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Amroha News: बारहसिंघा को मिलेगा संरक्षण, क्षेत्र के लोगों को हरा-भरा वन
Tue, 29 Apr 2025 02:07 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
Updated Tue, 29 Apr 2025 02:07 AM IST
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गजरौला (अमरोहा)।
गंगा खादर के सूने इलाके में जल्द ही हिरन की चौकड़ी और बारहसिंघा की अटखेलियां देखी जा सकेंगी। यह संभव हो सकेगा हस्तिनापुर वन्य जीव विहार के विस्तार और विकास से। वन विभाग ने बारहसिंघा अभयारण्य की तस्वीर बदलने के लिए कवायद शुरू की है।
इससे वन्य जीवों को सुरक्षा और अनुकूल वातावरण मिलेगा तो वन विभाग से छूट मिलने के बाद क्षेत्र के लोग जंगल सफारी जैसा आनंद भी ले सकेंगे। शहरीकरण से भागदौड़ और शोर में फंसे इंसान को अब मन की तसल्ली के लिए वन और उपवन की तलाश रहती है। इस तरह के वन और उपवन तमाम जीव-जंतुओं के लिए जीवन भी हैं। कटते पेड़-घटते वन का ही नतीजा है कि तेंदुए से लेकर हिरन, लोमड़ी तक तमाम जानवर आबादी का रुख कर लेते हैं। कहीं वह इंसान के जीवन पर भारी पड़ते हैं तो कहीं गलत इंसानी फितरत उनके जीवन को लील जाती है। सब कुछ ठीक चला तो गंगा के खादर में जंतुओं को मजबूत आधार मिल सकेगा।
वन विभाग के एसडीओ विमल कुमार भारद्वाज ने बताया कि गंगा के खादर का इलाका पहले हस्तिनापुर वन्य जीव विहार के नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम बदलकर राज्य वन्य जीव बारहसिंघा अभयारण्य कर दिया गया। पहले मंडी धनौरा व हसनपुर वन क्षेत्र के 125 गांव हस्तिनापुर वन्य जीव विहार में शामिल थे। अब अमरोहा जिले के 58 गांव ही बारहसिंघा अभयारण्य में शामिल हैं।
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अमरोहा के अलावा बिजनौर, मेरठ, हापुड़, मुजफ्फरनगर की सीमा तक फैलाव वाले क्षेत्र में इस तरह की घास और कुदरती झाड़ियां लगाई जाएंगी, जो बारहसिंघा को पसंद हैं। साथ ही जिनकी ओट में छिपकर वह सुरक्षित समझता है। उन्होंने बताया कि फटेरा (हाथीपांव घास), बींड़ और मूंज इस तरह की घास व झाड़ी की श्रेणी में आती हैं। जगह-जगह तालाब भी तैयार करेंगे। अभी नो डिस्टर्बेंस जोन बनाकर इस इलाके को मानवीय दखल से दूर रखेंगे, ताकि बारहसिंघा और इस प्रजाति के अन्य जंतुओं की संख्या बढ़ सके। भविष्य में इसे लोगों के घूमने-फिरने के लिए भी खोला जा सकता है।
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गंगा खादर के सूने इलाके में जल्द ही हिरन की चौकड़ी और बारहसिंघा की अटखेलियां देखी जा सकेंगी। यह संभव हो सकेगा हस्तिनापुर वन्य जीव विहार के विस्तार और विकास से। वन विभाग ने बारहसिंघा अभयारण्य की तस्वीर बदलने के लिए कवायद शुरू की है।
इससे वन्य जीवों को सुरक्षा और अनुकूल वातावरण मिलेगा तो वन विभाग से छूट मिलने के बाद क्षेत्र के लोग जंगल सफारी जैसा आनंद भी ले सकेंगे। शहरीकरण से भागदौड़ और शोर में फंसे इंसान को अब मन की तसल्ली के लिए वन और उपवन की तलाश रहती है। इस तरह के वन और उपवन तमाम जीव-जंतुओं के लिए जीवन भी हैं। कटते पेड़-घटते वन का ही नतीजा है कि तेंदुए से लेकर हिरन, लोमड़ी तक तमाम जानवर आबादी का रुख कर लेते हैं। कहीं वह इंसान के जीवन पर भारी पड़ते हैं तो कहीं गलत इंसानी फितरत उनके जीवन को लील जाती है। सब कुछ ठीक चला तो गंगा के खादर में जंतुओं को मजबूत आधार मिल सकेगा।
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वन विभाग के एसडीओ विमल कुमार भारद्वाज ने बताया कि गंगा के खादर का इलाका पहले हस्तिनापुर वन्य जीव विहार के नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम बदलकर राज्य वन्य जीव बारहसिंघा अभयारण्य कर दिया गया। पहले मंडी धनौरा व हसनपुर वन क्षेत्र के 125 गांव हस्तिनापुर वन्य जीव विहार में शामिल थे। अब अमरोहा जिले के 58 गांव ही बारहसिंघा अभयारण्य में शामिल हैं।
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अमरोहा के अलावा बिजनौर, मेरठ, हापुड़, मुजफ्फरनगर की सीमा तक फैलाव वाले क्षेत्र में इस तरह की घास और कुदरती झाड़ियां लगाई जाएंगी, जो बारहसिंघा को पसंद हैं। साथ ही जिनकी ओट में छिपकर वह सुरक्षित समझता है। उन्होंने बताया कि फटेरा (हाथीपांव घास), बींड़ और मूंज इस तरह की घास व झाड़ी की श्रेणी में आती हैं। जगह-जगह तालाब भी तैयार करेंगे। अभी नो डिस्टर्बेंस जोन बनाकर इस इलाके को मानवीय दखल से दूर रखेंगे, ताकि बारहसिंघा और इस प्रजाति के अन्य जंतुओं की संख्या बढ़ सके। भविष्य में इसे लोगों के घूमने-फिरने के लिए भी खोला जा सकता है।