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UP: ड्यूटी, अवकाश और बिल पास कराने तक के लिए ली जाती है रिश्वत, निलंबित सिपाही ने लगाए गंभीर आरोप
Mon, 25 May 2026 03:48 PM IST
Ishwar Ashish Bhartiya
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: Ishwar Ashish Bhartiya
Updated Mon, 25 May 2026 03:48 PM IST
सार
निलंबित सिपाही ने पुलिस विभाग के शीर्ष अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। सिपाही ने कहा कि स्वीकृत 60 दिन का अवकाश लेने और बिल पास करवाने तक के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है और ये पैसा शीर्ष अफसरों तक जाता है।
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निलंबित सिपाही सुनील शुक्ल।
- फोटो : amar ujala
विस्तार
लिखित शिकायतों पर बार-बार अनसुनी और व्याप्त भ्रष्टाचार पर निलंबित सिपाही सुनील शुक्ल ने खुलकर विभाग के कुछ शीर्ष अफसरों व बाबुओं पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने ड्यूटी, अवकाश और बिल पास कराने तक में रिश्वतखोरी का दावा किया है। साथ ही मुख्यमंत्री से न्याय की उम्मीद जताते हुए कहा कि जरूरत पड़ी तो न्यायालय की शरण भी लेंगे।
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गौरीगंज के रामसेवक का पुरवा, मेदनमवई निवासी और लखनऊ कमिश्नरेट पुलिस लाइंस में तैनात सिपाही सुनील शुक्ल को विभाग ने निलंबित कर दिया है। सोमवार को उनके घर पर संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने उनसे बात की। सुनील शुक्ल ने विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कहा कि पुलिस लाइंस में गणना डी में गारद में तैनाती के नाम पर हर महीने दो हजार रुपये देने पड़ते हैं। वहीं, स्वीकृत 60 दिन का अवकाश लेने में पुलिस कर्मियों के 60 करम हो जाते हैं। आरोप लगाया कि चिकित्सा प्रतिपूर्ति और टीए-डीए पास कराने के लिए भी 15 से 20 प्रतिशत तक रिश्वत देनी पड़ती है।
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उन्होंने कहा कि बाबुओं के माध्यम से शीर्ष अधिकारियों तक घूस पहुंचाई जाती है। कहा कि जब विभाग के अंदर ही भ्रष्टाचार फैला होगा तो उसका असर जनता पर भी पड़ेगा। बताया कि रायबरेली में पत्नी को आवंटित सरकारी आवास जर्जर है। कभी भी हादसा हो सकता है, इसकी शिकायत करीब 10 बार पुलिस लाइंस के आरआई और एसपी से की गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। अंबेडकरनगर में भी विभागीय अनियमितताओं की लिखित शिकायत की गई।
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इसके अलावा ग्रीवांस सेल में भी शिकायत भेजकर उच्च अधिकारियों तक बात पहुंचाने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। कहा कि जब कहीं सुनवाई नहीं हुई तो उन्हें वीडियो के जरिए अपनी बात उठानी पड़ी। उन्होंने माना कि मुख्यमंत्री तक सीधे शिकायत न पहुंचा पाना उनकी गलती रही, जिसका कारण अफसरों का डर और विभागीय अनुशासन था।
उन्होंने अधिकारियों की महंगी गाड़ियों, फर्नीचर और संपत्तियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि सिर्फ वेतन और ईमानदारी से यह सब संभव नहीं है। उनका आरोप है कि विजिलेंस की कार्रवाई केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित रहती है, जबकि बड़े अधिकारियों की जांच नहीं होती। जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि विभागीय अधिकारियों से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं है। कहा कि आईपीएस अधिकारियों के सामने विभाग के खिलाफ कोई सिपाही या दीवान खुलकर बयान नहीं दे सकता। अगर मजिस्ट्रेट या अन्य विभागीय अधिकारियों की निगरानी में जांच हो तो सच्चाई सामने आ सकती है।
कहा कि सत्य बोलने पर उनके खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई की जा रही है। हालांकि, विभाग में 85 फीसदी कर्मचारी और अधिकारी ईमानदार हैं, लेकिन उनकी आवाज नहीं सुनी जाती। उन्होंने भरोसा जताया कि अगर उनकी बात मुख्यमंत्री तक पहुंचती है तो उन्हें न्याय जरूर मिलेगा और व्यवस्था में सुधार होगा। उन्होंने कहा कि सत्य की लड़ाई अंतिम सांस तक जारी रहेगी और जरूरत पड़ने पर न्यायालय की शरण भी लेंगे।
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