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मेले में पहुंचे यजमान इस खास तरीके से करते हैं अपने पण्डों की पहचान, तरीका जान आप भी रह जाएंगे हैरान
कुंभ मेवे मेंबहुत बड़े-बड़े साधु सन्त आये हुए हैं जिनकी पहचान उनके अखाड़ों से या उनकी प्रसिद्धी से है। लेकिन प्रयागराज के पण्डों की पहचान उनके यजमान झण्डों से करते हैं। इन झण्डों के निशान में पूरा विपक्ष मौजूद है। किसी का निशान हाथी, साइकिल तो किसी का पंजा है। संगम के तीरे पर पेटी के साथ तख्त लगाकर बैठे इन पुरोहितों का काम आने वाले अपने यजमानों का कर्मकाण्ड या पूजन का है।
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पण्डा राजेश कुमार ने बताया कि झण्डे पर बना निशान हमारी पहचान है, इसके साथ ही इस पेटी पर लिखा शब्द हमारा ट्रेडमार्क है यह पेटी हमारा अनमोल गहना है, क्योंकि इसमें हम अपने यजमानों का लेखा-जोखा रखते हैं। हमारा यजमान कौन है यह हम उनके क्षेत्रीय भाषा और पहनावे के हिसाब पहचान लेते हैं। उसके बाद हम उनके दादा, परदादा तक के हस्ताक्षार अपने पोथी में दिखा कर बता देते हैं कि हम ही आपके यहां के कुल पुरोहित हैं।
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इन पण्डों का क्षेत्र भी बहुत बड़ा है और यजमान ज्यादा होने के कारण ये एक रजिस्टर में अपने यजमानों के पूरे खानदान को लेखा-जोखा रखते हैं। यजमानों का स्थान और जाति का नाम सुनते ही वो उनके पिता, दादा, परदादा का नाम तुरंत बता देते हैं। इस रजिस्टर में कम से कम 150 वर्षों का रिकार्ड दर्ज है।
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यही नहीं अपने पोथी को तैयार रखने के लिए एक मुनीम रखते हैं, जिसका प्रमुख कार्य आने वाले यजमानों की सूची तैयार करना होता है। खास बात तो यह कि आज भी ये पण्डे हिन्दू कैलेंडर का उपयोग करते हैं। पण्डों के पास आने वाले यजमानों को दिक्कत न हो इसके लिए वे स्टेशनों पर नौकर रखते हैं, जो यजमानो को पुरोहित के पास सकुशल पहुंचा देते हैं।
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मध्यप्रदेश के सागर से आये मनोहर लाल बताते हैं कि, हम अपने पुरोहित जी का पहचान उनके झण्डे से किये हैं। आने से पहले हमारे पिता जी ने महाराज जी के झण्डे का निशान बताया था। आने वाले यजमानों के रहने खाने की भी व्यवस्था भी ये पण्डे कर देते हैं। आधुनिकीकरण के इस दौर में कम्प्यूटर का न उपयोग करने का कारण पूछने पर बताया कि कम्प्यूटर में वायरस आ जाता है। घाट भी पक्के नही हैं कम्प्यूटर रखने पर सुरक्षा कड़ी रखनी होगी, यदि एक बार समान चोरी हो गया तो हम अपने यजमानों की सूची तैयार नहीं कर पायेंगे।
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