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Amroha News: गुरु के ज्ञान की रोशनी से चमक उठा शिष्यों का जीवन
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अमरोहा। शिक्षक दिवस पर गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते को याद किया गया। भारतीय समाज में गुरु का स्थान माता-पिता के समान सर्वोच्च माना गया है। माता-पिता के बाद शिक्षक ही वह व्यक्ति होता है, जो विद्यार्थियों को सही राह दिखाकर उनके जीवन को सकारात्मक दिशा देने का काम करता है। शिक्षक केवल किताबी ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि अच्छे संस्कार, अनुशासन और जीवन के मूल्यों की सीख भी देता है। सफलता की राह पर आगे बढ़ने के लिए गुरु का मार्गदर्शन बेहद महत्वपूर्ण होता है। गुरु के सानिध्य में रहकर विद्यार्थी ज्ञान अर्जित करता है और अपने व्यक्तित्व का विकास करता है। गुरु ही शिष्यों को अहंकार और अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है। इसी कारण गुरु को जीवन का सच्चा मार्गदर्शक और शिक्षक को राष्ट्र निर्माण की मजबूत नींव माना जाता है।
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शादी के लिए रखे रुपयों से बनाया गुरुकुल, अब 1100 बेटियों को दे रहीं शिक्षा की उड़ान
अमरोहा। रजबपुर क्षेत्र के चोटीपुरा गांव की डॉ. सुमेधा ने 13 वर्ष की उम्र में महिलाओं को विदुषी और वीरांगना बनाने का संकल्प लिया था। इसी लक्ष्य के लिए उन्होंने आजीवन विवाह न करने का निर्णय लिया और शादी में खर्च होने वाली रकम से वर्ष 1988 में गुरुकुल विद्यालय की नींव रखी। किसान हरगोविंद सिंह की सबसे छोटी बेटी सुमेधा ने जीवन बेटियों की शिक्षा और सशक्तीकरण को समर्पित कर दिया।
कक्षा तीन के बाद उन्होंने दिल्ली-हरियाणा सीमा स्थित गुरुकुल में शिक्षा ली। इंटर के बाद गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार से संस्कृत में एमए और पीएचडी की। छह बेटियों से शुरू गुरुकुल आज देश के 16 प्रांतों और नेपाल की करीब 1100 बेटियों को शिक्षा और संस्कार दे रहा है।
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डॉ. सुमेधा का मानना है कि माता-पिता के बाद आचार्य ही बच्चे को सही अर्थों में मनुष्य बनाता है। गुरुकुल में जाति-पंथ के भेद से ऊपर उठकर बेटियों को शिक्षा के साथ लक्ष्य दिया जाता है। यहां की बेटियों ने तीरंदाजी और योग में 500 से अधिक पदक जीते हैं। 50 से अधिक बेटियां सरकारी नौकरी हासिल कर चुकी हैं, जबकि कई ने पीएचडी, नेट और जेआरएफ जैसी उपलब्धियां हासिल की हैं। संवाद
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माता-पिता के बाद गुरु ही अहम
बच्चे के सबसे पहले गुरु उसके माता-पिता होते हैं, जो उसे संस्कार और जीवन की पहली सीख देते हैं। इसके बाद शिक्षक बच्चे को सही दिशा देकर उसके भविष्य की नींव मजबूत करता है। जीवन में आगे बढ़ने और कॅरियर बनाने में गुरु का मार्गदर्शन बेहद महत्वपूर्ण होता है। शिक्षक केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में सही राह दिखाने वाला मार्गदर्शक होता है। उन्होंने कहा कि वह स्वयं आईपीएस अधिकारी हैं, लेकिन आज भी उनके वरिष्ठ अधिकारी डीआईजी, एडीजी और डीजीपी उनके लिए शिक्षक की भूमिका निभाते हैं। उनके निर्देश और अनुभव से उन्हें लगातार कुछ नया सीखने को मिलता है। शिक्षक जीवनभर सीखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
- लखन सिंह यादव, पुलिस अधीक्षक
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गुरु बने मिसाल, कोरोना में घर-घर जाकर पढ़ाया
हसनपुर। शिक्षक दिवस पर विकास क्षेत्र गंगेश्वरी के प्राथमिक विद्यालय गुलामपुर के प्रधानाध्यापक रामवीर सिंह शिक्षा के प्रति समर्पण और नवाचार की मिसाल बने हुए हैं। वर्ष 2011 से बेसिक शिक्षा विभाग में सेवाएं दे रहे रामवीर सिंह ने ग्रामीण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ने के प्रयास किए हैं।
कोरोना काल में विद्यालय बंद रहने पर उन्होंने घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाया और अभिभावकों से संपर्क कर पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया। विद्यालय में बेहतर माहौल के लिए निजी संसाधनों से फर्नीचर उपलब्ध कराया। आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से जरूरत के अनुसार मदद भी दिलाई।
उन्होंने अभिभावकों को शिक्षा के महत्व और सामाजिक कुरीतियों के प्रति जागरूक किया। बालिकाओं की शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। रामवीर सिंह का मानना है कि शिक्षक का दायित्व पाठ्यक्रम पूरा करने के साथ बच्चों में संस्कार, आत्मविश्वास और सामाजिक जागरूकता विकसित करना भी है। संवाद
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शादी के लिए रखे रुपयों से बनाया गुरुकुल, अब 1100 बेटियों को दे रहीं शिक्षा की उड़ान
अमरोहा। रजबपुर क्षेत्र के चोटीपुरा गांव की डॉ. सुमेधा ने 13 वर्ष की उम्र में महिलाओं को विदुषी और वीरांगना बनाने का संकल्प लिया था। इसी लक्ष्य के लिए उन्होंने आजीवन विवाह न करने का निर्णय लिया और शादी में खर्च होने वाली रकम से वर्ष 1988 में गुरुकुल विद्यालय की नींव रखी। किसान हरगोविंद सिंह की सबसे छोटी बेटी सुमेधा ने जीवन बेटियों की शिक्षा और सशक्तीकरण को समर्पित कर दिया।
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कक्षा तीन के बाद उन्होंने दिल्ली-हरियाणा सीमा स्थित गुरुकुल में शिक्षा ली। इंटर के बाद गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार से संस्कृत में एमए और पीएचडी की। छह बेटियों से शुरू गुरुकुल आज देश के 16 प्रांतों और नेपाल की करीब 1100 बेटियों को शिक्षा और संस्कार दे रहा है।
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डॉ. सुमेधा का मानना है कि माता-पिता के बाद आचार्य ही बच्चे को सही अर्थों में मनुष्य बनाता है। गुरुकुल में जाति-पंथ के भेद से ऊपर उठकर बेटियों को शिक्षा के साथ लक्ष्य दिया जाता है। यहां की बेटियों ने तीरंदाजी और योग में 500 से अधिक पदक जीते हैं। 50 से अधिक बेटियां सरकारी नौकरी हासिल कर चुकी हैं, जबकि कई ने पीएचडी, नेट और जेआरएफ जैसी उपलब्धियां हासिल की हैं। संवाद
माता-पिता के बाद गुरु ही अहम
बच्चे के सबसे पहले गुरु उसके माता-पिता होते हैं, जो उसे संस्कार और जीवन की पहली सीख देते हैं। इसके बाद शिक्षक बच्चे को सही दिशा देकर उसके भविष्य की नींव मजबूत करता है। जीवन में आगे बढ़ने और कॅरियर बनाने में गुरु का मार्गदर्शन बेहद महत्वपूर्ण होता है। शिक्षक केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में सही राह दिखाने वाला मार्गदर्शक होता है। उन्होंने कहा कि वह स्वयं आईपीएस अधिकारी हैं, लेकिन आज भी उनके वरिष्ठ अधिकारी डीआईजी, एडीजी और डीजीपी उनके लिए शिक्षक की भूमिका निभाते हैं। उनके निर्देश और अनुभव से उन्हें लगातार कुछ नया सीखने को मिलता है। शिक्षक जीवनभर सीखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
- लखन सिंह यादव, पुलिस अधीक्षक
गुरु बने मिसाल, कोरोना में घर-घर जाकर पढ़ाया
हसनपुर। शिक्षक दिवस पर विकास क्षेत्र गंगेश्वरी के प्राथमिक विद्यालय गुलामपुर के प्रधानाध्यापक रामवीर सिंह शिक्षा के प्रति समर्पण और नवाचार की मिसाल बने हुए हैं। वर्ष 2011 से बेसिक शिक्षा विभाग में सेवाएं दे रहे रामवीर सिंह ने ग्रामीण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ने के प्रयास किए हैं।
कोरोना काल में विद्यालय बंद रहने पर उन्होंने घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाया और अभिभावकों से संपर्क कर पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया। विद्यालय में बेहतर माहौल के लिए निजी संसाधनों से फर्नीचर उपलब्ध कराया। आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से जरूरत के अनुसार मदद भी दिलाई।
उन्होंने अभिभावकों को शिक्षा के महत्व और सामाजिक कुरीतियों के प्रति जागरूक किया। बालिकाओं की शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। रामवीर सिंह का मानना है कि शिक्षक का दायित्व पाठ्यक्रम पूरा करने के साथ बच्चों में संस्कार, आत्मविश्वास और सामाजिक जागरूकता विकसित करना भी है। संवाद