 01:15 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 13 Aug 2022 01:15 AM IST
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Bela Tehsil was freed from British even before independence
थाने की पुरानी इमारत, जहां पहले थी तहसील। संवाद - फोटो : AURAIYA
बेला। देश को आजादी भले ही 1947 में मिली हो, पर जनपद की बेला तहसील को यहां के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना से 1858 में ही युद्ध कर आजाद करा लिया था। युद्ध में अवध के सरदार फिरोजशाह रोहिला ने क्रांतिकारियों का सहयोग किया था। बेला को मुक्त कराने के बाद सहार कस्बे और फफूंद तहसील को भी क्रांतिकारियों ने मुक्त कराया था। युद्ध में क्रांतिकारियों ने अपनी कुर्बानी देने से पहले अंग्रेजी सेना के कई सैनिकों को मार गिराया था। इसका जिक्र बैटल ऑफ हरचंदपुर में दर्ज है।
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बेला के धर्मदत्त चतुर्वेदी बताते हैं कि उनके बुजुर्ग बताते थे कि आठ दिसंबर 1858 को जब अवध के सरदार फिरोजशाह रोहिला गंगा पार कर रसूलाबाद के रास्ते जनपद इटावा की सीमा पर पहुंचे तो यहां पर क्रांतिकारियों ने उनका साथ देने का वादा किया। इसके बाद क्रांतिकारियों व फिरोजशाह रोहिला के बीच गुप्त मंत्रणा हुई। इसमें अंग्रेजों को क्षेत्र से भगाने की रणनीति बनी। इसके बाद रोहिला की सेना और क्रांतिकारियों ने मिलकर अंग्रेजों की सेना पर हमला बोल दिया। इस युद्ध में क्रांतिकारियों ने बेला तहसील को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करा लिया। बता दें कि इससे पहले भी एक बार क्रांतिकारी 25 जून 1857 को आजाद करा चुके थे, लेकिन बाद में अंग्रेजों ने अपनी सेना भेजकर इस पर कब्जा कर लिया था।
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महामाई मंदिर के पास अंग्रेजों की हुई थी हार
बेला, सहार और फफूंद के मुक्त होने के बाद अंग्रेजों ने बदला लेने की सोची। क्रांतिकारियों के दमन के लिए इटावा के तत्कालीन कलेक्टर एओ ह्यूम ने लेफ्टिनेंट डायल के नेतृत्व में सेना को फफूंद और बेला भेजा। यह सैन्य दल अजीतमल पहुंचा तो क्रांतिकारी गंधर्व सिंह और प्रीतम सिंह ने उसे रोकने का प्रयास किया। तब यहां पर काफी संख्या में क्रांतिकारी शहीद हुए। फिर अंग्रेजी सेना मुरादगंज और ऊंचा होते हुए फफूंद के पास महामाई मंदिर के पास पहुंची। इसकी जानकारी फिरोजशाह रोहिला और क्रांतिकारियों को हो गई और उन्होंने अंग्रेजों की सेना पर हमला बोल दिया। दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। जिसमें अंग्रेजी सेना के लेफ्टिनेंट डायल समेत बड़ी संख्या में अंग्रेजी सिपाही मारे गए और अंग्रेजी सेना भाग खड़ी हुई। इस युद्ध में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की तोपों सहित काफी सैन्य सामान पर कब्जा कर लिया था। यह युद्ध इतिहास में बैटल आफ हरचंदपुर के नाम से दर्ज हुआ।
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कन्नौज के राजा जयचंद की रियासत थी बेला
वर्ष 1857 तक यहां बड़े महाजनों की गद्दी लगती थी। कानपुर, झांसी, आगरा, लखनऊ से लोग अपनी हुंडी भुनाने बेला आते थे। हुंडी साहूकारों व महाजनों का एक पत्र (चेक की तरह) हुआ करता था। इसके अलावा राजा जयचंद की हाथियों की सेना बेला में रुका करती थी। इसके बाद अंग्रेजों के समय में बेला में बड़े महाजन व जौहरी की गद्दी लगने लगी। जहां आसपास के जिलों के अलावा मंडलों तक के लोग अपनी हुंडी का भुगतान कराने बेला आया करते थे। 1857 की क्रांति के बाद बेला में अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया और कई साहूकार व महाजन उनके अधीन हो गए।
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