UPPSC : सीबीआई को लोक सेवा आयोग से नहीं मिला सहयोग, जांच बंद करने की नौबत, मुख्य सचिव को लिखा पत्र
निदेशक ने स्पष्ट किया है कि पीसी अधिनियम 1988 की धारा 17-ए के तहत लोक सेवकों के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेना जरूरी है। अनुमति मिलने के बाद ही सीबीआई संदिग्ध लोक सेवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर सकती है। इसके लिए भी आयोग को कई पत्र लिखने के बावजूद अनुमति नहीं मिली।
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उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) की भर्ती परीक्षाओं की सीबीआई जांच बंद होने की नौबत आ गई है। सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद ने मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह को पत्र लिखकर कहा है कि संदिग्ध लोक सेवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के मामले में आयोग से सहयोग न मिलने और जरूरी दस्तावेजों की अनुपलब्धता के कारण जांच ठप हो गई है।
निदेशक ने 26 मई को जारी अपने पत्र में लिखा है, ‘यह कहने को विवश हूं कि यदि आगामी 30 दिनों में यूपीपीएससी की ओर से इस संबंध में सार्थक प्रगति नहीं देखी गई तो सीबीआई को इस सहयोग की कमी के कारण जांच और अन्वेषण को समय से पूर्व ही बंद करने का निर्णय लेने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।’
निदेशक ने स्पष्ट किया है कि पीसी अधिनियम 1988 की धारा 17-ए के तहत लोक सेवकों के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेना जरूरी है। अनुमति मिलने के बाद ही सीबीआई संदिग्ध लोक सेवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर सकती है। इसके लिए भी आयोग को कई पत्र लिखने के बावजूद अनुमति नहीं मिली।
निदेशक के पत्र के अनुसार सीबीआई ने अपर निजी सचिव (एपीएस) भर्ती-2010 में हुई धांधली के मामले में चार अगस्त 2021 को एफआईआर दर्ज की थी और तत्कालीन सिस्टम एनालिस्ट गिरीश गोयल, तत्कालीन अनुभाग अधिकारी विनोद कुमार सिंह और तत्कालीन समीक्षा अधिकारी लाल बहादुर पटेल के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए आयोग से अनुमति मांगी गई थी।
सीबीआई ने इन लोक सेवकों की भूमिकाओं का विवरण देते हुए सक्षम प्राधिकारी यूपीपीएससी के अध्यक्ष को 23 अगस्त 2021 को पत्र भेजकर जांच की अनुमति मांगी थी। अनुमति न मिलने पर बाद में कार्मिक विभाग द्वारा निर्धारित प्रारूप के अनुसार नौ जून 2022 को एक संशोधित प्रस्ताव भी सक्षम प्राधिकारी को प्रस्तुत किया गया था। सीबीआई ने यूपीपीएससी से एपीएस-2010 परीक्षा से संबंधित जरूरी दस्तावेज और पूर्ण रिकॉर्ड प्रस्तुत करने का अनुरोध भी किया था। इसके लिए 12 मई 2022 से 14 मई 2025 तक सीबीआई ने आयोग को पांच पत्र भेजे। वहीं, सीबीआई ने पीसीएस परीक्षा-2015 के मामले में पांच मई 2018 को दर्ज एफआईआर के क्रम में 24 फरवरी 2023 को आयोग को पत्र भेजकर संबंधित अभिलेख मांगे। इसके बाद भी आठ बार पत्र लिखे, लेकिन पूर्ण दस्तावेज नहीं मिले।
अभिलेखों के अभाव में निष्कर्ष तक पहुंचना मुश्किल
निदेशक के अनुसार सीबीआई को आयोग से 15 जुलाई 2023, 21 अप्रैल 2024 व एक जनवरी 2025 को तीन पत्र मिले, जिसके अनुसार आंशिक अभिलेख/अपेक्षित दस्तावेज उपलब्ध कराए जाने की सूचना दी गई, लेकिन आयोग मामलों के पूरे रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में विफल रहा। ऐसे में अपेक्षित दस्तावेजों के अभाव में जांच पूरी करना और निकट भविष्य में किसी भी तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल है।
सीबीआई की ओर से मांगे जा रहे सभी अभिलेख नियत समय पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। दस्तोवजों की संख्या काफी अधिक है, सो उनकी प्रतिलिपि कराने, नंबरिंग करने एवं अन्य औपचारिकताएं पूरी करने में वक्त लग रहा है। जल्द ही शेष दस्तावेज भी सीबीआई को उपलब्ध करा दिए जाएंगे। लोक सेवकों के खिलाफ जांच के लिए अनुमति दिए जाने के मामले में सक्षम स्तर पर विवेचना की जा रही है। --अशोक कुमार, सचिव, यूपीपीएससी
न्यायालय में भी लंबित हैं मामले
सीबीआई निदेशक ने अपने पत्र में कहा है कि परीक्षाओं से संबंधित कई मामले इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भी लंबित हैं। सीबीआई को न्यायालयों के निर्देशों के तहत समय-समय पर ऐसे मामलों में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी होती है। ऐसी रिपोर्टों में प्रगति की कमी और जांच की धीमी गति के कारण उच्च न्यायालय से सीबीआई के साथ-साथ राज्य सरकार के प्रति प्रतिकूल विचार आने की संभावना रहती है।
यह है पीसीएस व एपीएसी परीक्षा का विवाद
सीबीआई जांच के दौरान यह खुलासा हुआ था कि पीसीएस परीक्षा-2015 में मॉडरेशन की आड़ में कई योग्य अभ्यर्थियों के नंबर घटा दिए गए थे और कुछ अयोग्य अभ्यर्थियों के नंबर बढ़ाए गए थे, जिसकी वजह से चयन प्रक्रिया प्रभावित हुई थी। कॉपी पर कुछ विशेष प्रकार के चिह्न भी पाए गए थे, जिससे प्रतीत हो रहा था कि कुछ अभ्यर्थियों ने अपनी पहचान स्पष्ट करने के लिए जानबूझकर ऐसा किया। वहीं, एपीपीएस परीक्षा-2010 में नियमों से छेड़छाड़ कर टाइप एवं शॉर्टहैंड में अभ्यर्थियों को गलत तरीके से पास कराया गया, कुछ अभ्यर्थियों के कंप्यूटर सर्टिफिकेट फर्जी पाए गए और अभ्यर्थियों को मिले नंबराें से भी छेड़छाड़ की गई।
चार साल से ठप पड़ी है जांच
उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद 31 जुलाई 2017 को सरकार ने लोक सेवा आयोग की अप्रैल-2012 से मार्च-2017 तक की अवधि में घोषित परिणामों की सीबीआई जांच के दिए थे। शुरुआत में जांच काफी तेजी से आगे बढ़ी। पीसीएस परीक्षा-2015 व एपीएस परीक्षा-2010 के मामले मेें मुकदमा दर्ज होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। वर्ष 2021 से जांच प्रक्रिया लगभग ठप पड़ी है।
एपीएस परीक्षा की जांच के लिए मिली थी विशेष अनुमति
सीबीआई को जिस कार्यकाल की परीक्षाओं की जांच करनी थी, उसमें एपीएस परीक्षा-2010 शामिल नहीं थी, लेकिन तमाम शिकायतें आने के बाद सीबीआई को जब प्रारंभिक जांच में कुछ गड़बड़ियां मिलीं तो परीक्षा की अलग से जांच के लिए प्रदेश सरकार से विशेष अनुमति ली गई। इस मामले में सीबीआई ने तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक प्रभुनाथ के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की थी, लेकिन कार्रवाई जहां की तहां अटकी रह गई।