{"_id":"5e5eb2978ebc3ec7490d94c9","slug":"sangam-is-the-crown-of-prayagraj-city-news-ald270138274","type":"story","status":"publish","title_hn":"प्रयागराज में बोले मोरारी बापू- संगम तीर्थराज प्रयागराज का सिंहासन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
प्रयागराज में बोले मोरारी बापू- संगम तीर्थराज प्रयागराज का सिंहासन
Wed, 04 Mar 2020 01:10 AM IST
इलाहाबाद ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Wed, 04 Mar 2020 01:10 AM IST
विज्ञापन
sangam is the crown of prayagraj
- फोटो : CITY DESK
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
संगम सिंहासनु सुठि सोहा/छत्रु अखयबटु मुनि मन मोहा/पूजहिं माधव पद जलजाता/ परसि अखयबटु हरषति जाता...। रामचरित मानस की इन्हीं चौपाइयों के जरिए कथा मर्मज्ञ संत मोरारी बापू ने मंगलवार को तीर्थराज प्रयाग, संगम और अक्षयवट के महत्व और महिमा से परिचित कराया। उन्होंने संगम की तुलना तीर्थराज प्रयाग के सिंहासन से की, तो अक्षयवट को प्रयागराज के छत्र की संज्ञा दी।
संगम पर राम कथा केबहाने एक बार फिर संगम तट पर देश भर की संस्कृतियों का समागम देखते बन रहा है। कथा के चौथे दिन संत मोरारी बापू ने प्रयागराज में अक्षयवट की महिमा व उसके स्वरूप के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि तीर्थराज प्रयाग का छत्र ही मर्यादा और वैराग्य का दर्शन है, जबकि संगम सिंहासन है। उन्होंने बताया कि सिंहासन ही संगम होना चाहिए। इसीलिए साधु सबका समादर करते संगम रचते रहे हैं। संगम वो होता है जहां सबको मिलाया जाए।
संत- महात्माओं के ऊपर जो छत्र है, वह वैराग्य के समान है। मोरारीबापू ने कहा कि जहां संगम है, वहां स्थिरता है। तीर्थराज में संगम होता है। गंगा और यमुना जहां मिलती हैं वहां का जल कुछ क्षण के लिए स्थिर हो जाता है। संगम में स्थिरता है। संगम ही स्थिर है। अर्थात जहां मिलन है, वहां ठहराव जरूरी है। जहां मिलन हो, संगम हो, वहीं शोभायमान सिंहासन है। सबको मिलाने की यही हमारी वैदिक परंपरा है। भारतीय वैदिक परंपरा ने तो यहीं संदेश दिया है।
विज्ञापन
मोरारी बापू ने कहा कि उनकी व्यासपीठ पर सबका स्वागत हैए यहां अच्छे लोगों और फरेबियों का भी स्वागत है। जिसका जो इरादा हो वो जाने। मेरा तो यही इरादा है। बापू कहते हैं कि संगम तो साधु करेगा। जो सियासत करेए उसकी साधुता को भी मेरा नमन। सत्ता में राजनीति हो सकती है। संत में नहीं। पद में राजनीति हो सकती है, पादुका में नहीं।
मोरारी बापू ने छत्र के छह रूपों के बारे में बताया । कहा कि बुद्ध पुरुष का सिर पर हाथ भी छत्र छाया है। अक्षयवट हमेशा रहता है। हमारा छत्र आसमान है। जब सूरज, चांद नहीं रहेंगे, तब भी हमारा छत्र आसमान रहेगा। अक्षयवट तीर्थराज का छत्र है। छत्र, सम्मान, आदर्श, मर्यादा, सुरक्षा, अभिमान की आड़ और छाया है। बापू कहते हैं कि जिम्मेदार व्यक्ति का सिर खुला नहीं होना चाहिए। हमारे सिर पर बुद्ध पुरुष रूपी हाथों का छत्र जरूर होना चाहिए।
जिस तरह सिर पर सीधे कोई वस्तु उठाने पर भार ज्यादा लगता है, लेकिन वस्तु और सिर के बीच कपड़ा रख देने से भार कम लगता है, उसी प्रकार हमारे सिर पर किसी बुद्ध पुरुष का हाथ होना चाहिए। जिससे कितनी भी जिम्मेदारियां हों कम लगेगी। बुद्ध पुरुष वह है जो समाज के सुधार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले। बापू ने कहा कि स्थिर छत्र अभंगता, अटलता का संदेश देता है, जबकि घूमता हुआ छत्र सबका होने की बात करता है। स्थिर छत्र विपत्ति में काम आता है। घूमता हुआ छत्र मनोरंजन में काम आता है।
विज्ञापन
संगम पर राम कथा केबहाने एक बार फिर संगम तट पर देश भर की संस्कृतियों का समागम देखते बन रहा है। कथा के चौथे दिन संत मोरारी बापू ने प्रयागराज में अक्षयवट की महिमा व उसके स्वरूप के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि तीर्थराज प्रयाग का छत्र ही मर्यादा और वैराग्य का दर्शन है, जबकि संगम सिंहासन है। उन्होंने बताया कि सिंहासन ही संगम होना चाहिए। इसीलिए साधु सबका समादर करते संगम रचते रहे हैं। संगम वो होता है जहां सबको मिलाया जाए।
विज्ञापन
संत- महात्माओं के ऊपर जो छत्र है, वह वैराग्य के समान है। मोरारीबापू ने कहा कि जहां संगम है, वहां स्थिरता है। तीर्थराज में संगम होता है। गंगा और यमुना जहां मिलती हैं वहां का जल कुछ क्षण के लिए स्थिर हो जाता है। संगम में स्थिरता है। संगम ही स्थिर है। अर्थात जहां मिलन है, वहां ठहराव जरूरी है। जहां मिलन हो, संगम हो, वहीं शोभायमान सिंहासन है। सबको मिलाने की यही हमारी वैदिक परंपरा है। भारतीय वैदिक परंपरा ने तो यहीं संदेश दिया है।
विज्ञापन
मोरारी बापू ने कहा कि उनकी व्यासपीठ पर सबका स्वागत हैए यहां अच्छे लोगों और फरेबियों का भी स्वागत है। जिसका जो इरादा हो वो जाने। मेरा तो यही इरादा है। बापू कहते हैं कि संगम तो साधु करेगा। जो सियासत करेए उसकी साधुता को भी मेरा नमन। सत्ता में राजनीति हो सकती है। संत में नहीं। पद में राजनीति हो सकती है, पादुका में नहीं।
मोरारी बापू ने छत्र के छह रूपों के बारे में बताया । कहा कि बुद्ध पुरुष का सिर पर हाथ भी छत्र छाया है। अक्षयवट हमेशा रहता है। हमारा छत्र आसमान है। जब सूरज, चांद नहीं रहेंगे, तब भी हमारा छत्र आसमान रहेगा। अक्षयवट तीर्थराज का छत्र है। छत्र, सम्मान, आदर्श, मर्यादा, सुरक्षा, अभिमान की आड़ और छाया है। बापू कहते हैं कि जिम्मेदार व्यक्ति का सिर खुला नहीं होना चाहिए। हमारे सिर पर बुद्ध पुरुष रूपी हाथों का छत्र जरूर होना चाहिए।
जिस तरह सिर पर सीधे कोई वस्तु उठाने पर भार ज्यादा लगता है, लेकिन वस्तु और सिर के बीच कपड़ा रख देने से भार कम लगता है, उसी प्रकार हमारे सिर पर किसी बुद्ध पुरुष का हाथ होना चाहिए। जिससे कितनी भी जिम्मेदारियां हों कम लगेगी। बुद्ध पुरुष वह है जो समाज के सुधार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले। बापू ने कहा कि स्थिर छत्र अभंगता, अटलता का संदेश देता है, जबकि घूमता हुआ छत्र सबका होने की बात करता है। स्थिर छत्र विपत्ति में काम आता है। घूमता हुआ छत्र मनोरंजन में काम आता है।

sangam is the crown of prayagraj- फोटो : CITY DESK

sangam is the crown of prayagraj- फोटो : CITY DESK

sangam is the crown of prayagraj- फोटो : CITY DESK