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रेल की पटरियां उखाड़ गोरों की उड़ाई थी नींद
अमर उजाला ब्यूरो/ अंबेडकरनगर
Updated Wed, 12 Aug 2015 10:43 PM IST
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से प्रेरित होकर कालेदीन खेती किसानी छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। उन्होंने अन्य देशभक्तों के साथ रेल पटरियां उखाड़कर अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ा दी थी। कई महीने जेल में भी रहे मगर देश आजाद होने तक अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनका संघर्ष जारी रहा।
जलालपुर तहसील क्षेत्र के पचरुखवा गांव में जन्मे कालेदीन वर्मा शुरुआत में खेती किसानी करके परिवार का हाथ बंटाते थे। जब वे युवावस्था में पहुंचे, तो उस समय आजादी की लड़ाई चरम पर थी। एक तरफ जहां सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोल रखा था, तो वहीं दूसरी तरफ महात्मा गांधी ने अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजों को बेचैन कर दिया था।
अंबेडकरनगर के डॉ. गणेश कृष्ण जेतली, राजबली व चितबहाल सिंह जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के संपर्क में आने के बाद कालेदीन खेती किसानी छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। डॉ. गणेश कृष्ण जेतली, लल्लन व राजबली के नेतृत्व में पचरुखवा बाग में आयोजित बैठक में कालेदीन वर्मा ने भी प्रमुख भूमिका निभाई।
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तीन दिन तक चली इस बैठक में तय किया गया कि जाफरगंज रेलवे स्टेशन पर न सिर्फ रेल पटरियों को उखाड़ दिया जाए, वरन् तार भी काट दिया जाएं। तय रणनीति के अनुसार रेल पटरियों को उखाड़कर तार आदि काट दिए गए। इससे अंग्रेजों की नींद उड़ गई थी। कई दिन तक ट्रेन संचालन ठप रहा था।
वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर कालेदीन कई साथियों के साथ फैजाबाद जेल गए। छह महीने जेल में रहने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार आजादी की लड़ाई में भाग लेते रहे। वर्ष 1991 में उन्होंने आजाद भारत में अंतिम सांस ली।
सेनानियों की हो रही उपेक्षा
कालेदीन वर्मा के पुत्र मारकंडेय वर्मा बताते हैं कि जलालपुर तहसील क्षेत्र के सेनानियों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। ब्लॉक परिसर में जो शिलापट्ट लगा है, उसमें मात्र 12 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का ही नाम दर्ज है, जबकि वास्तव में जलालपुर तहसील क्षेत्र के सेनानियों की संख्या सौ से अधिक है। उन्होंने शिलापट्ट में अन्य सेनानियों का नाम भी दर्ज कराने की मांग की है।
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जलालपुर तहसील क्षेत्र के पचरुखवा गांव में जन्मे कालेदीन वर्मा शुरुआत में खेती किसानी करके परिवार का हाथ बंटाते थे। जब वे युवावस्था में पहुंचे, तो उस समय आजादी की लड़ाई चरम पर थी। एक तरफ जहां सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोल रखा था, तो वहीं दूसरी तरफ महात्मा गांधी ने अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजों को बेचैन कर दिया था।
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अंबेडकरनगर के डॉ. गणेश कृष्ण जेतली, राजबली व चितबहाल सिंह जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के संपर्क में आने के बाद कालेदीन खेती किसानी छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। डॉ. गणेश कृष्ण जेतली, लल्लन व राजबली के नेतृत्व में पचरुखवा बाग में आयोजित बैठक में कालेदीन वर्मा ने भी प्रमुख भूमिका निभाई।
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तीन दिन तक चली इस बैठक में तय किया गया कि जाफरगंज रेलवे स्टेशन पर न सिर्फ रेल पटरियों को उखाड़ दिया जाए, वरन् तार भी काट दिया जाएं। तय रणनीति के अनुसार रेल पटरियों को उखाड़कर तार आदि काट दिए गए। इससे अंग्रेजों की नींद उड़ गई थी। कई दिन तक ट्रेन संचालन ठप रहा था।
वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर कालेदीन कई साथियों के साथ फैजाबाद जेल गए। छह महीने जेल में रहने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार आजादी की लड़ाई में भाग लेते रहे। वर्ष 1991 में उन्होंने आजाद भारत में अंतिम सांस ली।
सेनानियों की हो रही उपेक्षा
कालेदीन वर्मा के पुत्र मारकंडेय वर्मा बताते हैं कि जलालपुर तहसील क्षेत्र के सेनानियों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। ब्लॉक परिसर में जो शिलापट्ट लगा है, उसमें मात्र 12 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का ही नाम दर्ज है, जबकि वास्तव में जलालपुर तहसील क्षेत्र के सेनानियों की संख्या सौ से अधिक है। उन्होंने शिलापट्ट में अन्य सेनानियों का नाम भी दर्ज कराने की मांग की है।