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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Nirankari Saint Samagam: burning matchstick of knowledge in the form of God, erase the shadow of enmity

निरंकारी संत समागम : परमात्मा रूपी ज्ञान की तीली जलाकर मिटाएं मानवता पर छाया वैर-विरोध-अहंकार रूपी अंधेरा

Mon, 27 Mar 2023 12:25 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 27 Mar 2023 12:25 AM IST
सार

निरंकारी मिशन की प्रमुख सद्गुरु सुदीक्षा माता ने रविवार को कहा कि जिस प्रकार माचिस की एक तीली जलाने मात्र से घर में फैला वर्षों का अंधकार क्षण भर में दूर हो जाता है, उसी ज्ञान की तीली से मानवता पर छाए अंधेरे को दूर किया जा सकता है।

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Nirankari Saint Samagam: burning matchstick of knowledge in the form of God, erase the shadow of enmity
Prayagraj News : सद्गुरु माता सुदीक्षा और राजपिता रमितजी। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

निरंकारी मिशन की प्रमुख सद्गुरु सुदीक्षा माता ने रविवार को कहा कि जिस प्रकार माचिस की एक तीली जलाने मात्र से घर में फैला वर्षों का अंधकार क्षण भर में दूर हो जाता है, उसी ज्ञान की तीली से मानवता पर छाए अंधेरे को दूर किया जा सकता है। उन्होंने वैर, विरोध, इर्षा, अंहकार रूपी अज्ञानता के अंधेरे में जी रहे मानव को परमात्मा से जुड़कर मुक्ति प्राप्त करने का संदेश दिया।

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परेड मैदान में आयोजित 44वें निरंकारी संत समागम में उमड़े भक्तों के बीच पहुंचीं सुदीक्षा माता ने कहा कि मोबाइल सहित सभी संचार माध्यमों का उपयोग नफरत, वैर-विरोध व नकारात्मक भावनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे माध्यमों के जरिए परस्पर प्यार, सहिष्णुता, सहनशीलता एवं सहयोग की भावना को विस्तार दिया जाना चाहिए।

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परमात्मा के निरंतर जुड़ाव से हमारी सोच बदल जाती है। जिंदगी में रूहानियत के आते ही हमारी इंसानी सोच हमारे जीवन को सार्थक बना देती है। हमारे मन मेें करूणा, दया एवं सहनशीलता जैसी दैवीय भावनाओं का उदय हो जाता है। फिर, अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियां हमारी मनोदशा को प्रभावित नहीं करतीं। शिकवा-शिकायत के भाव शुकराने में परिवर्तित हो जाते हैं।

सुदीक्षा माता ने कहा कि हम किसी यंत्र से प्रकाश की आशा तभी तक कर सकते हैं जब तक उसका संबंध बिजली से रहता है, ठीक उसी प्रकार परमात्मा से निरंतर जुड़ाव ही मानव जीवन की खुशहाली का कारण बनता है। हम समाज में फैली बुराइयों को अच्छाइयों में बदलकर एकत्व में सद्भाव का उदाहरण स्थापित कर सकते हैं। जब हम ब्रह्मज्ञान को कर्म रूप मेें उतार लेते हैं, तब आत्मा की मुक्ति संभव हो पाती है।

इनसे पहले निरंकारी रमित ने कहा कि संत एवं भक्तों का जीवन तो सदैव उत्सव वाला ही होता है, क्योंकि वह अपने सद्गुरु के प्रति भक्ति भाव से जीते हुए अपने जीवन का हर पल सुंदर बनाते हैं। प्रभु मिलन के लिए कोई खूबी या कोई विशेषता होना अनिवार्य नहीं, अपितु इसके लिए तो हृदय में श्रद्धा और विश्वास आवश्यक है।

परमात्मा को पाने का एकमात्र साधन सद्गुरु का सानिध्य ही है और इसकी जानकारी के लिए किसी धन या दौलत की आवश्यकता नहीं, अपितु परमात्मा को पाने की जिज्ञासा मात्र ही भक्त को इसका दीदार कराने में सहायक होती है। फिर उसका जीवन सहज बन जाता है। जिसमें वह हर कार्य को प्रभु की इच्छा समझकर सर्वोपरि मानता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान भौतिकवादी युग में मानव को कभी न पूरी होने वाली इच्छाओं की व्याकुलता को त्यागकर सद्गुरु की शरण में जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए। समागम में विभिन्न स्थानों से आए कलाकारों ने रूहानियत-इंसनियत संग संग विषयक भजनों की प्रस्तुति की। गीतों, विचारों, कविताओं को विविध भावों में व्यक्त किया गया। इस दौरान एक से बढ़कर एक गीत पेश किए गए।

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